
प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र। सुबह। पेशेंट आने शुरू हो गए थे। डॉक्टर नहीं आई थीं, अभी। मैं नर्सिंग कक्ष में अपनी कुर्सी पर विराजमान थी। फटी- सी साड़ी लपेटे भिखारिन जैसी एक महिला आई और सीधी मेरे पाँवों में बैठ गई थी। उसके साथ आई 17-18 साल की वह लड़की पास खड़ी रही। वह फटे-पुराने मैल भरे सलवार सूट में जैसे-तैसे अपना तन ढके थी। उड़े-बिखरे बालों की लटें उसके चेहरे पर गिरती थीं। मैल भरी देह, मानो नहाने-धोने से उसका सरोकार ही नहीं हो। ठहरे पानी पर चढ़ी काई की तरह दोनों के चेहरों पर फिक्र फैली थी।
मेरे पैरों पर उकडू बैठी उस महिला से मैंने पूछा- “बताएँ ?”
उसकी लाल हो आईं आँखों से सर्द आँसू झरने लगे थे, एकाएक। सुबकियाँ-सुबकियाँ हो गई थी। होंठ बेतहाशा थरथराने लगे थे, मानो उसके अंतस में गहरा खौफ हो।
मैंने उससे फिर पूछा- “बताएँ, क्या बीमारी है तुम्हें ?”
अपनी फटी साड़ी के पल्लू से आँसुओं सना अपना चेहरा पोंछकर वह तनिक सहज हुई और घरघराए कंठ कहने लगी-“बहन जी हम भिखारी हैं। इधर-उधर माँगकर, यहाँ-वहाँ पड़े रह कर अपने दिन काट लेते हैं। लेकिन मेरी इस पागल लड़की की जवानी का क्या करें। मरे या जिएँ। शहर के धोलपोशों के मनचले रात दारू पीकर आते हैं और चाकू या कट्टा दिखाकर इसे उठा ले जाते हैं।”
“हें!” मैं डर- सी गई।
“हाँ बहन जी। दो बार बच्ची जन चुकी है यह। दोनों बार मैं उनको पालनाघर में रख आई।” उसकी रूलाई छूट गई थी।
मैं फटीं-फटीं स्तब्ध आँखों उस असहाय गरीबन की ओर देखती रह गई। नारी मन से पूछा-”बच्चियाँ थीं, पालती-पोसती, बड़ी करती उनको। माँ की ममता का हरण हुआ।”
उसमें रोष भर आया-”किनके लिए ? भेड़ियों…..।” शेष बात उसकी आँखों से टप-टप टपकते आँसुओं ने कह दी थी।
“बताएँ, बीमार तुम हो या यह लड़की ?” मैंने पेशेंट स्लिप उठाकर पूछा। उसका कलेजा जैसे ऊपर-नीचे होता रहा। फिर सहसा बोल पड़ी- “बहन जी, रोज-रोज का क्लेश मिटे, इस लड़की की नसबंदी कर दो.”
मैं हतप्रभ। हतवाक् आँखों में दया और भय। कभी उस गरीबन सी उस भिखारिन की ओर देखती थी, कभी उसकी विक्षिप्त लड़की की ओर।
डॉक्टर आ गई थीं।
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