जून 2026

संचयन10-ख़ुदा ख़ैर करे     Posted: September 1, 2025

छवि निगम

“इस बार कत्तई छोड़ दूँगी। ना ना। तुममे कोई रोकियो न बिल्कुल। पानी सर के ऊपर हो राअ बतो” अंदर आँगन से चाची की सुबकियों में डूबती-उतराती दिल दहलाती आवाज़ आयी, तो बाहर खटिया पर अधलेटे चाचा चौंककर  उठ बैठे- ‘ये क्या कह रही थीं..क्या करने जा रही थीं उनकी शरीकेहयात? किसे छोड़ देंगी..क्या उन्हें?’

उनकी साठ साला डेढ़ पसली काया में फँसा सौ ग्राम का दिल धाड़-धाड़ करने लगा। फ़ोन पर पकड़ ढीली होकर छूटी, तो स्क्रीन पर इठलाती हूरें औंधे मुँह खटिया पर गिर पड़ीं। उन्हें नज़रंदाज़ करते लड़खड़ाते हुए चाचा अंदर को चल दिए। पर आँगन में चच्ची की सखियों का जमावड़ा देख वो सकुचाकर  ज़रा आड़ में खड़े हो गये, और अपनी मिजमिजाती आँखें और कान उधर ही टिका दिए।

वहीं, जहां चाची की मानमनौव्वल जोरों-शोरों पर थी,”जाये दो भौजी,लो पान संग गुस्सा चबाय के थूक डालो।”

दूसरी बोली, “ए जिज्जी,तोहर हिरदय तो वइसे भी विसाल बा, जाए दो ना।” किसी और ने सुर में सुर मिलाया, “और क्या। इत्ती भी बड़ी बात नहीं,जो नाराज़ हो रही।”

चाचा को चैन की साँस आने वाली ही थी कि दोबारा अटक गई। समझाने वाली इन बातों ने चाची के गुस्से में बर्फ़ नहीं, घी का काम किया था। वो दहाड़ पड़ीं, “काहे,बड़ी बात ना है ये ? सारे रिस्ते-नाते अक्केले हमीं निबाहते चले जाएँ?न रात को रात समझें, न दिन को दिन। जरूरत पड़ने पर एक पैर से खड़े रहें हम, और जब हमारी बारी आये तो ऊ हमाये पर घमंड झाड़ें..हैं ??”

चाचा के भीतर हौला उठने लगा, जिसे चाची की ललकार छिन्न भिन्न करती चली गई,  “सांती ना, औकात दिखाए का बखत है अब.. जानी तुम लोग ?”

बाहर गिरते-गिरते बचे चाचा। एक पल में पूरी ज़िंदगी जैसे आँखों के आगे घूम गई। सारी खताओं, मनमर्जियों,उनकी भूलों ने पल भर में उन्हें दिन में तारे दिखा दिए। उनकी धुकधुकी बढ़ गई,हाथ पैर कांपने लगे। उधर फ़ोन को हवा में लहराती चाची विस्फ़ोट कर रही थीं,  “काहे हमीदन, तुम्हारे करेले के हलुए को लाइक किये थे न हम,और शीला तुम्हारे चैनल को हमही सस्क्रैब अउर शेयर किये थे न जिसमें तुम रुमाल से कुर्ता बनाने की तरकीब बतायी थी ? और रजिया, तुमाए कित्ते फालोअर बढ़ाये हम..और अनीता, स्टेला तुम..तुम.. “ कहते उनका गला रुँध गया, “का सिला दीं तुम सब ? घण्टा भर हो गया हमें अपनी फोटू डाले…पर तुम लोग झांके तक नहीं। दुसमन कहीं की। अब छोड़ ही देंगे ये सोसल- वोसल सब..कहे देते हैं।”

सब सखियाँ भूल-सुधार में जुटीं, और चाचा मुस्कुराते हुए वापस अपने खटिया रूपी सिंहासन पर चढ़े, और एक बार फ़िर फ़ोन में डूब गए। तभी चाची की सस्पेंसफुल आवाज़ आई, “अर्रे ई का..जे तुम्हारे चच्चा…इस लालमुँही पर लाल दिल कइसे चेंप दिए, हैं ?”

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