लघुकथा की विकास-यात्रा का प्रतिनिधि दस्तावेज़

हिंदी लघुकथा आज हिंदी साहित्य की एक सशक्त और लोकप्रिय विधा के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान बना चुकी है। अपने छोटे कलेवर में जीवन की बड़ी सच्चाइयों को समेटने वाली लघुकथा ने जिस लंबी यात्रा को तय किया है, उसकी रचनात्मक झलक ‘हिंदी लघुकथा संचयन’ में दिखाई देती है। साहित्य अकादेमी द्वारा प्रकाशित यह संकलन लघुकथा के विकास, विविधता और सामाजिक सरोकारों को समझने की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण कृति है। इस पुस्तक में भारतेंदु हरिश्चंद्र से लेकर समकालीन दौर तक की चार कथा-पीढ़ियों के 97 रचनाकारों की रचनाएँ शामिल की गई हैं। इतनी व्यापक रचनात्मक परंपरा को एक ही संचयन में समेटना संपादक के गंभीर अध्ययन और चयन-दृष्टि को रेखांकित करता है।
भारतेन्दु हरिश्चंद्र की ‘अंगहीन धनी’ अत्यंत लघु होते हुए भी गहरे सामाजिक व्यंग्य से भरपूर रचना है। एक धनिक के घर बैठे सोलह हट्टे-कट्टे लोग जलती बत्ती स्वयं नहीं बुझाते और इसके लिए नौकर मोहना को बुलाते हैं। यही छोटी-सी घटना उनके आलस्य, पराश्रित मानसिकता और दिखावटी प्रतिष्ठा पर तीखा प्रहार करती है। रचना का शीर्षक अत्यंत सार्थक है।अंग होते हुए भी अपने छोटे-से काम के लिए दूसरों पर निर्भर व्यक्ति वास्तव में ‘अंगहीन’ ही है। मोहना की सहज हँसी और उसका छोटा-सा उत्तर रचना को प्रभावशाली व्यंग्यात्मक अंत प्रदान करता है। ‘अंगहीन धनी’ अपने समय की विसंगति पर चोट करते हुए आज भी सुविधा-भोगी मानसिकता के लिए उतनी ही प्रासंगिक दिखाई देती है।
माधवराव सप्रे की ‘एक टोकरी भर मिट्टी’ हिंदी की आरंभिक और चर्चित लघुकथात्मक रचनाओं में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। कथा में एक गरीब वृद्धा की जमीन पर अधिकार जमाने वाले जमींदार के सामने उसकी विवशता और स्वाभिमान प्रभावशाली ढंग से उभरता है। “एक टोकरी भर मिट्टी” माँगने की छोटी-सी घटना जमींदार के भीतर आत्मबोध जगा देती है। मिट्टी यहाँ केवल जमीन नहीं, बल्कि मनुष्य के अधिकार, अस्मिता और अपनी धरती से जुड़ाव का प्रतीक बन जाती है। बिना किसी भारी-भरकम उपदेश के यह कथा धन और सत्ता के अहंकार के सामने मानवीय संवेदना की शक्ति को स्थापित करती है
प्रेमचंद की ‘राष्ट्र का सेवक’ छोटी-सी कथा में राष्ट्रवाद के नाम पर चलने वाले दोहरे चरित्र और खोखली आदर्शवादिता को उजागर करती है। जो व्यक्ति मंच से राष्ट्र, समाज और समानता की बड़ी-बड़ी बातें करता है, उसके निजी जीवन में वही आदर्श कसौटी पर खरे नहीं उतरते। यह लघुकथा आज भी इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि यह हमें अपने आदर्शों को दूसरों पर लागू करने से पहले स्वयं के आचरण में उतारने की याद दिलाती है
विष्णु प्रभाकर की लघुकथा ‘फर्क’ भारत-पाकिस्तान के विभाजन और उससे उपजे वैमनस्य पर तीखा व्यंग्य करती है। इस लघुकथा में भारतीय और पाकिस्तानी सैनिकों के बीच शिष्टाचार और मानवीय व्यवहार का प्रसंग धीरे-धीरे उस विडंबना को उजागर करता है, जहाँ इंसानियत की जगह कट्टर राष्ट्रीय पहचान हावी हो जाती है। लघुकथा का अंतिम संवाद-
“हमारी हैं… जानवर हैं, फर्क करना नहीं जानते।” लेखक ने बहुत कम शब्दों में यह प्रश्न उठाया है कि आखिर फर्क इंसानों में है या हमारी बनाई हुई सीमाओं और पूर्वाग्रहों में?
