रत्ना के घर के सामने निर्माण कार्य चल रहा था। वह सहसा ईंटे सर पर रखने वाली एक गरीब मजदूरन को देखने लगी। रत्ना को महसूस हुआ कि वह गर्भवती है और शीघ्र ही उसकी डिलीवरी हो सकती है। मध्यावकाश में उसने अपने घर की खिड़की से बाहर झाँका। वह बैठी मोटी रोटी पर हरी चटनी रगड़ कर खा रही थी। दोनों पैरों को मोड़ कर बैठी वह मजदूरन, रत्ना को जैसे अपनी ओर खींच रही थी। रत्ना ने गौर किया कि उसकी माँग सूनी थी। आखिकार वह उसके पास पहुँच गई।
“हैलो।’’
“नमस्ते मैडम जी।’’
“मैं यहीं, सामने वाले घर में रहती हूँ। मुझे लगता है जल्दी ही तुम्हारी डिलीवरीइ…’’
“जी मैडम जी इसी हफ्ते एडमिट होना है।’’ -इतना कहकर वह ईंटों को उठाने के लिए उठी।
“मुझे लगता है अब तुम्हें आराम करना चाहिए न?’’
“अरे मैडम जी, आदमी मरा तो मैं छह माह के पेट से थी। सास देवर के घर बैठने को बोली। मैंने साफ मना कर दिया। अब बताओ, क्या इतनी जल्दी कोई भूल पाता है अपने आदमी को और मुझे उस शराबी जुआरी देवर के घर बैठना भी नहीं; अब सास दुतकार कर कहती हैं कि मैं अपना खर्च खुद उठाऊॅं, खोली का आधा किराया भी दूँ।’’- कहते-कहते वह हाँफ गई।
थोड़ा ठहरकर वह दृढ़ता से बोली-“मैडम जी, मैं गरीब ज़रूर हूँ, गलीच नहीं हूँ। मैं अपना और अपने बच्चे का खरचा खुद उठाऊॅंगी!’’ और ईंटे सिर पर रखकर, शेरनी की तरह आगे बढ़ गई।
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