साथ/ भगवान वैद्य ‘प्रखर‘
‘ऐसा अचानक क्या हो गया था मेहताजी को? ऑस्ट्रेलिया जाने से पहले हम लोग मिलने आए थे तब तो एकदम भले-चंगे थे.’
‘हाँ… डॉक्टर बोले, शायद नींद में ही मैसिव हार्ट-अटैक आ गया.’
‘क्या सब बच्चे पहुँच गए थे?’
“हाँ… शिकागो वाला भर देर से पहुँचा. उसी के लिए एक दिन बॉक्स में रखनी पड़ी थी बॉडी. बाकी तीनों बेटियां और बड़का पहुँच गए थे।”
“रहे कुछ दिन?”
“हाँ, दामाद-लोग चले गए थे, बीच में पर तेरहवीं में सब हाजिर थे।”
“तुम्हें किसी के साथ चले जाना चाहिए था, सखी। यहां अकेली कब तक और कैसे रहोगी?” “रहूँगी… जैसे बन पड़ेगा. यहां ये मेरा अपना घर है।”
“बुढ़ापे में घर नहीं, साथ चाहिए रहता है, बहना। एक भले विदेश में है पर बाकी तो यहीं रहते हैं न! किसी के भी साथ चली जाती?”
“किसके साथ जाती?… तेरहवीं निपटते ही शाम को बड़े दामाद और बेटी चले गए। निकलते समय बेटी बोली, चलती हूँ, मम्मी। अपना ध्यान रखना… अगले दिन मँझली और छोटी गईं। वे भी बोलीं, अपना ध्यान रखना, मम्मी…. दो दिन बाद शिकागो वाला चला गया। अकेला आया था। उसने बताया था कि बच्चों की स्कूल की वजह से बहू नहीं आ पाई। जाते समय वह भी बोला, “फोन करता रहूँगा मम्मी। आप अपना ध्यान रखना…”
“और बड़ा?”
“छोटे के दो दिन बाद बड़ा गया. बोला, मम्मी, मैं भी निकलता हूँ। खेती-बाड़ी के काम पड़े हैं…”
“तो क्या पाँचों में से किसी ने नहीं कहा कि साथ चली चलो?”
“नहीं, कम पड़ गए पाँच…!!’’
-0-