सितम्बर 2026

दस्तावेज़हिंदी लघुकथा और मीडिया: सामाजिक सन्दर्भ     Posted: September 1, 2024

यह एक प्रासंगिक बहस है कि क्या लेखकों/साहित्यकारों और पत्रकारों की समाज के प्रति कोई जिम्मेदारी है। यह बहुचर्चित विषय रहा है कि साहित्य समाज का दर्पण होता है, और एक लेखक का यह दायित्व बनता है कि वह समाज के यथार्थ को अपने साहित्य में यथायथ स्थान दे। साहित्य का सीधा सम्बन्ध पत्रकारिता से भी रहा है, अत एव एक पत्रकार का भी अपने समाज के प्रति उतनी ही जिम्मेदारी बनती है जितनी एक साहित्यकार की। परन्तु आज यह प्रश्न खड़ा होता है कि क्या साहित्यकार और पत्रकार अपने दायित्व का निर्वहन सही ढंग से कर रहे हैं या नहीं।  प्रश्न नैतिक जिम्मेदारी का है; लेकिन कई विद्वानों का तर्क है कि साहित्य को नैतिकता के निकष पे नहीं परखा जा सकता; क्योंकि यह वैयक्तिकता और स्वच्छन्दता से ही प्रभावी बन पाता है। आज अनेक साहित्य-सर्जक किसी न किसी विचारधारा से सम्बद्ध होने के कारण समाज के यथार्थ को एकांगी दृष्टिकोण के साथ परोस रहे हैं। बात पत्रकारों की करें तो उनके लिए नैतिकता से ऊपर अपने समाचारपत्र अथवा पत्र-पत्रिका व मीडिया चैनल की बाज़ार में अधिकाधिक ग्राह्यता एवं लोकप्रियता रहती है, जिस कारण यथार्थ की प्रस्तुति का दृष्टिकोण ही परिवर्तित अथवा विकृत हो जाता है।

हिंदी लघुकथाकार कई समसामयिक सामाजिक मुद्दों और समस्याओं को गंभीर व्यंग्यात्मक मोड़ और तीखे अंत के साथ प्रस्तुत करते रहे हैं, जो पाठकों की सोच में चुभन पैदा करते हैं और उनके दिमाग में घर कर जाते हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि ये लेखक नैतिक रूप से अपने परिवेश और सामाजिक घटनाओं पर निरंतर नजर रखकर एक पत्रकार का काम करते रहे हैं। पत्रकार जिन मुद्दों को सादे और नीरस ढंग से और कभी-कभी तोड़े-मरोड़े ढंग से प्रस्तुत करते हैं, लघुकथाकार उन्हें साहित्यिक आस्वाद एवं सरसता के साथ-साथ पूरी सहानुभूति और उद्देश्य की गंभीरता के साथ प्रस्तुत करते हैं और पाठकों से सीधा जुड़ाव बनाकर उन मुद्दों को विचारोत्तेजक बना देते हैं। जहाँ पत्रकार विशुद्ध रूप से व्यावसायिक इरादे से अपनी कहानियों को सनसनीखेज और रोंगटे खड़े करने वाला बनाते हैं, वहीं लघुकथाकार अपनी कहानियों को पाठकों के दिल और दिमाग को मार्मिक ढंग से छूने और उनकी आत्मा में सामाजिक कर्तव्य के प्रति जागरूकता जगाने का प्रयास करते हैं।

