“जानती हो, आज का दिन कुछ खास है।”
पत्नी ने सुनते ही कैलेंडर की और देखा, “कौन सी तारीख है?” ‘खास दिन! हाँ, याद आया, आज अपनी शादी की सालगिरह है, आपको मुबारक हो।” पति झुँझला उठा।
“इतनी ठंडी मुबारकबाद! क्यों भई, आज एनिवर्सरी के दिन भी मुँह पर बारह क्यों बज रहे हैं? कभी खुश भी हो लिया करो।”
“मैं खुश… हाँ… हो तो लिया करूँ, पर न जाने क्यों ऐसा लगता है कहीं कुछ खो-सा गया है।” कहते हुए उसने उदास आँखों से पति की ओर देखा। इस बार वह झुँझलाकर ज़ोर से बोल उठा, “कैसी बहकी बातें कर रही हो, इस घर में क्या कमी है? अपनी सहेलियों से जाकर पूछो, मिली है किसी को ऐसी आजादी, जो मैंने तुमको दे रखी है?”
उसने शून्य की ओर ताका। कहीं खो-सी गई। पुनः सचेत होकर बोली, “आजादी… आपने मुझे दे रखी है? किस बात की आजादी?”
पति उत्तेजना से भर उठा, “क्यों? तुम को खाने-पीने, बाहर आने-जाने, पढ़ने-लिखने की आज़ादी, मैंने नहीं तो और किसने दी है?”
उसकी आँखें भर आईं, “आज समझ में आया कि मेरा दिल इतना भरा हुआ क्यों है? आपसे एक प्रश्न पूछें?”
“पूछो।”
“मुझे आज़ादी देने का अधिकार आपको किसने दिया, ऊपर वाले ने या संविधान ने या… आपके अपने अहं ने?”
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