आज भी सरन के लंच बाक्स में मूली की भाजी ही थी। उसकी पत्नी ने मूली की भाजी को रोटियों के बीच रखकर बड़ी कुशलता से “रोटी – रोल” में छिपा दिया था। इसका पता सरन को टिफ़िन खोलने पर ही लगा।
लंच टाइम में सब साथियों के टिफ़िन बारी – बारी से खुले। कमरे में कई सुघड़ हाथों के बनाए भोजन की खुश्बूएँ फैल गयीं। साथ ही सरन के टिफ़िन से उड़ी , मूली की भाजी की गंध भी मुखर हो गई। हर किसी ने मूली की गंध सूँघकर अपनी नाक सिकोड़ ली।
“सुनो ! नहीं ले जाऊँगा पत्तेदार कोई भाजी “- उसने पत्नी से कह दिया था; परंतु पत्नी ने सुबह चुपके से डिब्बे में फिर से मूली के पत्तों की भाजी पैक कर दी।
“हद हो गई…। “
अपने साथियों को मुँह दबाकर हँसते हुए देखकर सरन को बहुत बुरा लगा।
वो आलू – मटर , गोभी आदि की मौसमी सब्ज़ी बनाकर रोटी या पराँठे के साथ दे सकती थी।
मित्रों के टिफ़िन खुले तो मसाले – अचार की खुशबू नथुनों से दिमाग़ तक जा पहुँची।
“वाह …। ” स्वाद ग्रंथियाँ रस छोड़ने लगतीं।
सबने अपने लंच बाॅक्स स्टाफ़ रूम की टेबल पर रख दिये। उसने झट से अपना टिफ़िन बंद कर मूली के साग की गंध को तुरंत दबा दिया। साथियों के लंच के डिब्बों से वो थोड़ा बहुत खाता रहा। तभी बॉस की पी . ए. स्टाफ़ रूम के द्वार पर खड़ीं दिखीं।
“मिस्टर सरन ! आपके लोन के पेपर तैयार हैं। लंच के बाद एकबार ऑफ़िस में चले जाएँ। “
तीनों मित्र उठ खड़े हुए। बॉस की खूबसूरत पी.ए. से पूछ बैठे -” मैम आप भी कुछ लीजिए हमारे साथ। “
अधखाए टिफ़िन से उन्होंने कुछ नहीं लिया , तो सरन ने अपना लंच का डिब्बा ऑफ़र कर दिया जो अभी तक झूठा नहीं किया था।
वो लपक कर भीतर आयी और सरन के टिफ़िन से मूली की भाजी और रोटी का एक कौर खाकर भोजन की खुलकर प्रशंसा की ।
तीनों साथी बगलें झाँकते नज़र आए।
वहाँ बैठे मित्र ,और खुद सरन को अपनी मूर्खता पर बेहद कोफ़्त हुई। उन्हें लगा वे तीनों बंदर थे जिन्हें अदरक का स्वाद आज पता चला था।
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