जून 2026

संचयनलघुकथाएँ     Posted: May 1, 2024

 1-वेबसीरीज 

“सिड! देख उधर कुछ चल रहा है वहाँ? चल देखें?” 

“सिया! यार रोज़ देखता हूँ मैं इनके तमाशे । ये रोज़ कुछ न कुछ बहस करते रहते हैं।” 

“एनीवे, लेट्स सी यार!” सिया ने कहा।

“उफ्फ! यार तुम भी न….।” 

सिड बेमन- से उनकी बातें सुनने लगा।

प्रतिदिन की भांति मॉर्निंग वॉक और प्राणायाम का सत्र निपटाकर पार्क की मखमली हरी घास पर अपने-अपने आसनों पर बैठे दो अधेड़ व्यक्ति बहस में निमग्न थे।

“तुम्हें क्या लगता है शर्मा! ये जो आजकल ओटीटी नाम का सांस्कृतिक हमला युवा पीढ़ी पर हो रहा है, उस पर सेंसरशिप लगनी चाहिए या नहीं?” 

“देख दिवाकर! परिवर्तन प्रकृति का नियम है।और समय की माँग भी। आज दो हज़ार तेईस में हम अठारहवीं शताब्दी के रहन-सहन, भाषा- बोली खानपान और मनोरंजन के साथ नहीं चल सकते।”

“लेकिन हम मलिन भाषा और मलिन दर्शन के साथ भी तो आगे नहीं बढ़ सकते न?” दिवाकर ने कहा।

“भाई! मेरा तो सीधा- सा मत है कि जिस प्रकार और जिस तेजी से युवा पीढ़ी पतन के गर्त में धँसती जा रही है, उसके लिए यही ओटीटी प्लेटफॉर्म्स और  उनकी बेलगाम वेबसीरीज जिम्मेदार है।” शर्मा ने कहा।

“मतलब आप इन पर सेंसरशिप चाहते हैं?” 

“बिल्कुल, शत-प्रतिशत ।” शर्मा ने कहा। 

“मैंने सुना है कि सरकार वेबसीरीज और ओटीटी पर सेंसरशिप ला रही है।” दिवाकर ने कहा।

“अगर ला रही है, तो अच्छी बात है। पर जल्दी लाए, कहीं ऐसा न हो कि टैक्स के लोभ में पानी सिर के ऊपर से बहने लगे। मत भूलो, आज हर युवा की जेब में स्मार्टफोन है।” 

“सही कह रहे हो शर्मा! परिवार के साथ तो देख ही नहीं सकते इन वेबसीरीज को।” 

“पहली बात तो ध्यान से समझ लो दिवाकर! कि यह कोई सामुदायिक व्यूविंग का माध्यम नहीं है। मतलब पूरे परिवार के साथ आप नहीं देख सकते। इसे ज्यादातर अकेले में देखा जाता है; क्योंकि आप अनुमान नहीं लगा सकते कि कब कोई पात्र भद्दी गाली-गलौज करने लगेगा, कब कोई नायिका या स्त्री पात्र निर्वस्त्र हो जाएगा।” 

“मुझे लगता है आप एक ही आँख से सभी को देख रहे हो दिवाकर! सारे प्रोग्राम सेक्स, गाली- गलौज, धर्म विशेष पर टिप्पणीमूलक ही नहीं होते; बल्कि कुछ अच्छे भी होते हैं।” 

“हाँ, हाँ मैंने कब कहा कि नहीं होते हैं। पर कितने प्रतिशत?” 

“कहना क्या चाहते हो दिवाकर!”

