जून 2026

पुस्तकहिंदी लघुकथा का सिद्धांतगत अध्ययन     Posted: July 1, 2020

            भगीरथ परिहार लघुकथा सृजन के साथ-साथ लघुकथा पर केंद्रित आलेख भी समय-समय पर लिखते रहे हैं। अपने आलेखों में लघुकथा को केंद्रित करते हुए आपने अनेक नवीन विमर्शों को भी उठाया है। लघुकथा की रचना प्रक्रिया, उसका कलेवर, सर्जन के तत्व और उसके समीक्षात्मक आधारों के साथ-साथ आपने लघुकथा सर्जन की सम्भावनाओं पर भी व्यापक विचार-विमर्श किए हैं। लघुकथा जैसी विधा के औचित्य और उपयोगिता पर भी आपके विचार चिंतनपूर्ण  हैं। ‘हिंदी लघुकथा के सिद्धांत’ नामक आपकी पुस्तक ‘एजुकेशन पब्लिशिंग’ से अभी हाल ही में प्रकाशित हुई है। इसमें कुल दस आलेखों के अंतर्गत लघुकथा पर अनेक दृष्टिकोणों से विचार किया गया है। अलग-अलग कालखंडों में प्रकाशित ये आलेख समग्ररूप में लघुकथा विधा पर अवधारणाओं का एक महत्वपूर्ण उपादान बनकर आते हैं।
          ‘हिंदी लघुकथा उद्भव और विकास’ आलेख  लघुकथा के आरम्भिक इतिहास को सामने लाता है। हिंदी साहित्य के इतिहास के समानांतर हिंदी लघुकथा की विकास यात्रा को जानना ज्ञानवर्धक है। लेखक की सूचना महत्वपूर्ण है कि डॉ. रमेश कुंतल मेघ जैसे आलोचक ने लघुकथा लेखन की विकास यात्रा को प्रस्तुत किया। माधव राव सप्रे, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी,जयशंकर प्रसाद, ‘दिनकर’, जानकीवल्लभ शास्त्री, विष्णु प्रभाकर जैसे लेखकों ने लघुकथा की  लेखन धारा का अभिसिंचन किया है। इसी आलेख के उत्तर भाग में लघुकथाएं प्रकाशित करने वाली पत्रिकाओं का भी ऐतिहासिक विवरण दिया गया है। ‘सारिका’ जैसी पत्रिका ने लघुकथा को पर्याप्त स्थान दिया था। प्रथम लघुकथा संकलन ‘गुफाओं से मैदानों की ओर’ (1974)  रमेश जैन और भगीरथ परिहार के कुशल संपादन में प्रकाशित किया गया था। प्रस्तुत आलेख पर्याप्त शोध और तथ्यात्मक विस्तार के साथ लिखा गया है, जिससे इसकी उपादेयता निःसंदेह बढ़ गई है।

        अपने दूसरे आलेख ‘लघुकथा लेखन: आरोप, चेतावनियाँ व कमजोरियाँ’ में भगीरथ अपनी बात नरेंद्र कोहली के वक्तव्य से आरंभ करते हैं,” लघुकथा अनिवार्य रूप से संक्षिप्त होगी। इसके स्थूल रूप में कौशलहीन ढंग से अपनी बात उगल देने का लोभ किसी भी लेखक को होगा। किसी घटना की अखबार में रिपोर्टिंग और उस पर आधारित लघुकथा में फर्क तो होना चाहिए। वे रचनाएं जो पाठक में ललित साहित्य के सौंदर्यबोध को न जगा सकें ,निरर्थक हैं। प्रस्तुत आलेख में अनेक लघुकथा लेखकों और विचारकों के वक्तव्यों को लघुकथा के संदर्भ में प्रस्तुत किया गया है ।कुल मिलाकर निष्कर्ष यह है कि लघुकथा केवल कहानी का छोटा रूप नहीं है, बल्कि इसकी भी अपनी अलग रचनात्मक प्रक्रिया और सृजन के आधार हैं। एक समय ऐसा भी था जब लघुकथा के नाम को लेकर खूब बहस चली थी। कोई इसे लघुकथा कहता था ,कोई लघु कहानी तो कोई-कोई इसे लघु व्यंग्य के रूप में भी अभिहित करते थे। इसी बात को ‘लघुकथा, लघु कहानी व लघु व्यंग्य के विवाद का हश्र’  में उल्लेखित किया गया है। विभिन्न लेखकों के तर्क देते हुए भगीरथ ‘लघुकथा’ नाम की सार्थकता और प्रतिष्ठा को ही सत्यापित करते हैं। वे लघु कहानी और लघु व्यंग्य को अनेक युक्तिपरक तर्कों से किनारे करते हैं।

