जून 2026

देशसृष्टि     Posted: August 1, 2024

उस पीपल वृक्ष के चारों तरफ इमारतें खड़ी थीं। कभी इसके चारो तरफ फलदार वृक्ष हुआ करते थे। जब वह छोटे बच्चे थे, तभी उन्होंने यह पीपल का पौधा लगाया था। पीपल उन्हीं के साथ बढ़ते काफी विशाल और छतनार हो गया था। उधर अपनी विस्तारवादी नीति के तहत बढ़ता हुआ शहर इधर तक आ पहुँचा था।
वह टुकड़ा-टुकड़ा जमीन बेचते रहे। वृक्ष कट-कटकर अपनी अस्मिता खोते रहे। उन्होंने पीपल की ओर देखा। वह पीपल जैसे उनसे कह रहा था- ‘एक मैं बचा हूँ और एक तुम बचे हो। थोड़े दिनों बाद हम भी खत्म हो जायेंगे। ऐसे ही यह दुनिया खत्म हो जायेगी …..।”
“नहीं, नहीं” – वे बुदबुदा उठे – “यह सुंदर सृष्टि ऐसे ही खत्म नहीं होगी।”
बाजार जाकर वह कुछ पौधे ले आए। फिर खुरपी लेकर एक जगह गड्ढा खोदने लगे। एक पौधा लगाने के बाद वह दूसरी जगह गड्ढा खोदने लगे।
“मैं भी आपकी मदद करूँ?”
आवाज सुनकर वह चौंके। उन्होंने सिर उठाया। उनके पास खड़ा एक बच्चा मुसकुरा रहा था।
“हाँ-हाँ, क्यों नहीं” -वे बोले।
बच्चे का सहयोग लेकर उन्होंने दूसरा पौधा लगाया।
तीसरे स्थान पर पहुँचते ही कुछ और बच्चे वहाँ पहुँच गए।
“हम भी पेड़ लगाएँगे” -एक समवेत स्वर गूँजा ।
“ठीक है बेटा, तुम लोग भी आ जाओ” -वे मुसकुराए।
देखते-देखते दर्जनों पौधे वहाँ लग गये। उन्होंने पीपल की ओर देखा । वह जैसे उनसे कह रहा था- ”नहीं- नहीं, सृष्टि अब खत्म नहीं होगी; क्योंकि तुमने नवागंतुकों का सहयोग लिया है। ये निश्छल और निष्कपट हैं; इसलिए सृष्टि की रक्षा अवश्य होगी।”

चितरंजन भारती,
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