लघुकथा डॉट कॉम
फ़िलवक़्त लघुकथा विधा पर केन्द्रित जितनी भी वेब मैगज़ीन प्रकाशित हो रही है , उनमें गत एक दशक से निरंतर प्रकाशित होने वाली ऑनलाइन पत्रिका ‘लघुकथा डॉट कॉम’ श्रेष्ठ है — इसमें मतभिन्नता की कोई गुंजाइश नहीं । कुछ स्थायी स्तंभों के जरिये विधा विषयक विविध पठनीय सामग्री को सुव्यवस्थित ढंग से पूरी समग्रता और गंभीरता के साथ प्रस्तुत करने वाली इस पत्रिका की सृजनरत लघुकथाकारों (नए -पुराने ) , समीक्षकों, हितैषियों को अधीरतापूर्वक प्रतीक्षा रहती है । लघुकथा से इतर साहित्य की अन्यान्य विधाओं में सृजनरत रचनाकर्मियों की भी यह एक चहेती पत्रिका है । यही एकमात्र ऐसी ई-पत्रिका है जिसके प्रत्येक अंक की विषय सूची ‘हंस’ और ‘कथादेश’ जैसी हिंदी की अग्रणी पत्रिकाओं में विज्ञापित हो जाती है । इसकी जबर्दश्त स्वीकार्यता कहें या ‘क्रेज’ ऐसी कि एक मर्तबा इसमें स्थान पाने की उत्कट इच्छा विधा से जुड़े रचनाकर्मी अवश्य पाले हुए रखता है । बावजूद इसके , जहाँ तक मेरी जानकारी है , सोशल मीडिया के किसी भी साइट पर इसके पाठक अपनी पाठकीय अभिमतों से अवगत नहीं कराते |विधा के उन्नयन , समृद्धि और इसकी विकास-यात्रा में महती भूमिका निभाने वाली इस पत्रिका के किसी अंक के ‘खट्टे-मीठे’ ज़ायके की गाहे-बगाहे चर्चा न करना क्या यह विधा के पैरोकारों का कृतघ्नता , घोर उदासीनता और असाहित्यिक आचरण नहीं है ?
इस प्लेटफार्म पर माह के मध्य या अंत में अंक की विषय सूची पोस्ट होते ही बधाई और शुभकामना -संदेशों का ताँता लग जाता है ,अच्छी बात है ; लेकिन अंक प्रकाशित होने के बाद इसकी पठन -सामग्री पर कोई पाठकीय प्रतिक्रिया देखने को नहीं मिलती | हाँ , इतना अवश्य होता है कि रचनाकार बन्धु अपनी -अपनी प्रकाशित रचनाओं को , सम्पादक द्वय का आभार जताते हुए इस मंच पर ‘चेप’ देते हैं । बस!
इस संदर्भ में संपादक द्वय ( भाई सुकेशजी और रामेश्वरजी ) को विनम्र सुझाव देने की धृष्टता करूँगा कि मुद्रित पत्रिकाओं की तरह इस पत्रिका में भी ‘पाठकीय’ नाम से एक स्तम्भ की शुरुआत की जाए ।
चलिए , ‘लघुकथा डॉट कॉम’ के जनवरी ,19 अंक की थोड़ी चर्चा कर लेते हैं । लघुकथा विषयक विवेचनात्मक आलेखों वाला स्तम्भ ‘अध्ययन कक्ष’ की उपादेयता स्वयंसिद्ध है । अध्ययन , चिंतन , मनन ,विश्लेषण , विवेचन करने और कराने वाले इस कक्ष में इस बार सुकेश साहनी की रचनाधर्मिता से पुनः एक बार परिचित के निमित्त हमें ले जाया गया है।
किसी रचनाकार की चुनिंदा रचनाओं के ही आधार पर उसके रचनाकर्म का गहनता के साथ सम्यक अवलोकन किया जा सकता है — इसे सिद्ध कर दिखाया है भाई शिवनारायणजी ने अपने आलेख ‘ सुकेश साहनी की लघुकथाओं में समकालीन संकट ‘ में | शिवनारायणजी ( संपादक : ‘नयी धारा’) की लेखनी पर लघुकथा आलोचक का लेबल चस्पाँ नहीं है ,इसलिए इस विधा पर उन्होंने कम ही लिखा है ; लेकिन इस आलेख में इन्होंने स्वयं को एक उच्चकोटि के अध्येयता होने का सबूत देते हुए सुकेशजी की रचनाधर्मिता की गहन पड़ताल कर मौजूदा लघुकथा आलोचकों की ‘दृष्टि’ को पूर्वापेक्षा और भी व्यापक , परिमार्जित ,संवर्द्धित ,विस्तरित करने का संकेत दिया है | विधा की ‘समझ’ की पैनी , अंतर्दृष्टि , उच्चकोटि की उपयुक्त समर्थ आलोचकीय भाषा में शीर्ष पांक्तेय के लघुकथा शिल्पी के सृजनकर्म की पड़ताल करता यह आलेख सचमुच मील का पत्थर है |
क्रमशः
मार्टिन जॉन