मुनाफ़ाखोरी और पूँजीवादी व्यवस्था पर तीखा कटाक्ष करती असगर वजाहत की ‘चार हाथ’ मेरी पसंदीदा लघुकथा है। मुनाफ़ाखोरी के चक्कर में मिल मालिक के दिमाग़ में दिन-रात यही घूमता रहता है कि किस प्रकार काम की चक्की में मज़दूरों को पीसकर मुनाफ़ा कमाया जाए, जिसके लिए वह किसी भी हद तक जाने को तत्पर है। मज़दूरों की अस्मिता से उसे कुछ लेना देना नहीं है। मज़दूरों की देह से अंतिम बूँद भी वह निचोड़ लेना चाहता है। ‘आधी मज़दूरी और दुगने मज़दूर।’
दूसरी पसंदीदा लघुकथा सुकेश साहनी जी की ‘ठंडी रजाई’ है। लघुकथा अंदर तक रेशा-रेशा उतरती चली जाती है। अंतस् में लिपटी हुई संवेदना पति-पत्नी को विचलित कर देती है। रजाई के लिए पड़ोसन को मना तो कर दिया; किंतु अपराधबोध का द्वंद्व दोनों के भीतर छटपटा रहा है। “इस ठंड में मेरी रजाई भी बेअसर सी हो गई है।”-पत्नी के मन का बोझ इस संवाद के साथ उतारना शुरू हो जाता है।
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1- चार हाथ/ असगर वजाहत
एक मिल मालिक के दिमाग़ में अजीब-अजीब ख़याल आया करते थे जैसे सारा संसार मिल हो जाएगा, सारे लोग मज़दूर और वह उनका मालिक या मिल में और चीज़ों की तरह आदमी भी बनने लगेंगे, तब मज़दूरी भी नहीं देनी पड़ेगी, वगैरा-वगैरा। एक दिन उसके दिमाग़ में ख़याल आया कि अगर मज़दूरों के चार हाथ हों, तो काम कितनी तेज़ी से हो और मुनाफ़ा कितना ज़्यादा; लेकिन यह काम करेगा कौन? उसने सोचा, वैज्ञानिक करेंगे, ये हैं किस मर्ज़ की दवा? उसने यह काम करने के लिए बड़े वैज्ञानिकों को मोटी तनख्वाहों पर नौकर रखा और वे नौकर हो गए। कई साल तक शोध और प्रयोग करने के बाद वैज्ञानिकों ने कहा कि ऐसा असंभव है कि आदमी के चार हाथ हो जाएँ। मिल मालिक वैज्ञानिकों से नाराज़ हो गया। उसने उन्हें नौकरी से निकाल दिया और अपने आप इस काम को पूरा करने के लिए जुट गया।
उसने कटे हुए हाथ मँगवाए और अपने मज़दूरों के फिट करवाने चाहे; पर ऐसा नहीं हो सका। फिर उसने मज़दूरों के लकड़ी के हाथ लगवाने चाहे; पर उनसे काम नहीं हो सका। फिर उसने लोहे के हाथ फिट करवा दिए; पर मज़दूर मर गए।
आखिर एक दिन बात उसकी समझ में आ गई। उसने मज़दूरी आधी कर दी और दुगुने मज़दूर नौकर रख लिये।
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2-ठंडी रजाई/ सुकेश साहनी
“कौन था?” उसने अँगीठी की ओर हाथ फैलाकर तापते हुए पूछा।
“वही, सामने वालों के यहाँ से,” पत्नी ने कुढ़कर सुशीला की नकल उतारी, “बहन, रजाई दे दो, इनके दोस्त आए हैं।” फिर रजाई ओढ़ते हुए बड़बड़ाई,” इन्हें रोज़-रोज़ रजाई माँगते शर्म नहीं आती। मैंने तो साफ़ मना कर दिया- आज हमारे यहाँ भी कोई आने वाला है।” “ठीक किया।” वह भी रजाई में दुबकते हुए बोला, “इन लोगों का यही इलाज है।”
“बहुत ठंड है!” वह बड़बड़ाया।
“मेरे अपने हाथ पैर सुन्न हुए जा रहे हैं।” पत्नी ने अपनी चारपाई को दहकती अँगीठी के और नज़दीक घसीटते हुए कहा।
“रजाई तो जैसे बिल्कुल बर्फ हो रही है, नींद आए भी तो कैसे!” वह करवट बदलते हुए बोला।
“नींद का तो पता ही नहीं है!” पत्नी ने कहा, “इस ठंड में मेरी रजाई भी बेअसर सी हो गई है।”
जब काफी देर तक नींद नहीं आई तो वे दोनों उठकर बैठ गए और अँगीठी पर हाथ तापने लगे।
“एक बात कहूँ, बुरा तो नहीं मानोगी?” पति ने कहा।
“कैसी बात करते हो?”
“आज जबरदस्त ठंड है, सामने वालों के यहाँ मेहमान भी आए हैं। ऐसे में रजाई के बगैर काफी परेशानी हो रही होगी।”
“हाँ, तो।” उसने आशाभरी नज़रों से पति की ओर देखा। “मैं सोच रहा था…मेरा मतलब यह था कि…हमारे यहाँ एक रजाई फालतू ही तो पड़ी है।”
“तुमने तो मेरे मन की बात कह दी, एक दिन के इस्तेमाल से रजाई घिस थोड़े ही जाएगी।” वह उछलकर खड़ी हो गई, “मैं अभी सुशीला को रजाई देकर आती हूँ।”
वह सुशीला को रजाई देकर लौटी तो उसने हैरानी से देखा, वह उसी ठंडी रजाई में घोड़े बेचकर सो रहा था। वह भी जम्हाइयाँ लेती हुई अपने बिस्तर में घुस गई। उसे सुखद आश्चर्य हुआ, रजाई काफी गर्म थी।
-शिवचरण सरोहा<ए-107, शकूरपुर, आनंद वास,दिल्ली-110034
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