हिंदी लघुकथाकार श्याम सुंदर अग्रवाल की “उत्सव” शीर्षक वाली इस लघुकथा ने साहित्यकारों और पत्रकारों की दृष्टि और नैतिकता के अंतर को प्रभावी ढंग से रेखांकित किया है। लेखक घटना को एक पंक्ति में बता देता है: “साठ फुट गहरे बोरवैल में  फँसे नंगे बालक प्रिंस को सही सलामत बाहर निकाल लिया गया।” इस दुस्साध्य कार्य में सफलता का श्रेय लेखक सेना और प्रशासन के प्रयासों को देता है: ‘‘सेना और प्रशासन की दो दिनों की जद्दोजेहद अंतत: सफल हुई। वहाँ विराजमान राज्य के मुख्यमंत्री एवं जिला प्रशासन ने सुख की साँस ली। बच्चे के माँ-बाप व लोग खुश थे।” वहाँ उत्सव के जैसा माहौल देखा जा सकता है। इलैक्ट्रॉनिक मीडिया सारे घटनाक्रम को दिखाता है, ‘‘दीन-दुनिया से बेखबर इलैक्ट्रॉनिक मीडिया दो दिन से निरंतर इस घटना का सीधा प्रसारण कर रहा था।” लेकिन लेखक ने नेताओं और मीडिया वालों के रवैये और दृष्टिकोण को व्यंग्यपूर्ण ढंग से उजागर किया है: ‘‘मुख्यमंत्री के जाते ही सारा मजमा खिंडने लगा। कुछ ही देर में उत्सव वाला माहौल मातमी-सा हो गया। टी.वी. संवाददाताओं के जोशीले चेहरे अब मुरझाए हुए लग रहे थे।” एक युवक द्वारा अपने गाँव की समस्या मीडियाकर्मी को बताए जाने के दृश्य को लेखक ने प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया है: 

“हमारे गाँव में भी ऐसा ही एक गहरा गड्ढा नंगा पड़ा है,” युवक ने बताया।

“तो फिर मैं क्या करूँ?” झुँझलाया संवाददाता बोला।

“आप महकमे पर जोर डालेंगे तो वे गड्ढा बंद कर देंगे। नहीं तो उसमें कभी भी कोई बच्चा गिर सकता है।”

संवाददाता के चेहरे पर फिर थोड़ी रौनक दिखाई दी। उसने इधर-उधर देखा और अपने नाम-पते वाला कार्ड युवक को देते हुए धीरे से कहा, “ध्यान रखना, जैसे ही कोई बच्चा उस बोरवैल में गिरे मुझे इस नंबर पर फोन कर देना। किसी और को मत बताना। मैं तुम्हें इनाम दिलवा दूँगा।”

लेखक का कथ्य व संदेश स्पष्ट है ― मीडिया के लिए कोई भी मुद्दा सनसनी पैदा करने के लिए होता है, जबकि साहित्यकार के लिए वह संवेदना और सहानुभूति का विषय होता है।

आज के साइबर युग में मानव जीवन अत्यधिक यांत्रिकता तथा डिजिटल एवं सांख्यिकीय आंकड़ों से भर गया है, जो लघुकथाकार सुकेश साहनी के लिए चिंता का केंद्र बन गया है। उनकी लघुकथा ‘कंप्यूटर कंप्यूटर प्रौद्योगिकी के प्रभाव में लोगों की आधुनिक जीवन शैली को बहुत सुंदर और प्रतीकात्मक रूप से चित्रित करती है, जो मानवीय भावनाओं और मूल्यों से पूरी तरह से रहित है। कंप्यूटर अपने आभासी तरीकों से इंसानों को हमेशा अपने साथ बांधे रखता है।  आज, लोगों को खुले मैदान में किसी सामाजिक कारण के लिए लड़ने के बजाय कंप्यूटर पर ही अपना गुस्सा, नाराजगी, असहमति या असंतोष व्यक्त करते देखा जा सकता है। सुकेश साहनी ने इस तथ्य को बारीकी से उकेरा है:

पलक झपकते ही वह खूबसूरत युवती में तब्दील हो गया। फिर सम्मोहित कर देने वाले नारी स्वर में बोला, “दो संप्रदायों की उग्र भीड़ को शांत करने के लिए पुलिस को हल्का बल प्रयोग करना पड़ा, जिसके कारण बीस लोगों को चोटें आई है। एहतियात के तौर पर शहर के बारह थाना क्षेत्रों में कर्फ़्यू लगा दिया गया है।”

प्रतिक्षण नए-नए समाचार के साथ, कम्प्यूटर पर निरन्तर दृश्य बदलते रहते हैं; लेकिन दर्शक केवल इसकी एक-तरफ़ा प्रस्तुति और बयानी को सच मानता रहता है।

