जून 2026

देशवास्तविक पूजा     Posted: July 1, 2024

गाँव के बाहर तालाब की मेड़ पर बना शिव मन्दिर आसपास के कई गाँवों की आस्था का केन्द्र था। उसी मन्दिर के अहाते के बाहर गाँव के अनेक गरीब दलितों ने अपने छोटे-छोटे झोंपड़े बना रखे थे।
अगस्त के महीने में चार दिन पहले से शुरू हुई बारिश पिछले कई सालों का रिकॉर्ड तोड़ने पर आमादा दिख रही थी। अतिवृष्टि के कारण चारों ओर हाहाकार मचा हुआ था।
नित्यानन्द इस मन्दिर के पुजारी थे, लेकिन पिछले एक हफ्ते से उनके बीमार होने के कारण उनका छोटा बेटा नरेश यह जिम्मेदारी उठा रहा था। नहा-धोकर किसी तरह सुबह सात बजे भरी बरसात में नरेश पूजा करने मन्दिर पहुँचा। सुबह-शाम की आरती में नियमित रूप से आने वाले कुछ और श्रद्धालु भी नरेश के साथ ही पहुँच गए।
नरेश मन्दिर के बाहरी गेट का ताला खोल ही रहा था, तभी दलितों की बस्ती से चीख-पुकार सुनाई दी। ध्यान से सुनने पर यह समझते देर न लगी कि बरसात के कारण किसी का झोंपड़ा बैठ गया है। नरेश साथ में आए श्रद्धालुओं को साथ लेकर
दौड़ता हुआ, उस बस्ती में पहुँचा। एक झोंपड़े की कच्ची दीवार बैठ गई थी और उसी के नीचे दो बच्चे और एक बूढ़ा दबे थे। सबकी तत्परता से सबको सही-सलामत बचा लिया गया।
लौटकर नरेश तालाब में अपने शरीर और कपड़ों पर लगा कीचड़ साफ कर रहा था, तभी उसके एक साथी ने कहा- “यह झोपड़ा गिरने के कारण आज पूजा में देर हो गई।”
रमेश ने कहा- “बिल्कुल भी नहीं। अभी जो कर रहे थे वह पूजा ही तो थी। वास्तविक पूजा तो आज ही हुई है।”

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