गाड़ी में तरबूज भरे हुए थे। माल देखकर शामलाल दलाल छलांग मारकर गाड़ी से नीचे उतरा। रामदीन से बोला – देख भाई, मंडी में इतनी मन्दी है कि क्या कहें?
हैरान था रामदीन। ट्रक, टेम्पो, रेहड़ी रिक्शा भीड़-भड़क्का मण्डी में खड़े होने की तो जगह नहीं है, ये मन्दी है? तो तेजी कैसी होती है?
– तरबूज को तो कोई पूछ भी नहीं रहा। खैर…. माल तुम्हारा है तुम बोलो। इनके कितने माँगते हो?
– आप ही ठीक ठीक लगा लो…. छह सात हजार मिल जायें बस्स…. शहर में तो तरबूज दस रूपये किलो बिक रहा है। मेरा ये एक-एक फल पचास से नब्बे रुपये तक बिकेगा।
शामलाल हंसने लगा जैसे अनोखी बात सुन ली हो – नहीं बिकेंगे…. डेढ़ दो हजार की बात करो तो….? दो सौ रूपया कमीशन के मैं लूँगा।
कुएँ और खाई के बीच लटक गया था रामदीन। इतनी कम कीमत तो उसे गाँव में ही मिल रही थी। आजादपुर मंडी में इसी माल के आठ नौ हजार तो आराम से मिल जायेंगे यह सोचकर आया था रामदीन।
यहाँ मेटाडोर से लाने के दो हजार रूपया तो किराया लग गया। सौ सवा सौ चाय पानी का। माल के अठारह सौ मिल रहे हैं वो तो मैटाडोरवाला ले लेगा। उस पर लेकर आया था माल। उसकी खून पसीने से उगाई खरबूजे की फसल की कीमत कहाँ गई?
उधर मैटाडोर वाला उस की जान खा रहा था – जल्दी बताओ गाड़ी कहाँ खाली करूँ? मुझे और भी काम हैं। चार घंटे से गाड़ी सड़क पर खड़ी है। ऊपर से पुलिस वाले गाड़ी हटाने के लिये डंडे फटकार रहे हैं। कितना टाइम और लगाओगे?
हाथ पांव जोड़कर उसने किसी तरह थोड़ी और देर तक रूकने के लिये मनाया। उसे चाय पानी के पैसे भी दिये और फिर से दलालों, आढ़तियों और मंडी के थोक फल व्यापारियों के आगे इधर उधर गिड़गिड़ाने लगा। पर बात नहीं बन रही थी। वह वापिस गाड़ी के पास आकर खड़ा हो गया। गाड़ी वाला शायद कहीं रोटी खाने गया हुआ था। तभी एक पुलिस वाले ने आकर डंडा फटकारना शुरू कर दिया – कागज दिखाओ। लाइसेंस दिखाओ……चालान होगा…. एक हजार रुपया निकालो….।
रोता गिड़गिड़ाता देख वर्दी वाले ने उससे एक सौ रूपया ले उसकी जान छोड़ दी।
आसमान में बादल गरज रहे थे। बरसात शुरू हो गई थी। रामदीन की रूह कांप रही थी। एक दलाल वहाँ से निकलते हुए रामदीन को कह गया, बरसात में कौन खाएगा तरबूज? अब तो तुम्हारा माल बिकना नामुमकिन है।
बरसात तेज होती जा रही थी। बरसात को रूकता हुआ न पाकर रामदीन हारकर शामलाल के पास गया। उसने शामलाल के पाँव पकड़ लिये। किसी तरह उसे अठारह सौ का माल बेचा और सारे पैसे लेजाकर गाड़ी वाले को लेजाकर दे दिए। रामदीन की आँखों में आँसू देखकर गाड़ी वाले ने उसके कन्धे पर हाथ रखकर कहा – मेरे बापू ने भी ऐसे ही हारकर आत्महत्या कर ली थी। बाद में मैंने जमीन बेचकर ये गाड़ी बना ली। पर तू हिम्मत ना हारना। सब दिन ऐसे नहीं रहेंगे। किसान के बिना लोग खायेंगे क्या? जियेंगे कैसे? किसानों के भी दिन आयेंगे।
गाँव वापस जाने के लिए रामदीन के पास भाड़ा नहीं बचा था। वापिस जाए तो जाए कैसे? वह सड़क पर खाली हाथ खड़ा था। तभी फल सब्जी व्यापार मंडल का एक आदमी रसीद बुक लेकर आ गया। तुमने माल बेचा है? इक्यावन रुपये की पर्ची कटवाओ। खीझ उठा रामदीन। एक पैसा नहीं बचा है मेरे पास। अब क्या अपने कपड़े उताकर दूँ? मैंने माल बेचा कहाँ है….? मेरा माल तो यहाँ लूट लिया गया है।
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