भीड़ से तेज भनभनाहट उभरी। नदी-नालों में बह-बहकर आ रहे अधजले शवों को लेकर जनता में भारी रोष व्याप्त था। वह बिजली के बल्ब की तरह दो-तीन बार जला-बुझा, फिर गृहमंत्री के रूप में सामने आकर आवाज़ में मिश्री घोलते हुए बोला, “कृपया अफवाहों पर ध्यान न दें। जहाँ तक नदी-नालों में बहकर आ रहे अधजले शवों का प्रश्न है तो कोई नई बात नहीं है। देश के कुछ भाइयों का मानना है कि अंतिम संस्कार के दौरान अधजले शव को नदी में बहा दिया जाए तो मृतात्मा को मुक्ति मिल जाती है। ये शव को इसी प्रकार के हैं। हम अपने देशवासियों की धार्मिक भावनाओं का सम्मान करते हैं।” . . . राजनीतिक कारणों से सरकार बर्खास्त कर दिए जाने की बात आग की तरह चारों ओर फैल गई थी। लोग फिर उसके सामने जमा होने लगे।

दर्शक की प्रतिक्रिया के लिए कम्प्यूटर की दुनिया में कोई स्थान नहीं है। लेखक ने व्यंग्यात्मक ढंग से इस सत्य को कहा है:

पढ़े-लिखे बेरोजगार युवक गुस्से में भर कर उसकी ओर बढ़ने लगे। किसी ने आगे बढ़कर उसका कान उमेठ दिया। वह अदृश्य हो गया।

“खाली—खाली—एमटि—एमटि—” अब केवल उसकी खरखराती आवाज़ सुनाई दी।

“क्या बकवास है” एक युवक दाँत पीसते हुए चिल्लाया।

“डेटा फीड करो—डेटा फीड करो—डेटा फीड करो—डेटा फीड करो—डेटा फीड —” वह किसी टेप की तरह बजने लगा।

निस्सन्देह कम्प्यूटर की आभासीय दुनिया में जीने को विवश आज का मानव आधारभूत जीवन-मूल्यों से ही रिक्त होने लगा है, जो सच में एक विचारणीय विषय बन गया है।

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि आजकल मीडिया के साथ-साथ सोशल मीडिया भी इंसान के दिमाग और जीवनशैली पर गहरा प्रभाव डाल रहा है। सोशल मीडिया ने पति-पत्नी के बीच के अंतरंग संबंधों को भी प्रभावित किया है, जैसा कि लघु कथाकार सुकेश साहनी ने अपनी लघु कहानी ‘फेस टाइम’ में दर्शाया है:

उसकी नजरें अपनी महिला मित्र की बहुत ही उत्तेजक प्रोफाइल पिक्चर पर पड़ीं। वह बड़ी देर तक उसे बड़ा करके देखता रहा, बहुत सोचने विचारने के बाद उसने कमेंट में धाँसू का संकेत करता ईमोजी पोस्ट कर दिया। फोन लो-बैट्री का संकेत करने लगा तो वह बैठक से बैडरूम में आ गया। यहाँ पत्नी भी अपने फ़ोन पर व्यस्त थी। ‘‘अब बस भी करो,” फ़ोन को चार्जिंग में लगाते हुए उसने कहा, ‘‘दिन-रात इसी में लगी रहती हो।”. . . पत्नी ने उसकी बात पर कोई ध्यान नहीं दिया, मुस्कराते हुए कुछ टाइप करने लगी। यह देखकर उसका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। “मैंने तुमसे कुछ कहा? सुनाई नहीं देता!” वह चिल्लाया, “फोन रखो। मुझे सोना है।“ “तुम्हें मना किसने किया है, सो जाओ। मुझे अभी देर लगेगी,” पत्नी ने रुखाई से कहा, “तुम ख़ुद दिन रात फ़ोन से चिपके रहते हो, मैंने कभी कुछ कहा!” . . . गुस्से में तमतमाते हुए उसने कमरे की लाइट बंद कर दी और पत्नी की ओर पीठ कर लेट गया। मैसेंजर पर चल रही चैटिंग की हल्की आवाज़ उसके कान में पिघले सीसे-सी पड़ रही थी। बहुत देर तक पत्नी ने फ़ोन नहीं रखा, तो उसने करवट बदलकर देखा, पत्नी फेसटाइम वीडियो पर थी। स्क्रीन की लाइट में पत्नी का चेहरा चमक रहा था। उसके चेहरे पर बहुत ही मोहक मुस्कान थी। उसे याद आया ऐसी मुस्कान तो पत्नी के होठों पर तब होती थी, जब लवमैरिज से पहले वे डेटिंग पर जाते थे। तो क्या. . .? इसका मतलब। ज़रूर उसका चक्कर किसी से चल रहा है. . . वह अंगारों पर लोटने लगा।

