गढ़वाली अनुवाद: डॉ. कविता भट्ट
कुर्सी माँ बैढ्याँ-बैठ्याँ राजनीति कुछ गुनगुनाणी है। “एकुली- एकुली यु क्य छै गुन गुनाणि, जरा मिथे बी त सुणौ !” कुर्सी न राजनीति तैं बोली ।
राजनीति मुल- मुल हैंसी अर वीं न बोली, “ले तू बि सूण !” राजनीति न फिर जोर से गीत गाण सुरु कैरी दे, ” मजहब नि सि खाँदु आपस माँ बैर रखण….” राजनीति लैरी- लैरी क गाण लगी गे। “उन एक बात च!” गीतै की पंक्ति सुणण का बाद कुर्सी न बोली।
“क्य!” राजनीति न पूछी।
“हौर क्वी बि गीत तुम इतगा भौंण माँ नि गै सकदा ।”
इतगा सुणदु ई राजनीति जोर से हैंसी। हैंसी इतगा जोर की छै, कि कुर्सी तैं इन लगी जन कौंपण से हूँणी हो।
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