हरिशंकर परसाई की लघुकथा ‘खेती’ व्यवस्था के उस चेहरे को सामने लाती है, जहाँ वास्तविक काम से अधिक महत्त्व कागजी खानापूर्ति का हो जाता है। खेती और किसान के बहाने लेखक सरकारी तंत्र की उस विडंबना पर व्यंग्य करते हैं, जिसमें योजनाएँ जमीन पर उतरने के बजाय फाइलों में फलती-फूलती हैं। परसाई का व्यंग्य हँसाता कम और व्यवस्था की विसंगतियों पर सोचने को अधिक विवश करता है। ‘खेती’ का सबसे तीखा प्रभाव यही है कि खेत में फसल उगाने के बजाय व्यवस्था कागजों पर उपलब्धियाँ उगाती दिखाई देती है। छोटी-सी रचना में गहरी सामाजिक और प्रशासनिक विसंगति को पकड़ लेना परसाई की व्यंग्य-दृष्टि की विशेषता है।
युगल की ‘पेट का कछुआ’ गरीबी, विवशता और मानवीय संवेदनहीनता की बेहद मार्मिक लघुकथा है। बारह वर्षीय बच्चे के पेट में उभरा ‘कछुआ’ आरंभ में बीमारी है, लेकिन धीरे-धीरे उसके पिता के लिए वही आमदनी का साधन बन जाता है। लेखक ने अभावग्रस्त मनुष्य की उस त्रासद स्थिति को पकड़ा है, जहाँ विवशता संवेदना को निगल जाती है। कथा का अंत पाठक को भीतर तक विचलित करता है। ‘कछुआ’ यहाँ केवल बच्चे के पेट में नहीं, बल्कि उस व्यवस्था और समाज के भीतर भी दिखाई देता है, जो उसकी पीड़ा का तमाशा देखता है।
अर्चना राय की ‘मेट्रो लाइफ’ आधुनिक जीवन की उस विडंबना को सामने लाती है, जहाँ सुविधाएँ और गति तो बढ़ी हैं, लेकिन मनुष्य के पास ठहरकर देखने और महसूस करने का समय कम होता गया है। मेट्रो में साथ-साथ चलते अनजान चेहरों के माध्यम से लेखिका महानगरीय जीवन के बदलते संबंधों और संवेदनाओं को रेखांकित करती हैं। कथा का सौंदर्य इसकी सहजता में है! कोई बड़ा उपदेश नहीं, बल्कि रोजमर्रा के जीवन का एक सामान्य-सा प्रसंग भीतर तक सवाल छोड़ जाता है। मेट्रो यहाँ केवल यात्रा का साधन नहीं, बल्कि उस जीवन-शैली का प्रतीक बन जाती है जिसमें भीड़ बहुत है, पर आत्मीयता कम। यही इसकी सार्थकता और प्रभाव है।
अशोक भाटिया की लघुकथा ‘स्त्री कुछ नहीं करती!’ स्त्री के अदृश्य और अनवरत श्रम को केंद्र में रखकर पितृसत्तात्मक सोच पर प्रभावी व्यंग्य करती है। कथा में सुबह से रात तक स्त्री द्वारा किए जाने वाले घरेलू कामों का क्रमबद्ध उल्लेख उसके जीवन की निरंतर व्यस्तता और थकान को उभारता है। इसके विपरीत, परिवार की अपेक्षाएँ और पुरुष वादी दृष्टि उसकी मेहनत को सहज, स्वाभाविक और महत्वहीन मानती है। ‘फिर सुबह सबसे पहले उठी’ वाला अंत स्त्री के अंतहीन श्रमचक्र को रेखांकित करता है