मैं कहना चाहता हूँ कि जो भी भौंडापन है, अशिष्टता और असांस्कृतिक है, सब वहाँ परोसा जाता है; इसलिए सेंसरशिप बहुत जरूरी है।” 

“क्या एक लेखक- निर्देशक अपना कोई मत नहीं रख सकता है?” शर्मा ने कहा।

“क्यों नहीं? जरूर रख सकता है । पर क्या यही लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का नाजायज फायदा नहीं उठा रहे हैं?” दिवाकर ने कहा।

धीरे-धीरे आसपास के अन्य लोग भी इकट्ठा होने लगे। उन्हें भी इस बहस में आनंद आने लगा था।

“सिया, चल यार यहाँ से,दोनों साले सठियाए हुए बकवास कर रहे हैं। कह रहे हैं कि वेबसीरीज पर सेंसरशिप लगनी चाहिए। ऊहूँ … ओल्ड पिग्स।”

कहकर सिड ने मुँह बिचका दिया।

“गॉड! व्आट द हैल! ये लोग क्या कह रहे हैं? अगर वेबसीरीज पर सेंसरशिप लग गई, तो इन्हें देखने का मज़ा ही किरकिरा हो जाएगा। ओपन कहने और देखने का जो मज़ा है, वो तो जाता रहेगा फिर, ये अंकल लोग, खाली- पीली में ओटीटी को भी दूरदर्शन बनाना चाहते हैं क्या? आई थिंक, इनका कुछ नहीं हो सकता सिड! ये तो खुद चलते – फिरते सेंसरशिप हैं।” 

सिया ने चिड़चिड़ाते हुए कहा।

“ओ कमऑन सिया! छोड़ इनको, चल आज तुझे एक ऐसी सीक्रेट जगह दिखाता हूँ, जहाँ कोई नहीं आता-जाता एकदम सेफ़।” 

सिया के कान में फुसफुसाते हुए सिड ने उसकी कमर में हाथ डाला और उसे खींचते हुए दूर ले गया।

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2-रचयिता

“तुम तो लेखक हो न?” 

दिवाकर ने प्रश्नकर्ता को ऊपर से नीचे तक देखा। वह पैबन्दो से भरी आधी बाँह की घुटनों को स्पर्श करती हुई मटमैले रंग की कमीज और गंदा-सा काला पाजामा पहने हुए था। उसकी खिचड़ी दाढ़ी- मूँछ और बेतरतीब बिखरे बाल थे । उस अधेड़ ने कंधे पर एक झोला लटका रखा था । 

“हाँ, तुम्हें कैसे पता चला कि मैं एक लेखक हूँ?” 

“मैं तो आपका नाम भी जानता हूँ- ‘दिवाकर’- सही है न?”

“हाँ, कौन हो तुम और मुझे कैसे पहचानते हो?” दिवाकर ने हैरत से पूछा ।

“इस किताब के लेखक तुम ही हो न?” 

उसने झोले में से एक किताब निकाली। शीर्षक था –‘खेतिहर हुए खेत’ दिवाकर तुरंत पुस्तक को पहचान गया। पार साल प्रकाशित यह उसकी सर्वाधिक चर्चित पुस्तक थी। यह इस भिखारी के पास!” 

अब दिवाकर को यह व्यक्ति रहस्यमयी लगने लगा। 

‘‘मैं जानता हूँ तुम्हारा समय कीमती है; पर अपने पाठक पर, क्या तुम कुछ समय निछावर नहीं कर सकते हो? ” दिवाकर के मन में आया कि कोई बहाना बनाकर पीछा छुड़ा ले; लेकिन फिर कुछ सोचकर वह मान गया । 

सिर्फ दस मिनट हैं तुम्हारे पास, जो कहना है जल्दी कहो । मुझे एक साहित्यिक समारोह में शीघ्र पहुँचना है।”

“बहुत मेहरबानी, आइए सामने वाली बेंच पर बैठते हैं।” कहकर वह चल दिया और दिवाकर भी यंत्रवत् उसका अनुसरण करने लगा। 

” बैठिए।” 

“कहिए क्या कहना चाहते हो?” दिवाकर ने बेंच पर बैठते हुए पूछा ।

“क्या तुम मानते हो कि जो कुछ भी तुमने इस पुस्तक में लिखा है, वह यथार्थ है? झूठ नहीं, अतिरंजित नहीं?”

