
बुलावा मेरी पसन्द की प्रथम लघुकथा है। सामाजिक विरोधाभास दर्शाती लघुकथा है यह। एक किन्नर, जो संभवतः ऐसे समाज से ताल्लुक रखती है जो सभ्य समाज में अवांछनीय है। इसी सभ्य समाज के घरों में होने वाले शुभ अवसरों पर इस किन्नर द्वारा दी गई दुआओं को शुभ माना जाता रहा है; लेकिन उसी समाज द्वारा ये वर्जित है, निर्वासित है। संवादों के माध्यम से इन विडंबनाओं को पूरी ठसक के साथ पाठकों के समतल मन में बैठाना आसान नहीं होता।
अपवाद होते है और इस लघुकथा में ऐसे ही एक अपवाद को सत्यता मिली है, एक संदेश मिला है, जो बदलाव की कथा लिखता है। इस लघुकथा में बदलाव की कमान, संभ्रांत, प्रतिष्ठित पुरुष को सौंपी गई है और यही संदर्भ, समाज के दो वर्गों को गहराई से इंगित भी करता है। इसके अलावा यही तथ्य, कथा को अधिक ठोस और प्रभावी धरातल भी देता है।
कथा के पुरुष पात्र को यह मानने में हिचक नहीं होती कि उसके बेटे की तरक्की में दुआओं का कुछ अंश चंदा का भी है। असर तब और गहरा होता है जब ये पात्र अपने बेटे के विवाह में न्योता देने चंदा के दरवाजे़ पर उपस्थित होता है। प्रतिष्ठित वर्ग से आते ऐसे सम्मान की वह किन्नर कभी अपेक्षा नहीं रखती है; क्योंकि अब तक समाज में यही मानसिकता व्याप्त है। कथा के पुरुष पात्र को आदर्श, प्रगतिवादी विचारों की अगुवाई करते चित्रित किया गया है। ऐसे विचार पाठकों के मन को सहलाते, सुकून दिलाते है।
दूषित वर्जनाओं को दरकिनार कर, सुन्दर समाज की कल्पना,लेखक के सुसंस्कारों पर भी मोहर लगाती है।
लेखिका की कथानक एवं शब्दों पर अच्छी पकड़ है, जिससे अतिरिक्त शब्दों का प्रवेश नहीं है। यह संभव था कि लेखिका कथा को अति भावुक बनाने के लिए अतिरिक्त शब्दों का प्रयोग करती; मगर इससे कथा का स्वाभाविक रूप कृत्रिम बना देती। लेखिका ने संवादों में शब्दों की उतनी ही सीमा तय की है, जितनी कथा के प्रवाह को आगे बढ़ाने में सहायक है।
इस लघुकथा की सबसे बड़ी विशेषता, इसके सीमित पात्रों का होना है। पात्रों की भीड़, कथा के मूल को भुलाकर, गफलत की ऐसी गुमनाम गलियों में ले जाती है, जहाँ से पाठक रास्ता भटक ही जाते है। सुखद बदलाव लाती, सहज, सरल, स्वभाव की ऐसी लघुकथा का हमेशा स्वागत रहता है।
मेरी पसन्द की दूसरी लघुकथा है ‘निशानी’ लघुकथा के सारे मापदंडों को तय कर, लघुकथा लिखना, सशक्त कलम से ही संभव हो पाता है। इस लघुकथा में समीक्षा के लिए संभावनाओं का अनंत आकाश है। सरकारी आदमी की अपनी तयशुदा सीमाएँ होती हैं, अपने मानसिक द्वंद्व होते हैं। लघुकथा में शीर्षक की विविधता एक अनिवार्य अंग है। यह लघुकथा केवल दो पात्रों के गिर्द घूमती यह लघुकथा, मंथन के कोण को समेटे है। माहौल और उसी के अनुरूप ढाले गये संवादों का तालमेल इतना सटीक है कि पाठक स्वयं अपने को उस परिस्थिति में समझता है और जहाँ पाठक स्वयं अपने को जुड़ा महसूस करें, ऐसी लघुकथाएँ बरसों तक याद रह जाती हैं।
लेखक ने लघुकथा में मानवीय स्वभाव को बड़ी बारीकी से बुना है। पहले पात्र के पास बड़ी सरकारी रकम है, इसलिए न चाहते हुए भी वह सहज नहीं हो पा रहा है। माहौल ने उसके मन को इतना जकड़ लिया है कि वह परिस्थितियों के केवल स्याह पक्ष को ही देख पा रहा है।
लघुकथा में शुरू से जो रहस्य बना था, वह अंत तक बना रहा और इस रहस्य को बनाए रखने में शीर्षक ने भी अपनी अहम भूमिका निभाई। कुशल कलम ने शब्द -संयोजन का ऐसा प्रवाह बना दिया कि पाठक बिना ऊब के अंत तक कथा के साथ बँधे रहेंगे।
जैसी की लघुकथा प्रभाव जितना अधिक होगा, लघुकथा का स्तर उतना ही उत्तम होगा। मात्र एक शब्द ‘टिफिन’ ने लघुकथा की धारा ही बदल दी। मानवीय मूल्यों का आधार और भार, ‘टिफिन’ पर टिक गया। यह एक गूढ़ आश्वस्ति भी दे गया कि टिफिन लेकर चलने वाला इंसान साधारण, ईमानदार इंसान ही है, उससे इतर कुछ नहीं। गहराई से आँकें, तो ‘टिफिन’ मध्यम वर्ग के उस नौकरीपेशा आदमी का प्रतिनिधित्व करते हुए दिखाया गया है जिसका ध्येय नौ से पांच की नौकरी कर अपने परिवार को पालना है।
स्याह से ज्यादा श्वेत पक्ष हमेशा असरदार, आश्वस्ति- भरा और आशाओं से परिपूर्ण होता है। इस लघुकथा का यह सबसे ज्यादा सुदृढ़ पक्ष रहा है। लेखक, अपनी लेखनी से कथा की धारा को मोड़ने में पूर्णतया पारंगत है, ऐसा इस लघुकथा से यह प्रमाणित होता है।
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1-बुलावा/ अंजू खरबन्दा
ठक-ठक….!
