बुन्देलखण्डी में अनुवाद– अर्चना राय

“हूँ! जा का खाबे लायक रोटी हे? कोनऊ कच्ची तो कोनऊ जलीं भईं, आदमी तो छोड़ो कुत्ता भी ने खेहे इनखौं।”
अम्मा ने झलकारकें कई तो बिट्टी भी रोआँसी हो आई।
सही में उकी बनाई रोटी ऐंसई तो हतीं। उने अपने मनई मन में जा बात ईमानदारी सें मान लई।
ऊखौं तो खुदई बे रोटीं अच्छी नईं लगी हतीं।
आखर बा करे भी तो का, सबेरे जल्दई कालेज जाने पडत हे और आतईं से अम्मा को बनाओ कछु भी खाकें टूसन पढ़ाबे लग जाने परत हे।
अम्मा भी तो बेर- बेर केत रेत हैं और बा भी तो खुदई चाहत हे कि घर बार के कामों में अम्मा को हाथ बटाबे, ढंग को खाना बनाबो सीख लेबे। पर अक्सरही ऊखौं लगत हे के जा उके बस की बात नैयाँ। बा तो ढंग की कवितई और किस्सा तो भलईं लिख लेत हे पर अम्मा जैसी रोटी कबऊँ ने बना पाहे।
आज फिर सें उने अपनो मन मारकें अम्मा के कहबे पे चार- छै ठो रोटी बनाबे की कोसिस करी। पर बैसई रोटी बना दईं। अम्मा देखकें फिर गुसया गईं “जे तो कुत्ता के खाबे लायक भी नैयाँ।”
उने सोची इसें अच्छो तो अपनी कवितई पूरी लिख लेती, जोन रोटी बनात के बखत दिमाग में घूम रई हती और अब बिसर गई।
अब उखौं चिंता होन लगी के इन बिचारी रोटियों को का होएगो, उखौं उन पे दया आ गई।
उने सोची कए ने इन रोटियों पे कवितई लिख डारे। सोचत -सोचत जेसई पानी पीबे रसोई घर में घुसी, देखकें चौंक गई। अम्मा उकी बनाईं रोटी बड़े स्वाद ले ले कें खा रईं हतीं।
देखकें बा चुप्पई चाप बाहरें निकर आई और अपनी डायरी लिखबे बैठ गई।