गढ़वाली अनुवाद : डॉ. कविता भट्ट
वे का बुबा न वे थैं पढ़ाई नि छौ।
वेन सोचि—मिन अपड़ा बच्चों थैं जरूर पढ़ाण।
वेन अपड़ा बच्चा थैं स्कूल म दाखिलु दिलाई।
एक दिन बच्चा न किताबु की माँग कैरि।
दूसरा दिन बच्चा न स्कूल-ड्रेस कि माँग कैरि।
तीसरा दिन बच्चा न फ़ीसै की माँग कैरि।
वु फसल लौण का दिन छा। बुबा न बोलि—बाबा, फसल मंडी म बिकली, तबि मजूरी मिली सक्ली। मजूर नौना बुबा कु हाथ बँटाण लगी गेनि।
एक दिन पाठ याद न हूण पर बच्चा थैं सज़ा मिली।
दूसरा दिन स्कूल-ड्रेस न हूण पर बच्चा थैं घौर भेजे ग्याई।
तीसरा दिन फ़ीस न भन पर वे कु नौं कटे ग्याई।
वु बच्चा फिर कबि स्कूल नी ग्याई।
जब वु बडू ह्वे, त वेन सोचि- मि अपड़ा बच्चों थैं ज़रूर पढौलु।
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