         लघुकथा के आरम्भिक इतिहास और नामकरण पर केंद्रित प्रथम तीन आलेखों के बाद चौथा आलेख है ‘लघुकथा लेखन की सार्थकता’ ।क्या कारण है कि अनेक उपलब्ध साहित्यिक विधाओं के होते हुए भी लघुकथा साहित्य के क्षेत्र में आई और धीरे-धीरे उसने अपना महत्वपूर्ण स्थान भी बनाया। भगीरथ लिखते हैं,” अभिव्यक्ति को एक फॉर्म की तलाश थी और आठवें दशक के प्रारंभ में ही उसे यह फॉर्म उपलब्ध हो गया। मामूली आदमी के मामूली जीवन में महत्वपूर्ण होती मामूली बातों की अभिव्यक्ति लघुकथा कर सकती थी,जो कथ्य की प्रमुखता पर बल देती थी। इसीलिए इस विधा को पुनर्जीवन मिला और इसके पुराने फ्रेम को तोड़-फोड़ दिया गया और नए फ्रेम में नई तस्वीर मढ़ दी गई। लघु कथा के प्रमुख तत्वों में लेखक ने कहानी के ही आधार तत्वों को रखा है; जिनमें कथानक, कथ्य, संवाद, भाषा-शैली महत्वपूर्ण हैं। लघुकथा लेखन में लेखक ने मुख्यतः तेरह शैलियों के नाम गिनाए हैं। विधा कोई भी हो, अपना समीक्षाशास्त्र भी वह साथ ही साथ विकसित करती है ।विश्लेषण की प्रक्रिया में कुछ ऐसे बिंदु निर्धारित कर लिए जाते हैं, जो उस विधा विशेष की समीक्षा के मानदंड और मापदंड बन जाते हैं ।सम्प्रेषण, प्रभाव की सघनता, कथा की बुनावट, सामाजिक मूल्यों के सरोकार, भाषा-शैली, तथ्य– इन छह बिंदुओं को लेखक ने लघुकथा समीक्षा के आधारभूत तत्वों के रूप में देखा है। एक प्रकार से ये बिंदु अपनी समग्रता में कहानी के ही आधार बिंदु है परंतु चूँकि लघुकथा में भी कोई कथा ही अपने लघुकथा के मानदंडों के अंतर्गत कही जाती है, इसलिए ये आधार बिंदु समीचीन ही प्रतीत होते हैं।

         लघुकथा लेखन पर अनेक आक्षेप भी समय-समय पर लगाए गए हैं। लघुकथा में शिल्प तत्व का संतुलन भी आवश्यक है। लघुकथा अनेक विधाओं की सीमाओं को स्पर्श करती चलती है लघुकथा कभी रेखाचित्र तो कभी रिपोर्ताज तो कभी संस्मरण का रूप ले लेती है। ‘लघुकथा लेखन की समस्याएँ’ में भगीरथ परिहार इसी विषय पर विचार करते हैं। प्रत्येक विधा अपने कथ्य और शिल्प के नए-नए विषयों पर गतिमान होती है। जितने नवीन विषय तलाशे जाएंगे, उतनी ही तथ्य में नव्यता और पाठक को पढ़ने में आनंद आएगा। ‘लघुकथा लेखन की स्थिति एवं नई सम्भावनाओं की तलाश’ आलेख इसी पर बात करता है। परिवार, सम्बन्ध, आतंक, पुलिस, राजनीति, ऑफिस, स्कूल-शिक्षा, महानगर आदि विषयों पर प्रचुर मात्रा में लघुकथाएँ प्राप्त होती हैं, जिससे कथ्य का अतिक्रमण भी होना स्वाभाविक ही है। समय के बहाव के साथ आज की जरूरत है कि लघु कथाओं में नए-नए विषय खोजे जाएं जिससे कथ्य का दोहराव न हो। प्रत्येक विधा की अपनी एक टेक्नीक होती है जिसके आधार पर वह विधा अपनी सीमाओं का विस्तार करती है। लघुकथा अपने आरम्भ में लोकबोध और रूपककथा तक सीमित रही, परंतु आठवें दशक के आते-आते लघुकथा मानो अभिव्यक्ति की व्यवस्थित विधा ही बन गई। यहीं से लघुकथा ने यथार्थ का चेहरा अपनाया। अनेक अव्यवसायिक और लघु पत्रिकाओं ने लघुकथाओं को स्थान देकर इसे मुख्यधारा में लाने का प्रयास किया। रूपक,प्रतीक,फेंटेसी जैसे प्रयोग लघुकथा को काव्यगत आयाम देते हैं।

