जून 2026

संचयनलघुकथाएँ     Posted: February 1, 2025

जसबीर चावला:संचयन

1-पानी और प्यास

युगों पहले पानी और प्यास साथ-साथ रहते थे। साथ हँसते-खेलते, जागते-सोते। फिर एक दिन किसी बात पर प्यास को अहंकार हो गया, बोली- “मैं ही तुम्हें संभालती हूँ, मेरे बिना रह सकते हो?’’ पानी बोला- “हाँ, जैसे आग बिन रह सकता हूँ।’’ प्यास जल-भुन गई और चल दी।

            पानी बीमार पड़ गया। दिन-ब-दिन सूखने लगा। बादल से उसकी यह हालत देखी न गई। वह प्यास का पता लगाता देश-विदेश घूमता रहा। कई जगह उसे लगा यही प्यास है……. पर नहीं, मरुस्थली होती। वह बहुत निराश  होता और पानी की हालत सोचकर रो पड़ता।

            एक दिन उसे सच्ची प्यास मिली। वह पहले से बहुत बदल चुकी थी। झील-सी उसकी गहरी ऑंखें पानी के वियोग में काली पड़ी थीं। बादल ने व्यथा बयान की। प्यास टस से मस न हुई- “बड़ा महान बनता है! मैं जी सकती हूँ ऐसे, मरने दो उसे।’’

            बादल को बड़ा तरस आया दोनों पर। वह बहुत रोया, “क्या हो गया है इन्हें! झूठे अहंकार ने खा लिया!’’

            अब प्यास महँगी-महँगी बोतलों में बिकती है। पानी दर-दर भटक रहा है- कभी बाढ़ बनकर, कभी पहाड़ बनकर। उसे सच्ची प्यास नहीं मिली।

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2-मेहनत का बिजनेस

चवन्नी रास्ते में गिरी दिखी, उठा ली- “भीख दूँगा।’’ डिब्बे से उतर प्लेटफार्म पर पानी ढूँढ़ रहा था। छोटा स्टेशन  था। गाड़ी चल पड़ी। स्लीपर में चढ़ गया। दुनिया भर की गंदगी। खाली जगह दिखी। बैठते ही करताल की आवाज़ आने लगी। कीर्तन करता भिखारी इधर आएगा तो चवन्नी दूँगा। देर हो गई। चीकट कपड़ों में एक काला बच्चा झाड़ू थामे प्रकट हुआ। सफाई करने लगा। छह और साइड वाली दो बर्थों के नीचे सफाई कर थम गया। हाथ फैला दिए। मेहनत कर माँग रहा है, भीख नहीं। चवन्नी उसके भाग की थी। कुछ साल पहले बच्चे पूरा डिब्बा साफ करते थे, तब माँगते थे। अब होशियार हो गए हैं।

            अगली जगह खाली थी। सिर्फ दो बंदे थे। लड़के ने वहाँ झाडू नहीं मारा। आगे बढ़ गया- “ऐ, इधर से बुहार,”-एक सवारी ने कहा। लड़के ने अनसुना कर दिया। उसे मेहनत का पूरा मेहनताना चाहिए। जिधर ज्यादा मिलने की गुंजाइश थी, लड़का उधर चल दिया।

            कीर्तन वाला वहीं था, आगे बढ़ नहीं पाया था।

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3-रहमदिली

सूबेदार सुच्चा सिंह फौज से रिटायर हुए तो ज़मीन खरीदी। ज़मीन खरीदी तो उसमें झोणा बीजा। झोणा बीजा तो धान बड़े हुए। पौधे खड़े हुए तो उसमें जीरी लगी।

जीरी लगी तो खुशबु  फैली तो ढेर-सी चिड़ियाँ आने लगीं खाने।

सूबेदार ने राइफल निकाली। पन्द्रह-बीस गेर दीं। हम गये समझाने कि यार रहमदिली रख।

“रहमदिली! तुम्हें पता है हिंदुस्तान हजारों साल गुलाम क्यों रहा? यही रहमदिली दिखाई दुश्मन पर पृथ्वीराज ने।’’ सुच्चा सिंह इतिहास के पन्ने खोलता नज़र आया।

’’ओए,” मैंने कहा, “चिड़ियाँ भी कोई दुश्मन हैं?’’

