लघुकथा लिखना, अर्थात सागर में सागर भरना, कम शब्दों से में बहुत कुछ कह जाना। अधिकतर लघुकथा अपने गर्भ में एक कहानी, या एक उपन्यास तक समेटे रहती हैं। लघुकथा विधा का जन्म हए कोई बहुत ज्यादा समय तो नहीं हुआ फिर भी कई प्रमुख पत्रिकाएँ यथा हंस, कथादेश, इन्द्रपस्थ भारती कथाविम्ब आजकल, आदि इसे प्रमुखता से स्थान देती हैं। आपाधापी के इस अर्थप्रधान युग में लेखक का लिखा, लेखक ही पढ़ रहा हैा पाठक के पास कहानी व उपन्यास पढ़ने का धैर्य कहाँ है? अस्तु भविष्य तो लघुकथा का ही है। समय की पुकार है, लघुकथा।
लघुकथा डाट. काम का इस दिशा में प्रयास अदभुत हैं। ‘मेरी पसंद’ स्तंभ हेतु कई लघुकथा पढ़ने व मनन करने के पश्चात् मैने दो लघुकथा पसंद की हैं। पहली आनन्द हर्षुल की ‘कोयले की इच्छा’, दूसरी मुरलीघर वैष्णव की ‘रांग नंबर’।
कोयले की इच्छा – धोबी की बेटी पालीथीन की पारदर्शी थैली में कोयलो को सिंघाड़े समझने का भ्रम पाले है। शायद उसने सिंघाड़े के विषय में सुना तो है, न उन्हें पास से देखा है, तो खाने का प्रश्न ही नहीं उठता। धोबी की वह अबोध बिटिया, ताली बजाकर खुशियाँ मना रही है कि आज उसे सिंघाडे खाने को मिलेंगे। उसका पिता तो पाँच-दस किलो कोयला बोरे में लाता था आज धनाभाव के कारण दो किलो कोयला पोलीथीन में लाया हैं।
पिता की गरीबी से अनभिज्ञ उसकी अबोध बिटियाँ की तालियाँ, लेखक आनन्द हर्षुल, को, संवेदना की पराकाष्ठा तक पहुँचा देतीं है कि एक निर्जीव, कोयला संजीव होकर सिंघाड़ा होने की इच्छा करने लगता है। राख में परिवर्तित नही होना चाहता। उस कोयले को शायद यह आभास हो गया था, कि खुशी से तालियाँ बजाती, उछलती कूदती, बालिका को देर-सबेर जब यह पता चलेगा कि जिन्हें वह सिंघाड़ा समझ रही थी, वह कोयला है। तो उसका दिल टूट न जाए, इसलिए कोयला, सिंघाड़ा हो जाने का अरमान रखता है?
रांग नंबर– एक फिल्मी डायलाग है, ‘घर का बेटा यदि बिगड़े, तो समझो कि घर से किसी ने गली में थूका और घर की बेटी बिगड़े, तो समझो कि गली से किसी ने घर में थूका। हम लोग घर से गली में थूकने के आदी हैं, परन्तु गली से कोई हमारे घर में थूके, ये हमें कैसे गवारा होगा? एक घर का बेटा और एक घर की बेटी साथ भागते हैं। बेटा, सुबह का भूला शाम को घर लौट आए, तो भूला नहीं कहलाता। परन्तु बेटी सुबह की भूली घर लौटती हैं, तो उसे द्वार बंद मिलता है। बेटा तो बेटा है, परन्तु बेटी को तो माँ – बाप खानदान की इज्जत का ख्याल रखना चाहिए। याद कीजिए, निर्भया कांड में भी कुछ लोगो ने निर्भया में ही कमियाँ ढूँढी थी। रात के साढ़े ग्यारह बजे वह अपने यार के साथ क्या कर रही थी? बचाव पक्ष के वकील ने तो यहाँ तक कह दिया था, कि ऐसी आवारा बेटी मेरी होती, तो मैं खुद उसका गला घोंट देता। दरअसल, हम कमजोर गाल पर छप्पड़ मारकर ‘सेफ-न्याय’ के आदी हैं। स्त्री – पुरुष भेदभाव हमारे डी0एन0ए0 में हैं।
