अनुवाद: डॉ. कविता भट्ट ‘शैलपुत्री’
अधिकारी गाड़ी बिटि निकळि तैं अपणा चैम्बरै कि तर्फ बढणू छौ कि अचानक द्वी कदम पीछनै ह्वे क तैं विवेकै कि मेजै तर्फ औंदि औन्दु वेन बोली, “कन! पौंछै यालि फैल मेरि टेबल मुँ?
-सर वी तैय्यार कन्नू छौं, वु कुछ काम ऐ गे छा त—
यां सि पैलि कि बात पूरी होन्दी अधिकारी खिजेण बैठी ग्याई।
-एक काम ढंग से नि होंद तुमसे! ऑफिस म एक हपता बि नि ह्वाई कि रंग चढ़ ग्याई।
– ना सर।
-आधा घण्टा भितर मि तैं फाइल कम्प्लीट चैंदी टेबल म, समझि गें?
-जी, जी सर।
विवेक फीर फैल क पुटक घुसि गे । अधिकारी चैम्बरै कि तरफाँ जाँदू जाँदू बि बरणणु छौ।
– किर्पा कारण बि कन-कन गधों तैं भन्न पुड़दु, जौं तैं द्वी कौड़ी कि अक्ल नी च।
याँ कि आदत आदत नी छै विवेक तैं, यां कि वजै सि यीं बिज्जत्ति सूणि कि वु रोण लगि गे। काख पर वळि टेबल मूँ न बडा बाबू उठिक वे का नजीक ऐन, कांधा माँ आस कु हाथ धैरि समझौंण लगि गेन।
-अरे रूँदा नि छन बाबा! यु आदिम ही टेरू च, त्यारा पितजी तैं त क्य-क्य नि बोले जान्दु छौ। भौत भला आदिम छा बिचारा, कभी पलटिक जवाब तक नि देंदा छा। सदानि मुल मुल हैंसणा रन्दा छा, अफसोस इना मनखि तैं बि मौत न कन – कन बाना खोजदि –
पिताजि क बिज्जत्ती की बात सुणिक विवेक उस्कुदु उस्कुदु रुकि गे , दाँत भिंची गेन मुट्ठि कसे गेन। वु कुर्सी मन उठणि वाळु छौ कि तबरियों वे कु मुबैल फोन बजि, दूसरी तरफ बिटि आवाज आई—हैलो भैजी!
‘हाँ बबलू बोल! वेन थोड़ा सम्भळी कि जवाब देई।
– वु मकान मालिक अयाँ छन, बुन्ना छन तुम लोखु न पिछला मैना कू किराया बि नि भरी।
-हहहाँ वूँ माँ बोली दे ये मैनै कि तनखा मिलदु ई दी द्योला।
फोन कटि गे छौ। वेन देखि कि वेकी कुर्सी माँ वु ना बल्कि वे का पिताजि कु साँचु रख्यूं छौ, वु गौळि गौळि क पिताजी का साँचा म ढलणू छौ।
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