“बिल्कुल यथार्थ है । मैंने शोध करके पुस्तक लिखी है । महीनों सुबह से शाम तक शहर की नामी लाइब्रेरी में घंटों बैठकर आँकड़े तैयार किए हैं, तथ्य इकट्ठे किए हैं । एक भी आँकड़ा और तथ्य,कोई ग़लत साबित नहीं कर सकता।”

‘‘वे आँकड़े आपको कहाँ से मिले?” 

‘‘राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर के समाचार- पत्रों, पत्रिकाओं और इंटरनेट आधारित आलेखों से ।’‘ 

‘‘तुमने उनकी पड़ताल की?” 

‘‘मतलब!” 

‘‘मतलब, जिन खेतिहरो की आपदा और प्रशासन की उदासीनता के कारण मृत्यु हुई, उनके खेतों, उनके परिवारों से जाकर कभी मिले?’‘ 

दिवाकर निशब्द उस व्यक्ति को देखने लगा ।

‘‘उनकी मृत्यु के बाद उनके परिवारों में जो शेष जिंदा रह गए हैं, वे लोग किस प्रकार मुर्दों की भाँति जड़ हो गये हैं, तुम्हें पता है? और जो पेट और बच्चों की खातिर पलायन कर गये, वे अब कहाँ, कैसे, और किस हाल में जिंदा है? उनके आँकड़े हैं तुम्हारे पास? उनका तो तुमने जिक्र तक नहीं किया इसमें?’‘ 

दिवाकर का चेहरा गंभीर होने लगा। वह उस व्यक्ति के चेहरे के आर- पार देखने का प्रयत्न करने लगा। 

‘‘कौन हो तुम?” दिवाकर ने पूछा। 

‘‘ इतने बड़े लेखक कहलाते हो अभी भी नहीं समझे कि मैं कौन हूँ?”

‘‘ कहीं तुम उन….”

‘‘तुम्हारे दस मिनट पूरे हुए”‘ उसने बात काटते हुए कहा ।

‘‘और हाँ, लेखक महोदय!  आँकड़े सबकुछ बयान नहीं करते। खेतिहर और खेत पर लिखते हो, तो खेतिहर का चूल्हा, खेत की मिट्टी की सुगंध, लू का थपेड़ा, और पूस की ठिठुरन को भी पास से महसूस करो। तब तुम सच्चे लेखक कहलाओगे। समाचार- पत्रों और इंटरनेट में पसीने की महक और रीते पतीलो का भात नहीं दिखाई देता।”

कहते हुए वह पुस्तक बेंच पर रखकर चल दिया ।

दिवाकर कभी बेंच पर रखी पुस्तक, तो कभी दूर जाते हुए उस अजनबी को देखने लगा।

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3- चरणदास  

‘‘श्रीवास्तव जी बड़ी अजीब बात है, आदमी चेहरे पर कितने मुखौटे लगाता है। जिसे देखो वही एक मुखौटा लगाए घूम रहा है।” 

‘‘क्या बात है पांडे जी! किसकी बात कर रहे हो?” 

‘‘अरे अपने त्रिपाठी जी की।” 

‘‘क्यों क्या हुआ त्रिपाठी जी को? भले आदमी हैं, प्रबुद्ध हैं, और जहाँ तक मैं समझता हूँ सबको उचित और सही ही सलाह देते हैं।” श्रीवास्तव ने कहा।

‘‘अरे कल मैं इनके मोहल्ले की तरफ से गुजर रहा था तो सोचा,दुआ-सलाम ही करता चलूँ । तो इनके घर पहुँच गया। दरवाजा खुला देखा तो मै सीधे ही अंदर चला गया। अब क्या देखता हूँ, कि त्रिपाठी साहब… भाभी जी के चरण दबा रहे हैं। मैं तो देखकर ही अचकचा गया। मुझे लगा कि वे भी मुझे देखकर सकपका जाएँगे, परंतु असहज होना तो दूर, वे तो निर्लज्जों की भांति बस चरण दबाए जा रहे थे।”