“नहीं तो और क्या हैं? मेरी फसल थोथी कर रही हैं। मैंने इनके लिए बीजा था झोणा?’’ सूबेदार के पास बेरहम तर्क था।

’’चिड़ियों को क्या पता कौन-सा सुच्चा सिंह का खेत है। चल अपने नहीं, औरों पर तो खाने दो।’’ हमने समझाने की सोची। “फिर कह दो उनसे, मेरी बंदूक की रेंज से बाहर रहें! सुच्चा सिंह दुश्मन  कोई रहमदिली नहीं करता।’’

1-गेर दीं(पंजाबी)= गिरा दीं

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4-दुआ-ए-मुर्ग़

उसे पता था- क्या होने वाला है, जिस तरह एक-एक कर उसके साथियों को….. चीखने-चिल्लाने-विनती करने का कोई फायदा नहीं।

            उसके कई साथी बड़े मजबूत दिल वाले निकले।

            बाहें पीछे ऐंठकर उन्हें सीखचों से खींचकर सीधा पलड़े पर पटका दिया गया, कैद ने उनका वजन कम नहीं किया, उलटा बढ़ाया ही। भारी-भरकम मशीनी गंडासे को गर्दन पर गिरता पाकर भी उन्होंने चूँ तक नहीं की। अब उनके पंजर जानवर छीलते वह फटी आँखों देख रहा था।

            पर अपनी बारी आने पर वह चुप नहीं रह सका, लगा रोने-चिल्लाने-गिड़गिड़ाने। उसे पता था- उसकी बोली कोई नहीं समझता, पर कुछ अजूबा हुआ। उसकी खींची गई गर्दन पर हथियार रुक गया।

            एक दोस्त ने कहा- “छोड़ यार, घर में काटेंगे।’’

            दूसरे ने कहा- “अरे नहीं, रास्ते भर परेशान  करेगा।’’

            दुकानदार ने राय दी- ’’आधा किलो मीट बच जाएगा गरम पानी में उबाल देना!’’

            उसे कोई बात समझ में नहीं आई, क्यों वह थैले में डाला गया? इस दयालुता पर उसने तहे-दिल से उनकी सेहत के लिए दुआ की।

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5-लस्से

लस्सा डाल दिया बहेलिए ने। बहुत-सी कैल (विलुप्त प्रायः चिड़िया) मुनियाँ उतरीं तो पंख चिपक गए, और उड़ना नहीं हो पाया।

            चिड़ीमार ने खेप लूटकर टोकरी भर ली, बाजार ले गया। चिड़िया की गर्दन उंगली से मरोड़ पैर से चांप देता। पंखों को ऐसे उतार देता, जैसे नाक पोछते हैं। पूरी टोकरी का माल सौ के भाव शराबी  को सौंप दिया।

            घुघनी जैसी तली छोटी-छोटी मुनियाँ जायकेदार तो हैं ही, कई औरतों की गर्मी होती है। इससे बढ़िया चखना क्या होगा?

            शराबी जंगल गया। साहब को भेंट किया। जंगल महकमा हरकत में आया। लस्सा डाला गया। आदिवासियाँ  उतरीं महुआ बीनने। पंख चिपक गए। और उड़ना नहीं हो पाया। ठेकेदार ने गाड़ी में बिठाया। साडियाँ दे गर्दन मरोड़ी, थाने को रुपये  दे चाँप दिया। पंख ऐसे उतारे, जैसे नाक पोंछते हैं। टोकरी का माल हजारों के भाव राजधानी पहुँचा। वहां छंटाई हुई। पंखों के रंग और डिजाइन देखे गये। आवाज़ सुनी गई। अलग-अलग पिंजरों में बंद हो गईं- मंत्रियों, अमीरों, बड़े अफसरों के घर। वातानुकूलित पिंजरों में सफर करने लगीं। कई पिंजरे विदेश जा उड़े। पुरानी पिंजरे से निकाल हवा में छोड़ दी गई। जिसे पसंद की डाल, तारा होटल मिले, बैठी। बाकी लस्सों पर उतरीं। उतरीं तो पंख चिपक गये, और उड़ना नहीं हो पाया। लस्से वालों ने खेप लूट टोेकरी भर ली! खेपों की बोली लगी। कई ऊँचे कैबरे-घरों-चकलों में रूकीं। कई गिरजाघरों में रुकीं। वहां से आम घरों में पहुँचीं। कई महानगरों, कई दफ्तरों-उद्योग धंधों में बँट गईं। ठेके पर कई कोठे चढ़ गईं। उतरीं तो पंख चिपक गये, और उड़ना नहीं हो पाया।

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6-वरदान

वरदान मिल गया। जिसको छूता हथियार में बदल जाता। ए.के. सैंतालीस, क्लासनीकोव, ग्रेनेड, डाइनामाइट, स्कड, पैट्रियट और जाने क्या-क्या….। एक से एक घातक। दूर-दूर से मार करने वाला।

            परेशान हो गया।

            बीवी को प्यार करना चाहा तोप में बदल गई, बोफोर्स। बेटी को छुआ- मिराज बमवर्षक में तब्दील हो गई। बेटा- पैट्रियट।

            कनीज़ें- पृथ्वी…. अग्नि, नौकर-चाकर आक्सीजन सोखने वाले रोबोट!

