गढ़वाली -अनुवादः डॉ. कविता भट्ट
‘‘मि खाणौ धरदौ, तुम नहे कि तैयार ह्वे जा।”
रमेश नहे कि बाथरूम बिटि भैर निकळी त वा खाणौ ले कि ऐ।
थकुली म रुठि कु गफ्फा तोड़िद बगत रमेशन बोली, ‘‘गीता , क्या पिताजी गै छा ब्याळी अस्पताळम दिखाणौ?”
‘‘जी , डॉक्टर न ऑपरेशन कि वजै से ह्वई कमजोरी बताई। माँ जी छै बुन्नी कि अब बिटि अपड़ा ससुरा जी थैं द्वी बगतौ दूध दिया कर। अब तुमी बतावा घौर म इतगा दूध कख बिटी आण?”
खाँदू-खाँदू रमेश थोड़ा रुकी गे।
‘‘चुन्नू बि अबि छोटू च त वे थैं बि दूध चैंदु। नितर, अबि बिटि वे पर कमजोरी बैठी जाली।”
‘‘हाँ ।” रमेश कु मन कै उधेड़बुण्ण म लगी गे ।
ब्याखुनी दाँ ऑफिस बिटि ऐकि अपड़ु बैग घौरवळी थैं थमै कि रमेश न बोली, ‘‘भोळ बिटि थोड़ी देर म औलु, ऑफिस वाळों न टैम बढ़ै यालि।”
‘‘तुम अर तुमारा ऑफिस वाळा बि ना बस ..” घौरवळी क मुक माँ रुसाणा भौ ऐ गे छा।
‘‘अच्छा मैडम जी , अब खाणौ त खलै दे” – वेन वीं थैं रिझैकि बोली ।
‘‘अच्छा एक बात हौर, खाणौ खाँदु इ निन्द चढी़ जाँदी भै , त ये वगत दूध नि दिया कर। छती म भारीपन- सी ह्वे जाँदु।”
‘‘हौर कमजोर ह्वे जैल्या, चला मि थैं क्या पड़ी।” अबारि वींका मुकै कि नाराजगी बुलाण माँ ऐ ग्यायी।
‘‘त्यारा रौंदु मि थैं कुछ नि ह्वे सकद मैडम जी।” रमेश न वीं पर अंग्वाळ मारिक बोलि।
‘‘ऑफिस म ओवरटाइम कैरि क कुछ आमदनी बि बढ़ी जाली अर उन बि ये बुढेंदी दाँ पिताजी थैं मि से बि जादा दूधै कि जरूरत च।” रात बिस्तरा माँ सोचदु-सोचदु जणी कब वे थैं निन्द ऐ गे……
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