कमल चोपड़ा की लघुकथा ‘इतनी दूर’ बदलते समय में रिश्तों के बीच बढ़ती दूरी की मार्मिक पड़ताल करती है। कथा में भौगोलिक दूरी से अधिक भावनात्मक दूरी का दर्द उभरकर आता है। अपनेपन, स्मृतियों और पारिवारिक संबंधों के बावजूद परिस्थितियाँ मनुष्यों को एक-दूसरे से दूर करती जाती हैं।
फोन और आधुनिक संचार साधन पास होने का भ्रम तो देते हैं… लेकिन आत्मीयता का स्थान नहीं ले पाते। सरल, सहज भाषा में रची यह कथा संवेदना को धीरे-धीरे गहराती है और अंत पाठक के मन में एक कसक छोड़ जाता है। शीर्षक ‘इतनी दूर’ कथा के भाव-संसार को सार्थक करता है
कांता राय की लघुकथा ‘सुरंग’ स्त्री-जीवन में छिपी हिंसा और रिश्तों की विडंबना को संवेदनशील ढंग से सामने लाती है। लघुकथा में प्रेम और विवाह के आकर्षक आवरण के पीछे छिपे पुरुष के हिंसक व्यवहार को स्त्री अपने अनुभव से पहचानती है। माँ द्वारा उस लड़की को सचेत करना लघुकथा का सबसे प्रभावशाली पक्ष है। ‘सुरंग’ शीर्षक उस मानसिक अँधेरे और घुटन का प्रतीक बन जाता है, जिसमें स्त्री हिंसा सहते हुए जीवन बिताती है। सहज संवादों के माध्यम से लेखिका बिना किसी आडंबर के गंभीर सामाजिक प्रश्न उठाती हैं। यह लघुकथा पाठक को आत्ममंथन के लिए विवश करती है।
खेमकरण ‘सोमन’ की लघुकथा ‘मनीऑर्डर’ पारिवारिक रिश्तों में छिपी संवेदना और आर्थिक विवशता को प्रभावी ढंग से सामने लाती है। लघुकथा में छोटे भाई की आर्थिक परेशानी और बड़े भाई-भाभी के व्यवहार के माध्यम से रिश्तों की वास्तविक कसौटी उभरती है। इस लघुकथा में ‘मनीऑर्डर’ केवल धन भेजने का माध्यम नहीं… बल्कि आत्मीयता, सहयोग और मानवीय जिम्मेदारी का प्रतीक बन जाता है। संवाद लघुकथा को सहजता प्रदान करते हैं और पात्रों का व्यवहार बिना किसी उपदेश के बहुत कुछ कह जाता है।
छवि निगम की लघुकथा ‘सबक’ यह लघुकथा बच्चों की सही परवरिश, लैंगिक संवेदनशीलता और समाज में नैतिक मूल्यों के निर्माण पर एक बेहद सशक्त और विचारणीय संदेश देती है। लघुकथा में शिक्षिका ऋचा ट्यूशन पढ़ाने के साथ-साथ हाईस्कूल के छात्रों से सामाजिक सरोकारों और लड़कियों के प्रति सम्मान जैसे विषयों पर खुलकर चर्चा करती है। वहीं, नीरव का मानना है कि बच्चों को अपराध और नकारात्मक खबरों से दूर रखकर केवल किताबी ज्ञान देना चाहिए। ऋचा की यह बात बेहद प्रभावकारी लगी कि लड़कों को लड़कियों की इज़्ज़त करना और उनकी तकलीफ़ महसूस करना सिखाना ज़रूरी है। अंत में, नीरव के अपने बेटे राहुल की मौजूदगी में नज़रों का नीचा होना यह सिद्ध करता है कि वास्तविक ‘सबक’ उपदेशों से नहीं… बल्कि बच्चों में संवेदना और नैतिक बोध जगाने से ही मिलता है।
