जून 2026

भाषान्तरजन-गण-मन     Posted: November 1, 2024

गढ़वाली अनुवाद: डॉ. कविता भट्ट

चवन्नी लीक फीता जनी सपेद देसी चुइंगम, तिरंगी झण्डी वाळी सीक पर लपेटी क फेरी वाळा न छुट्टा नौना का हाथ म दे कि बोली, ‘‘ली बेटा, आज द्वि- द्वि मजा ली। आज आजादी कु दिन च। मिठै खा अर तिरंगा झण्डा थैं लहरै ले!’’
मिठै कु फीता गिच्चा न चबौंदी चबौंदु वे छुट्टा नौना की आँख्यों म सुबेरी कु दृश्य घूमी गे। स्कूल म तिरंगु झण्डा लहरौंदी बगत हेड मास्टर जी थैं वेनि देखी छौ अर सबु न जन-गण-मन गायी छौ।
छुट्टा नौना न कुछ सोची अर आस-पास खेलदारा खोळा का चार-पांच नौनौं थैं नजीक बुलायी। तब वु छत म चढ़ी गे अर मुंडेरा एक दुळळा म तिरंगी झण्डी वाळी सीक थैं फँसै की  नीस ऐ गी।
‘‘आवा हम बी झण्डा लहरौला अर जन-गण-मन गौला।’’
यां पर पिण्टू न छुट्टा नौना की तरफाँ हीणी नजर सि देखी अर बोली, ‘‘त्वेन यीं झण्डी की मिठै हमु थैं नि खलाई….हम नि गाँदाँ जन-गण-मन!’’ अर सब्बी वे थैं खिजै कि भागी गेन। वु रुंदाण्या सि ह्वेकि मां मुं गे अर छ्वारों की शिकैत करिक अपड़ा दगड़ी जन-गण-मन गाणै की जिद्द कन्न लगी गे। माँ न घौर क कामु म व्यस्त हूण कु बानू बणै कि वे थैं  झिड़की द्याई। वु फीर उदास ह्वे ग्याई।
कुछ सोचदी-सोचदु छुट्टु नौनु भैर आयी। अफु थैं आदेश देंदु अर वु सावधान-विश्राम की कोसिस कन्न लगी गे अर सैल्यूट मारिक मगन ह्वेकि गांण लगी गे- जन-गण-मन अधिनायक जय हे! झण्डी बथौं मां फरफर कन्नी छै। छुट्टा नौना न देखि कि किरमोळौं की एक लकीर वीं मीठी सीक पर चढ़णी-उतन्नी छै। 

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