‘रांग नंबर’ की बेटी घर से भाग कर बम्बई आ गई। काम निकल जाने बाद उसका प्रेमी फूट लिया, अब पछता रही है। घर लौटना चाहती है। वह फोन पर अपने पिता से मिन्नत करती है, “प्लीज पापा फोन मत रखिएगा। मैने आपका विश्वास तोड़ा है, और मैं बहुत पछता रही हूँ।” -वह फोन पर गिड़गिड़ा रही थी। कि एक बार कह दीजिएगा कि आपने मुझे माफ कर दिया।
जवाब में उस आदमी ने कह दिया- “बेटी, तुम कहाँ हो, जल्दी घर लौट आओ। मैने तुम्हारी सारी गल्तियाँ माफ कर दीं ।”
वह पचास वर्षीय कुँआरा प्रौढ़ था, वह उसकी बेटी भी नहीं थी परन्तु उस ‘रॉग नम्बर’ झूठ – मूठ के बाप ने, उस भटकी हुई, लाचार परेशान बेटी की घर वापसी का इंतजाम कर दिया था। उसे इस बात की खुशी थी, कि उसकी आवाज उस बेटी के बाप से मिलती-जुलती थी, और उसने ‘रांग नम्बर’ कहकर फोन नही रखा। अनजाने में ही सही, एक परोपकार उससे हो गया, एक भटकी बेटी की घर-वापसी का।
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कोयले की इच्छा
आनंद हर्षुल
धोबी, पॉलीथिन की थैली में, कोयला लेकर अपने घर के भीतर घुसा, धोबी की बच्ची ने, कोयले को सिंघाडा समझा। बच्ची कूदने लगी-ताली बजा-बजाकर कि बाबू सिंघाड़ा लाए-बाबू सिंघाड़ा लाए-खुश बच्ची की, खुश-खुश उड़ती ताली, ताल की आवाज से, धोबी का घर भर गया।
धोबी पहली बार, पॉलीथिन की थैली में लाया था, दो किलो कोयला। वह हमेशा पॉच-दस किलो कोयला, बोरी में भरकर लाता था। पर आज उसके पास, पॉच किलो कोयला खरीदने लायक पैसे नही थे, तो वह ले आया दो किलो कोयला-पॉलीथिन की पारदर्शिता से कोयले, सिंघाड़े की तरह झॉक रहे थे। जिन्हें सिंघाड़ा समझकर धोबी की बेटी ताली बजा खुश हो, कूद रही थी।
धोबी की, खुश होकर कूदती, बच्ची की तालियों की खुश-आवाज सुन, पहली बार कोयले के भीतर सिंघाड़ा होने की इच्छा जागी। कोयले ने पहली बार, अपने सिंघाड़ा होने की इच्छा से अपनी राख होने की इच्छा को दबाया।
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2-रांग नंबर
मुरलीधर वैष्णव
“पापा प्लीज… फोन नहीं रखना, मैं जानती हूँ, मैंने आपका विश्वास तोड़ा। मैं बहुत पछता रही हूँ कि घर से भागकर मुम्बई आ गई… मैं यहाँ बहुत परेशान हूँ, पापा!… मैं तुरंत घर लौटना चाहती हूँ। पापा प्लीज…!”
“एक बार… सिर्फ एक बार कह दीजिए कि आपने मुझे माफ कर दिया!” उसने फोन पर ‘हैलो‘ सुनते ही गिड़गिड़ाना शुरू कर दिया था।
“बेटी, तुम कहाँ हो? तुम जल्दी ही घर लौट आओ। मैंने तुम्हारी सब गलतियॉ माफ कर दीं…।’’ कहकर उस आदमी ने फोन रख दिया।
पचास वर्षीय वह कुँवारा – प्रौढ सोचने लगा कि उसकी तो शादी ही नहीं हुई, यह बेटी कहाँ से आ गई? लेकिन वह तत्काल समझ गया था कि किसी भटकी हुई लड़की ने उसके यहाँ ‘रांग नम्बर’ डायल कर दिया था। बहरहाल, उसे इस बात की खुशी थी कि उसकी आवाज उस लड़की के पिता से मिलती – जुलती थी और उसने ‘रांग नंबर‘ कहने की बजाय ठीक जवाब दिया था।
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