प्रबोध कुमार गोविल की लघुकथा ‘माँ’ माँ के त्याग और परिवार के प्रति उसके सहज समर्पण को बहुत प्रभावी ढंग से सामने लाती है। घर के कामों में उलझी माँ सबको खिलाने-पिलाने और उनकी जरूरतें पूरी करने में स्वयं को भूल जाती है। संवादों के माध्यम से उसका ममत्व और आत्मविस्मृति स्वाभाविक रूप से उभरते हैं। अंतिम प्रश्न–“तू माँ बनी है क्या?” कथा को मार्मिक मोड़ देता है और पाठक को माँ के निःस्वार्थ श्रम पर सोचने के लिए विवश करता है।
पृथ्वीराज अरोड़ा की लघुकथा ‘कथा नहीं‘ मध्यमवर्गीय परिवार में उपजे तनाव, आर्थिक तंगी और संवादहीनता के यथार्थ को उकेरती है। पिता की बीमारी और इलाज न करवाने की बात पर बेटे, माँ और दीदी के बीच तीखी बहस होती है, जिसमें बेटा अलग रहने और अपनी आर्थिक लाचारी को सामने रखता है। सभी पात्र अपनी-अपनी मजबूरियों और अपेक्षाओं के बोझ तले दबे हैं, जिसे छिपाने के लिए वे गुस्से और कड़वे व्यंग्य का सहारा लेते हैं। कुल मिलाकर, यह लघुकथा आधुनिक परिवारों के भीतर की कड़वी सच्चाई, उपेक्षा और भावुक संवेदनाओं का एक अत्यंत सहज और मार्मिक रूप प्रस्तुत करती है।
मीनू खरे की लघुकथा ‘गौरैया का घर’ आज के कंक्रीट के जंगलों में तब्दील होते शहरों और प्रकृति से कटती नई पीढ़ी का यथार्थ दर्शाती है। बहुमंजिला इमारतों की कृत्रिम दुनिया में रहने वाला नन्हा नीटू जब अपनी माँ से गौरैया, उसके पेड़ और आँगन के बारे में पूछता है, तो शहर की भागदौड़ में थकी माँ उसे वास्तविक दुनिया दिखाने के बजाय लैपटॉप पर गूगल के ज़रिए गौरैया की तस्वीर दिखा देती है। लघुकथा का असली प्रभाव इसके अंत में झलकता है, जहाँ कक्षा में शिक्षिका के सवाल पर नीटू मासूमियत से जवाब देता है – ‘‘गौरैया के घर को गूगल कहते हैं।’’ यह लघुकथा आधुनिक बाल मन पर तकनीक के गहरे प्रभाव को बेहद सहज और मार्मिक ढंग से उजागर करती है।
योगराज प्रभाकर की लघुकथा ‘सरदार‘ निष्काम सेवा, निस्वार्थ मानवीयता और प्रचार-विमुखता की एक बेहद मार्मिक और प्रेरणादायक मिसाल प्रस्तुत करती है। आपदा, दुर्घटना या विपत्ति कोई भी हो वह व्यक्ति किसी भी आधिकारिक सूची में दर्ज हुए बिना, बिना किसी पुकार के सबसे पहले मदद के लिए पहुँच जाता है। जब पत्रकार, फोटोग्राफर और अधिकारी उसकी पहचान, फोटो या नाम-पता पूछकर कागज़ी औपचारिकता पूरी करना चाहते हैं, तो वह नाम-शोहरत और पब्लिसिटी से दूर रहकर केवल पीड़ितों की सेवा को ही अपना एकमात्र धर्म मानता है। अंत में उसका यह कहना- ‘‘नाम-पता मेरा नहीं… मृतकों और घायलों का लिखो, बाऊ जी!’’ पाठक के दिल को छू लेता है और यह संदेश देता है कि सच्ची इंसानियत पहचान पत्र या कागज़ों की मोहताज नहीं होती!
