सुदूर प्रदेश से आगे की पढ़ाई के लिए आया मामूली हैसियत का वह लड़का, मेरे यहाँ एक कमरा किराए पर लेकर रह रहा है। ट्यूशनें कर जैसे-तैसे अपना काम चलाता है। हाथ तंग होने से साल भर से अपने गाँव भी नहीं गया है; पर उसकी वृद्धा माँ से न रहा गया। तीर्थ-यात्रा से लौटते हुए वह बीच में यहाँ उतर गई और पूछते हुए बेटे के घर तक पहुँच गई। बेटा ट्यूशन पर गया हुआ था। मैंने वृद्धा को अपने घर में बिठाया। बैठते ही वह बेटे के बारे में पूछने लगी- कैसा है वह? दुबला तो नहीं हुआ? कब कॉलेज जाता है, कब आता है? कहाँ खाता है? क्या करता है? आदि-आदि। उसकी हर बात से बेटे के प्रति चिंता और उससे मिलने-देखने की उत्सुकता प्रकट हो रही थी। आखिर उससे न रहा गया, सहसा पूछ बैठी, “कौनसा कमरा है मेरे बेटे का?”
चूँकि लड़का कमरे की चाबी हमारे यहाँ ही छोड़ जाता था, ताला खोलकर उसे उसके बेटे के कमरे में ले गया। भरपूर नजर से वह कमरे की एक-एक चीज देखने लगी। देखने क्या लगी, तोलने लगी। अजीब- सी जिज्ञासा थी उसकी आँखों में।
‘‘बैठो, मैं तुम्हारे लिए पानी लेकर आता हूँ।’’
फर्श पर बिछे अस्त-व्यस्त बिस्तर के एक छोर पर वह बैठ गई। लौटकर आया तो भौंचक रह गया। देखा, आत्मविभोर माँ चीकट हो आए उस तकिए को चूम रही है, जिसे उसका बेटा सिरहाने रखकर सोता है। फिर आहिस्ता- आहिस्ता वह बिस्तर को सहलाने लगी। उसकी आँखों से टपके आँसू न केवल बिस्तर को, बल्कि मुझे भी अंदर तक भिगो गए। लगा, बिस्तर को नहीं, वह अपने बेटे को सहला रही है।
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