            भूख से बुरा हाल हो गया।

            संतरे-सेब बम के गोले बन जाते। रोटी उड़नतष्तरी में बदल जाती। चॉकलेट डाइनामाइट का टुकड़ा बन जाते। पावरोटी विस्फोटक पदार्थ। पानी को छूता पेट्रोल बम बन जाता।

            वह दम तोड़ रहा है।

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7-रामदीन की लालटेन

अम्बेडर कॉलोनी की हर झुग्गी भरी दोपहरी खिल रही थी, खटखटाई जा रही थी- “सड़ी-गली लालटेन दे दो, अभी तुरंत नई ले लो। जुलूस में आओ किरासिन भी मिलेगा!’’

            रामदीन की अम्मा खंझड़ चारपाई में धूप सेंक रही थी। उसने बातें सुनी -“अरे, कैसी भी हो… टूटी-फूटी भी चलेगी। नई लालटेन मिल रही है। पुरानी बदल दो यही मौका है। बाजार में सौ-सौ रुपये में भी नहीं मिल रही।’’ अम्मा ने कहानी सुन रखी थी। टूटे-फूटे कबाड़ चिराग में ही जिन्न बसा था जो पलक झपकाते बादशाह बना सकता था। नये के लालच में अलादीन की अम्मा ने जादूगर को असली थमा दिया था और अलादीन फिर फटेहाल मुसीबतों में घिर गया था- ’’ना बाबा, ना, रामदीन के लौटने तक बिना उससे पूछे, वह लालटेन नहीं देगी।’’

            तब तक सूटेड-बूटेड कार्यकर्ता की नज़र बाँस पर झूलती खूसट लालटेन पर पड़ी। “अरे उतारो! इसको वहाँ से, मुख्यमंत्री देख लेंगे तो कचरा हो जाएगा। जुलूस का इन्सलेट हो जाएगा। देश-विदेश  का टी.वी. पर चुनाव का जुलूस देखेगा।’’

            रामदीन की अम्मा पर कोई जूं नहीं रेंगी।

            ’’अरे केकर है यह लालटेन? बोलता काहे नहीं है? ई नया लो।’’ लालटेन बाँटने वाला आगे बढ़ा।

            “रहने दो बबुआ! हमरे पुनरका ठीक है। नईका नई चाहिए।’’

            कार्यकर्ता आँखें तररेने लगा- “बुढ़िया की हिम्मत कितनी बढ़ गई है। जुबान लड़ाती है।’’

            “नहीं चाहिए मत लो!’’ सुटेड-बूटेड ने हुक्म दिया।

            “उतार रे महात्मा।’’ गाँधी टोपी धारे युवक ने लालटेन बाँस से खींच ली। पहले ने ज़मीन पर पटकी और पैरों तले कूँच-पचकाकर फुटबाल की तरह ठोकते गढ़े में खदेड़ दी। मिट्टी किरासिन पी चुप रही।

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8-सुई और छलनी

छलनी के व्यंग्य से तिलमिला उठी सुई- ’’अरे, मेरे छेद की बात करते हो। दुनिया की  नंगई ढकता है यह छेद। यह उसी धागे के लिये है जो आपस में जोड़ देता है, फट कर अलग हुए टुकड़ों को भी। दोष देने से पहले अपने गिरेबान में झाँक लो, अनगिनत छेद वाली कलमुँही। छेद भी कैसे कि बाप को बेटे से, भाई को भाई से, पत्नी को पति से, अपनों को अपने से अलग कर दे।’’

            तुनक गई छलनी, लाल-पीली हो गई- “तेरा मतलब है, मैंने अपनी मर्जी से इतने छेद करवाए हैं…बस तू ही एक सती सावित्री है? मैं किसी का कुछ नहीं संवारती? लोग भूसा खाने जाते जो मैं न होती। अपना-अपना कह घर बरबाद कर लें? अच्छा और बुरा अलग होना चाहिये कि नहीं?’’

            नौबत हाथापाई की आ जाती है। सुई ने अपनी शालीनता पर आई इस आफत से छुटकारा पाने की सोची। कोई अदालत अगर थी तो उसमें न्याय की गुहार मची। तारीखें पड़ने लगीं।

            छेदों के बहाने ऐसे सवाल उठाए जा रहे थे जो समाज देश से आगे जाकर पूरी मानवता की जड़ें खोदने वाले थे। धर्म-ग्रंथों, शास्त्र -पुराणों और विश्व  के महान दर्शन -ग्रन्थों से उदाहरण दिए जा रहे थेः पक्ष-विपक्ष में भी। महानगरों में छलनियों के जुलूस निकले। संघ बद्ध तरीके से मानवाधिकारों की दुहाई दी जाने लगी। छलनी को बाकायदा औद्योगिक कामगार का दर्जा मिलना चाहिए। एक ऐसा यंत्र जो अनाज से भूसे को, आटे से चोकर को अलग करता है।

            सुई खामोश थी कि अभी उसे घरेलू काम-काज से ही फुर्सत नहीं। व्यावसायिक तौर पर वह बढ़ी है तो बुटीक और दर्जियों तक, जबकि छलनी अपने छेदों को भुनाते चली जा रही है।

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