‘शुभं शुभं…’
गार्गी ने तीसरी बार आवाज लगाई।
‘मम्मा बस दस मिनट और, उठ रहा हूँ।’
माँ की चिंता बढ़ने वाली लाइन की थी और कचर-पिच्च अलग से। मास्क,सैनेटाइजर से मुस्तैद हो परिवार ने अपने पारिवारिक वाहन से प्रस्थान किया। गार्गी को याद है कितनी खौखट के बाद गाड़ी मयस्सर हुई थी। प्राइवेसी युग के चलन में अपारदर्शी। जमाना था जब खानदान से पहचान होती थी, बच्चों के परिचय में यार-दोस्त शरीक हुए। बहुओं ने प्रजातीय कूकुर पालकर पास-पड़ोस में हनक भरी। पोतों की पहिचान फटफटिया और अब पतोहुओं ने सफ़ेद कार को फॅमिली मेम्बर मान लिया था। राघव और उस साल का नवम्बर…! फिर ऑन लाइन का सिस्टम। इसमें ऑफ लाइन ईज़ादी के बाद ही वह दुबारा सोचने-समझने लायक हो पाया था। अभिषेक हेतु सभी पंक्तिबद्ध हो गए। राघव ने इधर-उधर देखा, सीढ़ियों के अलावा कोई बरास्ता नहीं दिखा।
‘दूर दूर..’ सपेरे को बिना माँगे ही दस का नोट मिल गया। खौफ की जय-जयकार। बाज़ार का पुराना फलसफा ‘भय और लाभ’ इन विषपोषियों को मूल मंत्र था। बीच-बीच में ‘जल्दी-जल्दी, पीछे भी लोग हैं।’ जो अभिषेक करने में लाचार थे सीढ़ियों के किनारे जयकारे से ही पेट पालने को विवश थे। इन्हें साँप पालने की कला नहीं आती थी और न ही इनके पास विष था, सो बस हाथ पसारे, निहारते। गार्गी, राघव बच्चों को इनकी तरफ ध्यान जाने से रोकने का प्रयास शिद्दत से कर रहे थे। तभी ‘तुम्हइ बढ़ती होय बाबू…’
‘मम्मा इन्हें पैसे दो न।’ बेटे गौतम ने बालहठ किया।
भीड़ में आवाज गूँजी ‘तुम सिर्फ सीढ़ियाँ चढ़ो।’
-0-