“कौन ? दरवाजा खुला है आ जाओ।’’
“राम राम चन्दा!’’
“राम राम बाबूजी! आप यहाँ!’’
“क्यों मैं यहाँ नहीं आ सकता?’’
“आ क्यों नहीं सकते ! पर यहाँ आता ही कौन है!’’
‘‘आया न आज ! ये कार्ड देने मेरे बेटे की शादी का!’’
‘‘कार्ड ! बेटे की शादी का !’’
‘‘हाँ अगले महीने मेरे बेटे की शादी है तुम सब आना।’’
‘‘……!’’
‘‘…और ये मिठाई सबका मुँह मीठा करने के लिए!’’
काँपते हाथों से मिठाई का डिब्बा पकड़ते हुए चंदा बोली- ‘‘हम तो जबरदस्ती पहुँच जाते है शादी ब्याह या बच्चा पैदा होने पर तो लोग मुँह बना लेते हैं और आप हमें बुलावा देकर…!’’
आगे के शब्द चंदा के गले में ही अटक कर रह गए ।
‘‘चन्दा, बरसों से तुम्हें देख रहा हूँ सबको दुआएँ बाँटते!’’
‘‘…..!’’
‘‘याद है जब मेरा बेटा हुआ था तो पूरा मोहल्ला सिर पर उठा लिया था तुमने खुशी के मारे।’’
‘‘हाँ! और आपने खुशी- खुशी हमारा मनपसंद नेग भी दिया था !’’
‘‘तुम लोगों की नेक दुआओं से मेरा बेटा पढ़ लिख कर डॉक्टर बन गया है… और तुम सबको उसकी शादी में जरूर आना है !’’
‘‘क्यों नहीं आएँगे बाबूजी! जरूर आएँगे ! आपने इतनी इज्ज़त मान से बुलाया है तो क्यों न आएँगे!’’
कहते हुए चंदा की आँखें गंगा जमुना- सी बह उठी और उसका सिर बाबूजी के आगे सजदे में झुक गया ।
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2-निशानी/संतोष सुपेकर
रात ज्यादा हो चुकी थी। सर्दी के मौसम में, उस सुनसान से लम्बे, ऊँचे पैदल पुल की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए अब मैं पछता रहा था। मेरे बैग में अड़सठ हजार रुपये की सरकारी रकम थी। दफ्तर में ज्यादा देर हो जाने के कारण जल्दी घर पहुँचने के चक्कर में इस सुनसान किन्तु शॉर्टकट रास्ते का मोह संवरण नहीं कर पाया था मैं। कड़कड़ाती सर्दी में भी चेहरे पर पसीने की बूँदें, सीढ़ियाँ तेजी से चढ़ने के कारण थीं या घबराहट के कारण, कहना मुश्किल था। बदन पर लदा कोट भी उतार फेंकने की इच्छा हो रही थी। तभी मेरी चाल और धड़कन ज्यादा तेज हो गयी जब देखा कि पीछे दूर, धुंध में एक लम्बा आदमी ओवरकोट-सा पहने चला आ रहा है। ‘‘अरे बाप रे, मरे… कोई लुटेरा ही होगा, मेरे पास रकम है, भाँप लिया होगा, अब क्या करूँ, माय गॉड…” मेरी चाल, घबराहट और बढ़ने लगी, पसीना टपकने लगा। यह पुल भी कितना लम्बा है। ऐसे सुनसान में तो ये आराम से लूट लेगा मुझे। चलो लूट लिया, तो चलेगा, सरकारी रकम है, एफआईआर कर दूँगा, या रिकवरी भर दूँगा पर… पर इसने कहीं चाकू घुसेड़कर आँतें निकाल दीं तो… हाँ यह भी पॉसिबल है, मेरी लाश के पास से बैग छीनना तो ज्यादा सरल होगा उसके लिए… चलो, होई है सोई जो राम रचि… पुष्पा को जॉब मिल ही जाएगा मेरी जगह, पर बच्चे…मेरा कलेजा मुँह को आने लगा, ‘‘बच्चे तो अभी छोटे हैं, उनका क्या…” अनहोनी की आशंका में मेरी सोच कहाँ से कहाँ पहुँच चुकी थी।
अब तक उस आदमी की आहट नजदीक न पाकर, हिम्मत करके पीछे देखा… ‘‘अरे इसके हाथ में क्या है? ओऽऽऽह…” -मैंने चैन की लम्बी साँस ली, ‘‘ओह, मेरा पहले ध्यान ही नहीं गया था इस तरफ” मेरी जान में जान आ गई, एकाएक आश्वस्त हो गया मैं। धाड़-धाड़ बजता दिल सामान्य होने लगा, ‘‘यह चोर-लुटेरा नहीं हो सकता, हो सकता है क्या, है ही नहीं।’’
उसके हाथ में टिफिन था, टिफिन, तीन-चार खानों वाला बड़ा-सा भोजन का डिब्बा । चोर-लुटेरों की नहीं, मेहनतकश आदमी की निशानी, टिफिन बॉक्स !
अभी भी वह मुझसे पीछे था; पर मेरी सोच से आगे निकल चुका था।
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