‘‘मतलब पैर दबा रहे थे! त्रिपाठी जी पत्नी के पैर दबा रहे थे?”- श्रीवास्तव ने ‘पत्नी’ शब्द पर जोर देते हुए पूछा। 

“जी हाँ! वह तो भाभी जी को ही लाज आ गई। वे ही जब उठने को हुईं, तो महाशय कहने लगे कि लेटे रहिए, अपना पांडे ही तो है। कोई गैर थोड़े ही है। ज्यादा सोच- विचार मत कीजिए।”

‘‘क्या बात कर रहे हो पांडे जी!… त्रिपाठी जी पत्नी के पैर दबा रहे थे!’‘ 

‘‘चुप हो जाओ श्रीवास्तव! त्रिपाठी जी इधर ही आ रहे हैं।’’- पांडेजी ने फुसफुसाते हुए कहा।

‘‘कहो भाई क्या विमर्श हो रहा है दोनों विद्वानों में?’’- त्रिपाठी जी ने बैठते हुए कहा। 

‘‘कोई विशेष नहीं, बस आपकी ही चर्चा हो रही थी।” श्रीवास्तव ने सीधे-सीधे कहा। 

‘‘मेरी! भई वाह! रिटायरमेंट के कगार पर पहुँचने पर भी हमारे चर्चे हैं!’’- त्रिपाठी जी ने मुस्कुराते हुए कहा। 

‘‘यह पांडे कह रहा है कि आप कल भाभीजी के चरण दबा रहे थे?’’

‘‘अच्छा तो यह चर्चा है। हाँ यह बात तो सही है। क्यों कोई आपत्ति है क्या तुम्हें?’’ 

‘‘आपत्ति तो कुछ नहीं पर आदमी को आदमी जैसे ही काम करना चाहिए त्रिपाठी जी! मतलब यह पैर-वैर दबाना… यह पुरुषों को शोभा नहीं देता। फिर मत भूलो, ज्यादा चरण दबाओगे तो एक दिन यही चरण वज्र बनकर सीने पर आघात कर देंगे। क्यों पांडेजी सही कहा ना?’’ श्रीवास्तव ने पांडे जी की ओर प्रश्नसूचक मुद्रा में पूछा ।

‘‘हाँ, हाँ, और नहीं तो क्या!’’

‘‘अच्छा श्रीवास्तव! एक काम करो, एक सूची बनाकर दो मुझे कि फलां काम पुरुष का है और फलां काम स्त्री का है।’’- त्रिपाठी ने कहा। 

‘‘हम कहाँ से बनाएँ सूची?……. और हमें क्या पड़ी है? और फिर हमें क्या पता कि कौन-से काम स्त्री के हैं और कौन-से पुरुष के हैं।  पांडेजी ने कहा।

“इंटरनेट, गूगल की सहायता ले लो, आजकल तो सबकुछ उपलब्ध है वहाँ।” 

“अरे हमें क्या जरूरत है लिस्ट-विस्ट बनाने की। हम क्यों बनाएँ?” 

भाई श्रीवास्तव! तुम ही तो बता रहे थे अभी कि यह काम आदमी का है यह औरत का है । अच्छा एक बात बता श्रीवास्तव! , तूने कभी अपनी मांँ के पैर दबाए हैं?”

“हाँ बिल्कुल! बल्कि मैं तो अपने बेटे को भी यही शिक्षा देता हूँ।” श्रीवास्तव ने गर्व से कहा।

“कभी अपनी बेटी के या बहन के पैर दबाए हैं?” 