रमेश बत्तरा की लघुकथा ‘सूअर’ समाज में तेज़ी से फैलती नफ़रत, राजनीतिक स्वार्थ और साम्प्रदायिक संकीर्णता पर एक बेहद मारक प्रहार करती है। इस रचना में ‘सूअर‘ केवल एक पशु मात्र न होकर मनुष्य के भीतर पनपती घृणा, गंदगी और मानव-विरोधी वृत्तियों का एक गहरा प्रतीकात्मक बिंब बनकर उभरता है। लेखक ने अत्यंत सहज किंतु पैनी शैली में यह दिखाया है कि किस प्रकार सत्ता और स्वार्थी तत्त्व आम जनता को आपस में उलझाकर अपनी राजनीतिक रोटी सेकते है। कथा का अंतिम संदेश-‘‘तो जाकर सूअर को मारो न’’–पाठक को चौंकाता भी है और यह सोचने पर मजबूर करता है कि असली संघर्ष आपस में लड़ने में नहीं, बल्कि समाज में नफ़रत का ज़हर घोलने वाली इन विकृत प्रवृत्तियों को जड़ से मिटाने में है…!
रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु‘ की लघुकथा ‘कालचिड़ी’ एक योग्य लड़की के विवाह के बाज़ार में रूप-रंग के पैमाने पर नकारे जाने की पीड़ा और सामाजिक रूढ़ियों को दर्शाती है। लघुकथा के आरंभ में बरामदे में आईने पर चोंच मारती ‘काली चिड़िया’(कालचिड़ी) दरअसल स्वयं शुचिता और उसकी परिस्थितियों का बिंब है। जिस तरह चिड़िया आईने में अपनी ही परछाई को न पहचानकर उस पर चोट करती है, ठीक उसी तरह समाज भी लड़की की प्रतिभा और योग्यता को दरकिनार कर केवल उसकी बाहरी रंगत को ही पैमाना मानता है। अंत में जब लड़के की माँ साफ़ कह देती है कि “हमारे लड़के को खूबसूरत लड़की चाहिए, साँवली लड़की इसे पसंद नहीं”, तब शुचिता को काली चिड़िया के प्रति एक मूक आत्मीयता महसूस होती है और वह इस बार उसे उड़ाने का प्रयास नहीं करती। यह लघुकथा स्त्री की गरिमा, सामाजिक संकीर्णता और खोखली मानसिकता पर गहरा प्रहार करती है।
विकास के नाम पर हम धरती माँ को कितना नुकसान पहुँचा रहे हैं, पर यह नुकसान क्या केवल धरती माँ का है, हमारा नहीं? लेखक ने धरती, वायु, समुद्र, नदी सभी के प्रति चिंता का भाव रखते हुए स्पष्ट संकेत दिया भूमिगत जल के निरंतर घटने और बढ़ते प्रदूषण का कारण एक व्यक्ति नहीं बल्कि पूरा समाज है। सुकेश साहनी की लघुकथा ‘उतार‘ एक कुएँ खोदने वाले मिस्त्री की डायरी के पन्नों के माध्यम से सन् 1966 से 2006 (चार दशकों) के दौरान बदलते सामाजिक, प्राकृतिक और आर्थिक परिदृश्य की बेहद मार्मिक समीक्षा प्रस्तुत करती है। लघुकथा में जैसे-जैसे समय बीतता है, गाँव का सामाजिक ताना-बाना टूटता है। जहाँ पहले पूरा गाँव एक ही कुएँ से पानी पीता था, वहीं आगे चलकर जातिगत राजनीति, वोट बैंक और ज़मीनों के बँटवारे के कारण हर वर्ग और खेत के लिए अलग-अलग कुएँ, हैंडपंप और बोरिंग होने लगते हैं। इसके साथ ही, भूजल स्तर लगातार गिरता जाता है (30 फीट से बढ़कर 160 फीट तक)। पारंपरिक कारीगरों व कुओं की उपेक्षा कर ठेकेदार मशीन के ज़रिए पानी का दोहन करने लगते हैं। बुढ़ापे में मिस्त्री की आर्थिक लाचारी, आत्मसम्मान को लगती ठेस और प्रकृति के साथ होते खिलवाड़ का यह यथार्थवादी दस्तावेज़ मनुष्य के स्वार्थ, सामाजिक विघटन और पर्यावरण के लगातार होते ‘उतार’ पर एक तीखा और विचारणीय प्रहार करता है।