‘आप मियाँ फ़ज़ीहत, औरों को नसीहत’― यह कहावत यहाँ चरितार्थ होती दीख पड़ती है। पति स्वयं फ़ोन के प्रभाव से बच नहीं पाया है, तो वह अपनी पत्नी से क्या अपेक्षा कर सकता है। कुल-मिलाकर सोशल मीडिया घर-घर तक, मन-मस्तिष्क के अन्तर्तम कोर तक इतना प्रभाव बना चुका है कि अब यह अभिन्न अंग-सा लगने लगने लगा है। लेखक ने इस सामाजिक यथार्थ की जटिलता को मार्मिकता के साथ उकेरा है।

डिजिटल तकनीक ने न केवल हमारी जीवनशैली को बदल दिया है, बल्कि इसने हमारे सोचने के तरीकों को भी काफी प्रभावित किया है। मोबाइल फोन मानव विकास के लिए तो वरदान साबित हुआ है, लेकिन साथ ही यह पारस्परिक मानवीय रिश्तों और पारिवारिक मूल्यों को कायम रखने में मानवता के लिए अभिशाप भी बन गया है। महेश शर्मा की लघुकथा ‘‘लव जिहाद’’ मीडिया और सोशल मीडिया के गहरे प्रभाव के अन्तर्गत धर्म, समुदाय और जाति के मतभेदों के बीच फंसे समकालीन भारतीय समाज के एक महत्वपूर्ण मुद्दे को उठाती है।

“बेकस पर करम कीजिए! सरकारे मदीना!” इस गाने की आवाज़ जैसे ही शर्मा जी के कानों में पड़ी, तो वह एकाएक हड़बड़ा उठे। “विधर्मियों का गाना? मेरे घर में? वे भौंचक्के रह गये कौन बजा रहा है साला?  . . .अपनी बेटी के कमरे में घुसे। बिस्तर के पास वाली टेबल पर एक मोबाइल फोन था, जिस पर कोई कॉल कर रहा था और रिंगटोन के रूप में यह गाना बज रहा था। . . . फोन उनकी बेटी का ही था. . .। . . . चश्मा लगाकर, उन्होंने जब कॉल डिटेल चैक की, तो जो पहला नाम स्क्रीन पर चमका, उसे देख, उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। निसार? उन्हें लगा, वे गश खाकर गिर जायेंगे ये वही तो नहीं, जो बिटिया के ऑफिस में काम करता है! उस कुरैशी का लड़का!  . . . निसार के नम्बर पर कॉल बैक कर, फोन अपने कान से लगाया तो उस ओर कॉलर टोन बजने लगी। “दर्शन दो घनश्याम! नाथ मोरी अँखिया-प्यासी रे!” शर्मा जी को सचमुच गश आ गया।

शर्मा जी को अपनी बेटी का किसी मुस्लिम लड़के से संबंध बर्दाश्त नहीं हुआ। इस लघुकथा में लेखक ने कम से कम शब्दों में एक अत्यन्त विषम सामाजिक परिस्थिति की गंभीरता को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त किया है, और यह दर्शाने का प्रयास किया है कि किस प्रकार सोशल मीडिया आज पारिवारिक मर्यादाओं और नैतिक मूल्यों के ह्रास का साधन बन गया है।

जारी………

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