जून 2026

भाषान्तरदूध का गिलास/ दूधौ गिलास     Posted: September 1, 2024

गढ़वाली -अनुवादः डॉ. कविता भट्ट 

‘‘मि खाणौ धरदौ, तुम नहे कि तैयार ह्वे जा।”

रमेश नहे कि बाथरूम बिटि भैर निकळी त वा खाणौ ले कि ऐ।

थकुली म रुठि कु गफ्फा तोड़िद बगत रमेशन बोली, ‘‘गीता , क्या पिताजी गै छा ब्याळी अस्पताळम दिखाणौ?”

‘‘जी , डॉक्टर न ऑपरेशन कि वजै से ह्वई कमजोरी बताई। माँ जी छै बुन्नी कि अब बिटि अपड़ा ससुरा जी थैं द्वी बगतौ दूध दिया कर। अब तुमी  बतावा घौर म इतगा दूध कख बिटी आण?”

खाँदू-खाँदू रमेश थोड़ा रुकी गे।

‘‘चुन्नू बि अबि छोटू च त वे थैं बि दूध चैंदु। नितर, अबि बिटि वे पर कमजोरी बैठी जाली।”

‘‘हाँ ।” रमेश कु मन कै उधेड़बुण्ण म लगी गे ।

ब्याखुनी दाँ ऑफिस बिटि ऐकि अपड़ु बैग घौरवळी थैं थमै कि रमेश न बोली,  ‘‘भोळ बिटि थोड़ी देर म औलु, ऑफिस वाळों न टैम बढ़ै यालि।”

‘‘तुम अर तुमारा ऑफिस वाळा बि ना बस ..”  घौरवळी क मुक माँ रुसाणा भौ ऐ गे छा।

‘‘अच्छा मैडम जी , अब खाणौ त खलै दे” – वेन वीं थैं रिझैकि बोली ।

‘‘अच्छा एक बात हौर, खाणौ खाँदु इ निन्द चढी़ जाँदी भै , त ये वगत दूध नि दिया कर। छती म भारीपन- सी ह्वे जाँदु।”

‘‘हौर कमजोर ह्वे जैल्या, चला मि थैं क्या पड़ी।” अबारि वींका मुकै कि नाराजगी बुलाण माँ ऐ ग्यायी।

‘‘त्यारा रौंदु मि थैं कुछ नि ह्वे सकद मैडम जी।” रमेश न वीं पर अंग्वाळ मारिक बोलि।

‘‘ऑफिस म ओवरटाइम कैरि क कुछ आमदनी बि बढ़ी जाली अर उन बि ये बुढेंदी दाँ पिताजी थैं मि से बि जादा दूधै कि जरूरत च।” रात बिस्तरा माँ सोचदु-सोचदु जणी कब वे थैं निन्द ऐ गे……

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