मूल-सतीश राठी
छत्तीसगढ़ी अनुवादःदीपाली ठाकुर
“कइसे बे! बबा के माल समझे हस का?” गिट्टी म डामर मिलावत टूरा के गाल म थपरा देवत ठेकेदार ह बमकत कहिस।
“कमती डामर म बने पकड़ात नइ हे, ठेकेदार साहब। बने सड़क बनय सोच के डामर ल थोकिन बने डारत हंव।” रिरियावत टूरा ह कहिस।
“मोर काम म तें नवा आये हस, बेटा। अतका डामर म त होगे ठेकेदारी, तैं मोर भट्टा बइठारबे।” तहां समझावत कहिस “ये डामर में बाबू, इंजीनियर, अधिकारी, मंत्री सबके बाँटा हे बेटा। खराब सड़क के दचका महू ल लगथे।”
“चल! ए मा अउ बजरी डार।” मने मन म लागत के गुना-भाग करत ठेकेदार ह कहिस। टूरा ह बुताये मन ले ठेकेदार के कहे अनुसार करे लगिस। ओखर ओरमे मुहू ल देख के ठेकेदार बोलिस, “सबो के पेट हे बेटा। बने सड़क बना देबे अउ छै महीना में गड्ढा नइ परिस त, इंजीनियर साहब ए दारी के ठेका ला दूसर ठेकेदार ल दे देही। इही गड्ढा ह तो सबो के पेट ल भरत हे बेटा।”
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