“हाँ हाँ, क्यों नहीं, जब वे छोटी थीं, बीमार थीं, तो कई दफा मैंने दोनों के पैर दबाए हैं । और वह इसलिए ताकि उनको आराम पहुँचे।” 

“तो ऐसा करके कभी अपराधबोध या हीनता की भावना तुम्हारे भीतर आई?” त्रिपाठी जी ने पूछा। 

“नहीं, ऐसा क्यों महसूस होगा?” 

“अच्छा, एक बात और बताओ श्रीवास्तव! तुम दुनिया में सबसे ज्यादा प्रेम किससे करते हो?” पूछकर त्रिपाठी जी की आँखें श्रीवास्तव के चेहरे की भाव- भंगिमा को पढ़ने लगी।

“अपनी माँ से, अपने बच्चों से, पिता से, परिवार से…” 

“और पत्नी से?” त्रिपाठी जी ने बात काटते हुए पूछा ।

“हाँ पत्नी से भी प्रेम करता हूँ।” 

“तो इन सबके लिए तुम क्या कर सकते हो?”

“क्या कर सकता हूँ? कुछ भी कर सकता हूँ मतलब सबकुछ कर सकता हूँ।”

“तो फिर भेद कहाँ है श्रीवास्तव! फिर ये आश्चर्य क्यों?” मत भूलना, एक माँ तुम्हारे जीवन में सारी भूमिका निभा सकती है, परंतु वो तुम्हारी पत्नी नहीं बन सकती। परंतु एक पत्नी वक़्त पड़ने पर तुम्हारे लिए माँ-समान वात्सल्य भी लुटा सकती है।” -त्रिपाठी जी ने हँसते हुए पूछा।

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4– इडियट

दिवाकर को उसके एक प्रोजेक्ट पर सरकार की तरफ से सम्मानित किया गया था । वह फ़ोन और वाट्सअप पर मिल रही बधाइयों का शुक्रिया अदा कर रहा था कि अचानक एक मैसेज पर आकर उसकी नज़र टिक गई।

“हार्टिएस्ट कॉन्ग्रेचुलेशन्स, यू डिजर्व दिस प्रेज।”

और साथ में थम्सअप वाले दो इमोजी-यह सुधाकर का मैसेज था।

“अरे! देखो तो, किसका मैसेज आया है?” दिवाकर ने पत्नी को आवाज़ लगाते हुए कहा।

“सुधाकर जी का!” पत्नी ने पास आकर पढ़ते हुए कहा।

“जी, मत कहो उस इडियट को… आई हेट हिम।”

दिवाकर ने गुस्साते हुए कहा।

“ठीक है पर थैंक्स तो लिख दीजिए।” पत्नी ने कहा।

“नो, नेवर! किसलिए? किसलिए थैंक्स लिखूँ? तुम नहीं जानती तीन साल हो गए हैं….. बोलचाल बंद है। कोई मौका नहीं छोड़ता मुझे नीचा दिखाने का… सबको मालूम है बॉस के कान भरता है मेरे खिलाफ़। और तो और, पिछले एक साल से अनफ्रेंड किया हुआ है फ़ेसबुक पर मुझे… और तुम कहती हो कि थैंक्स लिखूँ… माय फुट…किसलिए?” दिवाकर ने सुधाकर को कोसते हुए कहा।

“वो इसलिए कि यह कोई सामान्य बात नहीं है। सोचिए इस एक वाक्य को लिखने के लिए उन्होंने ख़ुद से कितना संघर्ष किया होगा। अपने अहम, अपनी इगो से वे कितना लड़े होंगे?.. सबकुछ भुलाकर यदि आज़ उन्होंने एक कदम बढ़ाया है, तो तुम्हें भी पीछे नहीं हटना चाहिए।  तुम्हें भी बताना चाहिए कि बड़ा दिल तुम भी रखते हों।… बाक़ी तुम्हारी मर्ज़ी।”

दिवाकर को पत्नी की बात में गहराई और तार्किकता नज़र आई ।

“तुम ठीक कहती हो मालती!”-दिवाकर ने मुस्कुराते हुए कहा ।

*तो थैंक्स लिख रहे हो न? पत्नी ने पूछा ।

“ नहीं” 

“क्यों?” 