सुषमा गुप्ता की लघुकथा ‘संवेदनाओं का डिजिटल संस्करण’ पढ़ते हुए मन भीग गया। सोशल मीडिया हमारे जीवन में इतना अधिक प्रवेश कर गया है कि रिश्तों से अधिक हम उसे महत्त्व देने लगे हैं। वास्तविकता की दुनिया से दूर एक झूठी दुनिया बसा ली गई है, जिसमें सहानुभूति पाने के लिए पिता की जलती चिता की फोटो तक अपलोड कर दी जाती है। जीवित माँ की दवाइयों से अधिक चिंता सोशल मीडिया पर आए लाइक कमेंट्स की होने लगी है। डायरी शैली में लिखी ये लघुकथा गहरे तक मन को बींध जाती है।
हरभगवान चावला की लघुकथा ‘बिजूके’ इंसान के भय, धार्मिक संकीर्णता और खोखले आडंबरों पर एक तीखा व्यंग्य करती है। लघुकथा में एक निर्जन बस्ती के भीतर मंदिर और मस्जिद के सामने खड़े दो बिजूके इंसान की विडंबना को उजागर करते हैं। बिजूका बड़ी बेबाकी से यह कड़वा सच बयान करता है कि इंसान केवल अपनी रक्षा करता है और जब वह उसमें असमर्थ हो जाता है, तो ईश्वर से रक्षा की गुहार लगाता है; परंतु खुद ईश्वर की रक्षा करने के लिए वह बिजूकों को तैनात कर देता है। सरल भाषा और प्रभावशाली संवादों से सजी यह रचना पाठक को यह सोचने पर मजबूर करती है कि इंसान का धर्म और ईश्वर के प्रति रवैया कितना खोखला व विरोधाभासी है।
सभी रचनाकारों पर लिखना सम्भव नहीं है। आनन्द, बलराम, राम कुमार आत्रेय, सुभाष नीरव, बलराम अग्रवाल, सत्यनारायण की लघुकथाएँ भी पठनीय हैं। अशोक भाटिया द्वारा संपादित ‘हिंदी लघुकथा संचयन’ की ये लघुकथाएँ इस बात का जीवंत प्रमाण हैं कि आकार में छोटी होकर भी लघुकथा कितनी गहरी और व्यापक मार कर सकती है। ये लघुकथाएँ महज सामाजिक घटनाओं का ब्योरा नहीं देतीं; बल्कि बदलते समय के साथ टूटते रिश्तों, पर्यावरण के दोहन, खोखले सामाजिक आडंबरों, धार्मिक संकीर्णता और मनुष्य के भीतर दम तोड़ती संवेदनाओं पर सीधा प्रहार करती हैं। हिंदी लघुकथा विधा के कुछ बड़े और स्थापित हस्ताक्षरों– जैसे सतीशराज पुष्करणा और श्याम सुंदर अग्रवाल की अनुपस्थिति को इस संकलन की एक सीमा के रूप में रेखांकित किया जा सकता है, फिर भी इसमें शामिल रचनाएँ अपने कथ्य, शिल्प और सामाजिक सरोकारों के बल पर लघुकथा विधा की सामर्थ्य और व्यापकता का प्रभावी परिचय देती हैं।
हिंदी लघुकथा के विविध रंगों और उसके समकालीन तेवर को इतने व्यवस्थित रूप में पाठकों के समक्ष लाने के लिए संपादक एवं साहित्य अकादेमी साधुवाद और बधाई के पात्र हैं। यह संचयन साहित्य-प्रेमियों और शोधार्थियों दोनों के लिए एक संग्रहणीय दस्तावेज़ है।
हिंदी लघुकथा संचयन -संपादन : अशोक भाटिया, प्रथम संस्करण : 2026, पृष्ठ : 435, मूल्य : ₹440, प्रकाशन : साहित्य अकादेमी, फिरोजशाह मार्ग, दिल्ली 110001
-0-