         कथासम्राट मुंशी प्रेमचंद ने लगभग बीस लघुकथाएं लिखी है। ‘प्रेमचंद और लघुकथा विमर्श’ में भगीरथ उनकी ‘राष्ट्रसेवक’, ‘बाबा जी का भोग’, ‘देवी’, ‘बंद दरवाजा’, ‘यह भी नशा, वह भी नशा’, ‘ठाकुर का कुआँ’, ‘दूसरी शादी’, ‘कश्मीरी सेब’, ‘गुरुमंत्र’, ‘बीमार बहन’, ‘बांसुरी’ जैसी लघुकथाएँ लेते हैं और उनका समीक्षात्मक अध्ययन प्रस्तुत करते हैं। लेखक का निष्कर्ष है,“प्रेमचंद की कथाएं विस्तार और प्रसंगों के समावेश के कारण कहानी का आभास देती हैं। प्रेमचंद के समय में लघुकथा जैसी दूसरी विधा नहीं थी, न ही उसका प्रचलन था। दूसरे वे उपन्यासकार एवं कहानीकार थे, इसलिए उसका प्रभाव लघु रचनाओं में आ जाना स्वाभाविक है।” प्रेमचंद को लघुकथाओं की जरूरत विरोधाभासों और पाखंडों को बेनकाब करने के लिए महसूस हुई। यही जरूरत आधुनिक लघुकथा लेखकों की है।
            भारतीय लघुकथाओं के साथ-साथ भगीरथ ने विदेशी भाषा की लघुकथाओं का भी महत्वपूर्ण अध्ययन किया है। शेक्सपियर की ‘नरक’, लू शुन की ‘अभिव्यक्ति’, समरसेट मॉम की ‘बीस वर्ष’, तुर्गनेव की ‘पत्रकार’, खलील जिब्रान की लोमड़ी और उपदेश, ओ हेनरी की ‘इसे गिरफ्तार कर लो’, गोर्की की ‘सजा’ जैसी लघु कथाओं पर वे विस्तृत विचार-विमर्श करते हैं। कथ्य की व्यापकता अनेक सामाजिक-आध्यात्मिक संदर्भों में घटित होती है। विदेशी भाषाओं की लघुकथाओं में पैनापन, मारकता और काल्पनिकता को उचित स्थान मिला है। विज्ञान के बढ़ते चरण ने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र पर प्रभाव डाला है। हमारा रहन-सहन बदला है, सोच बदली है और बदला है हमारा परिवेश। लघुकथा भी परिवेश के इस परिवर्तन को पकड़ती है और उन्हें अपने कथ्य का आधार भी बनाते हैं। अपने आलेख ‘आधुनिक लघुकथा की अवधारणा’ में भगीरथ लघुकथा की सकारात्मक संभावनाओं को टटोलते हैं। यथार्थवादी कथावस्तु, शिल्प एवं कथ्य आज की आधुनिक लघुकथा की जरूरत भी है और पहचान भी। पारम्परिक शिल्प जरूरी है लेकिन आज के यथार्थ को दर्शाने में यदि वह उपयोगी हो, तभी।

       लघुकथा आज एक ऐसी विधा है, जिसकी कथ्यशक्ति ने पाठकों का ध्यान अपनी और बरबस ही खींचा है। पिछले पचास वर्षों के लंबे इतिहास में लघुकथा ने अनेक रूपगत, शिल्पगत और कथ्यगत परिवर्तन देखे हैं तथा अपनी प्रस्तुति में भी बदलाव पाया है। ‘हिंदी लघुकथा के सिद्धांत’ पुस्तक में भगीरथ परिहार इन सब बातों पर महत्वपूर्ण दृष्टि डालते हैं। भगीरथ परिहार स्वयं प्रसिद्ध लघुकथाकार भी हैं। इसीलिए लघुकथा सर्जन की विधागत वैचारिकता, व्यवहारिकता और लेखनगत परिस्थितियों को वे भली-भाँति समझते हैं।लघुकथा का सिद्धांतगत अध्ययन नवीन लघुकथाकारों के लिए तो उपयोगी है ही, साथ ही साथ लघुकथा सर्जन में रत लेखकों के लिए भी समान रूप से उपयोगी है। पुस्तक के अधिकांश लेख क्योंकि अलग-अलग कालखंड में लिखे गए हैं, इसलिए उन्हें इसी दृष्टि से देखने की आवश्यकता है। ‘लघुकथा के सिद्धांत’ पुस्तक सिद्धांतों के साथ-साथ व्यावहारिकता के प्रतिमान  भी निर्धारित करती चलती है,जो इसकी उपादेयता में अभिवृद्धि ही करती है।
हिंदी लघुकथा के सिद्धांत: लेखकः भगीरथ परिहार, प्रकाशकः एजुक्रिएशन पब्लिशिंग,नई दिल्ली,  मूल्यः ₹ 260,  पृष्ठः 130
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