“क्योंकि थैंक्स लिखने में वो मज़ा कहाँ जो फ़ोन करके कहने में है । सच एक अर्सा हो गया इडियट की आवाज़ सुने हुए।”

और दिवाकर की अँगुलियाँ फोन के डायल-पैड पर थिरकने लगी।

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5- हक़ीक़त

“रश्मि! यदि शादी के पैंतीस साल बाद भी, मुझे अपने माता – पिता और तुममें से किसी एक का चुनाव करना पड़े, तो निस्संकोच, मैं अपने माता-पिता को चुनूँगा।” 

“ मतलब श्रीधर ! इन पैंतीस वर्षो में मैंने तुम्हारे हृदय में कुछ भी जगह नहीं बनाई!, इन पैंतीस सालों में मैंने तुम्हें और तुम्हारे बच्चों के लिए…कुछ नहीं किया?” रश्मि ने हैरत से श्रीधर की ओर देखते हुए पूछा।

“सिर्फ़ इसीलिए!” 

“क्या इसीलिए?” 

“जो तुमने अभी कहा।”

“क्या कहा मैंने?”

“यही कि, तुमने मेरे लिए या बच्चों के लिए जो कुछ भी किया है, तुम्हें उसके बदले में कुछ चाहिए। तुमने अपेक्षाएँ गढ़ ली है रश्मि!” 

“क्या तुम्हारे माता – पिता, मेरे माता-पिता नहीं हैं?”

“यह वाक्य कहने में तुमने पैंतीस साल ख़र्च कर दिए रश्मि!…. पर सुनकर अच्छा लगा।”

“श्रीधर ! क्या हम सब एकसाथ नहीं रह सकते? मतलब माँ – बाबूजी और हम सब।”

“रश्मि! क्या तुम सच कह रही हो? कहीं ये तुमने मेरा मन रखने को तो नहीं कहा? “

“नहीं श्रीधर! अब उम्र के साथ अनुभव और समझ के साथ- साथ जिम्मेदारी की भावना भी बढ़ी है, इसीलिए कहती हूँ कि उन्हें इस उम्र में हमारी और भी ज्यादा ज़रूरत है।” रश्मि ने दृढ़ता से कहा । 

“तो ठीक है रश्मि! मैं शाम को ही उन्हें लिवा लाता हूँ।”

“नहीं।”

“नहीं!” 

श्रीधर ने आश्चर्य से कहा।

“तुम अकेले नहीं जाओगे, मैं भी साथ चलूँगी तो माँ – बाबूजी आने से इंकार नहीं कर सकेंगे।” 

“सच रश्मि! ओह रश्मि, तुम कितनी अच्छी हो! आज मैं तुममें अपने सपनों की पत्नी के दर्शन कर रहा हूँ । ठीक है चलो।” 

मंच पर पर्दा गिरते ही तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा प्रेक्षागृह गूँज उठा । सभी लेखक दिवाकर को बधाई देने लगे और पीठ थपथपाने लगे । और दिवाकर मन ही मन सोचने लगा.. 

“काश! मेरी पत्नी भी ऐसा कोई वाक्य, कभी मुझसे कहे।” 

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6-संवेदना

आस-पड़ोस के सब घर दीप, मोमबत्ती और बिजली की लड़ियों से जगमगा रहे थे। परंतु एक घर था जिसे अमावस्या की काली परछाई ने एक दिन पहले ही आ घेरा था। 

“अब कैसे त्योहार मनाएँगे हम?” पत्नी ने चुप्पी तोड़ते हुए दिवाकर से पूछा। 

“तनख्वाह के साथ-साथ इक्यावन सौ का बोनस भी मिला था। कुल मिलाकर पच्चीस हज़ार रुपये थे। पर क्या पता था कि यह दिवाली , काली दिवाली बनकर आएगी इस बार।” दिवाकर ने माथे पर हाथ रखते हुए कहा ।

“सोच रहा था रश्मि! कि कल दिवाली पर तुम सबको नए- नए कपड़े खरीदने बाजार ले जाऊँगा। पटाखे- फुलझड़ियाँ देखकर बच्चे खुशी से झूम उठेंगे। पापा को नया कुर्ता – पजामा दिलाऊँगा।… और तुम्हारे लिए भी तो एक साड़ी लेने की सोची थी मैंने इस बार..…. पर….”

दिवाकर ने एक दीर्घ निश्वास छोड़ते हुए कहा। 

तभी दरवाजे को किसी ने खटखटाया। पत्नी ने जाकर दरवाजा खोला।

“आंटी! ये अंकल आपका घर ढूँढ रहे थे। पड़ोस की बच्ची बताकर चली गयी। यह दिवाकर जी का घर है?” आगंतुक ने पूछा। 

“जी हाँ!”

“क्या वे घर पर है?”

“जी हाँ!” 

“क्या आप उन्हें बुलवा देंगी?” 

“एक मिनट रुकिए, मैं बुलाकर लाती हूँ।” कहकर पत्नी घर के भीतर चली गयी। 

“उस्ताद एक बार फिर सोच लो, मैं फिर कह रहा हूँ, लौट चलो उस्ताद।” आगंतुक के साथी ने कहा।

“चुप!, मुँह बंद रख अपना।” 

आगंतुक ने साथी को डाँटते हुए कहा। 

“पर उस्ताद! उस्ताद भाभी की सोचो कितना उदास रहती हैं, उनको एक बढ़िया-सी साड़ी खरीद के दे दो खुश हो जाएँगी… और अपनी नहीं, तो कम से कम मेरी तो….” 

“चुप्प! बोला न चुप! चुप कर।”

“तो करलो जो जी में आए तुम्हारे”- कहकर आगंतुक का साथी नाराज होकर दूसरी ओर देखने लगा। 

“जी कहिए, मेरा ही नाम दिवाकर है।”

आगंतुक ने गौर से दिवाकर के चेहरे की ओर देखा और फिर जेब से बटुआ निकालकर उसकी और बढ़ाते हुए पूछा। 

“यह शायद तुम्हारा है?”

बटुआ देखकर दिवाकर की आँखें ऐसे चमक उठी जैसे डॉक्टर द्वारा पुत्रजन्म की सूचना पाकर नए- नए बने पिता की आँखें चमक उठती हैं। उसने झट से बटुआ आगंतुक के हाथ से झपट लिया और उसे खोलकर उसमें रखे रुपये गिनने लगा। 

“हाँ! हाँ! यह मेरा ही बटुआ है, तुम्हें कहाँ मिला भाई! तुम्हारा लाख शुक्रिया! तुम तो साक्षात् हमारे लिए अमावस्या के दीप बनकर आए हो, आओ भाई! अंदर आओ ।” 

दिवाकर ने खुशी से झूमते हुए आगंतुक से कहा।

“नहीं,ठीक है, थैंक्यू । गिन लो पैसे पूरे होंगे।” 

“हाँ! हाँ! पूरे हैं भाई, पूरे हैं।”

“ठीक है ।” कहकर आगंतुक हाथ जोड़कर दरवाजे से ही लौट गया। रास्ते में साथी ने पूछा, 

“उस्ताद! आखिर इतनी बड़ी रकम से भरा बटुआ तुमने क्यों लौटा दिया, ऐसा पहले तो नहीं करते थे तुम ?” 

“क्योंकि….”

“क्योंकि क्या उस्ताद?”

“क्योंकि …उसमें उस आदमी के छोटे- से मासूम बच्चे की एक तस्वीर थी।” 

“ओह!” 

साथी के मुँह से निकला, और उसके सामने छह महीने पहले उस्ताद के दिवंगत हुए मासूम बच्चे की तस्वीर तैरने लगी।   

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