जून 2026

मेरी पसन्दसमय के सवालों से मुठभेड़ करती लघुकथाएँ     Posted: February 1, 2024

बहुत सी लघुकथाएँ हमें कई कारणों से अच्छी लगती हैं। कुछ हमारी संवेदनाओं को जागृत करती हैं तो कुछ विचार के स्तर पर उद्वेलित करने का काम करती हैं। हमारे आसपास की सामान्य घटनाओं या प्रसंगों में से दृश्यों को चुनकर उन्हें इस तरह विधा के कैनवास पर चित्रित कर देती हैं कि हम पढ़कर भौचक्क हो जाते हैं। कुछ लघुकथाएँ हमें विषय और संदेश के कारण प्रिय लगने लगती हैं तो कुछ सहज संप्रेषण की वजह से सीधे मन में उतर जाती है।
इन सबके साथ साथ मेरे लिए कुछ लघुकथाएँ इस लिए खास हो जाती हैं जो हमारे समय के सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक विसंगतियों और अटपटेपन और पाखंड को रेखांकित करने का काम करती हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो ऐसी रचनाओं में लघुकथाकार समय के सवालों से मुठभेड़ करता दिखाई देता है। 

इस संदर्भ में मुझे चैतन्य त्रिवेदी की लघुकथा ‘समर्पण’ याद आती है। इस लघुकथा में वे अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर आम आदमी की बेबसी का एक बहुत सार्थक और मार्मिक रूपक रचते हैं। एक तरफ आम आदमी को बोलने की स्वतंत्रता की बात राजा करता है लेकिन परिजनों और समाज जनों की प्रताड़ना का दबाव भी बना देता है। ऐसे में उसकी स्वतंत्र आवाज़ का क्या महत्व हो सकता है? बेबसी में उसके मुंह से सिर्फ राजा के जयकारा के अलावा और कौनसे शब्द निकल सकते हैं। चैतन्य त्रिवेदी ‘समर्पण’ लघुकथा में इस कुटिलता पर बहुत सटीक तंज करने में सफल हुए हैं।

कुछ इसी तरह के प्रहार और व्यवस्था पर टिप्पणी विष्णु नागर अपनी लघुकथा ‘दोषी कोई नहीं ‘ में करते हैं। इसमें एक शेरनी बकरी का शिकार कर बैठती है। शक्तिशाली द्वारा निर्बल के शोषण की बात यहाँ बहुत शिद्दत से की गई है। मजेदार बात तो यह है कि शिकार के बाद बलशाली को आत्मग्लानि होती है कि वह ऐसा क्यों कर गई। कमजोर के शिकार के इस पाप को एक दूसरे पर थोपने की परिपाटी और अपने आप को दोषमुक्त बताने के पाखंड पर विष्णु जी की यह लघुकथा वर्तमान समय के कुछ प्रसंगों, घोटालों और षड्यंत्रों पर भी गहराई से टिप्पणी करती है।
उल्लिखित दोनो लघुकथाओं की शैली ने भी मेरा ध्यान खींचा है। इनमें कथ्य का निर्वाह सीधे सीधे नहीं होकर व्यंजना में किया गया है। प्रस्तुति में व्यंग्य विधा के तत्त्वों के साथ कविता के औजारों का भी प्रयोग देखने को मिल जाता है। लघुकथाओं में व्यंजना,लक्षणा शब्द शक्तियों के साथ बिंब और ध्वनि का परोक्ष अहसास पाठक के भीतर कहीं संवेदित होने लगता है। यद्यपि बहुत से लघुकथाकार अपनी रचनाओं में ऐसा करने में सफल हुए हैं किंतु श्री चैतन्य त्रिवेदी और श्री विष्णु नागर जी की इन लघुकथाओं ने मुझे बहुत प्रभावित किया है।
आप भी इन्हे पढ़ेंगे तो मुझे विश्वास है लघुकथा पर मेरी इस समझ को भी स्वीकृति दे सकेंगे।
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समर्पण /चैतन्य त्रिवेदी


उस रात राजा ने मुझे भरे दरबार में बुलाया और कहा, वैसा ही होगा जैसा तू कहेगा।
मैं भौचक्क राजा को देख रहा था… हाँ वैसा ही होगा, तू अगर कहेगा राजा मुर्दाबाद तो मुर्दाबाद, तू अगर कहेगा सरकार निकम्मी है तो निकम्मी है, तू अगर कहेगा की व्यवस्था भ्रष्ट है तो भ्रष्ट है, तू जो कह दे इस दरबार में निर्भय होकर कह, वही हमारी आवाज, बोल तू भाषा तेरी, आवाज तेरी, अभिलाष तेरी।
पूरे दरबार में चुप्पी छा गई। मैंने द्वार से लेकर सिंहासन तक देखा… द्वार के कोने में खड़ा बूढ़ा बाप मेरी तरफ बेबसी से देख रहा था। ऊपर झरोखों में मेरी औरत चार सिपाहियों से घिरी अपनी चूड़ियां दिखा रही थी, मेरे बच्चे बड़े से फूलदान में कांटों के बीच चुपचाप खड़े थे। बस्ती के लोग सीखचों के दूसरी तरफ।
राजा ने फिर बड़े प्यार से कहा, लोकतंत्र है, अभिव्यक्ति की आजादी का पूरा फायदा उठा, डर मत, निर्भय होकर बोल।
मैंने हाथ उठा दिए। उस रात दरबार में ऊपर खुला आकाश, चांद सितारों को निहारा और चीख पड़ा जोर से, जब तक सूरज चाँद रहेगा….!
राजा सहित पूरा दरबार अट्टहास से फूट पड़ा और हम सब अपनी भीगी आंखों के साथ लौट पड़े, उस सूने रास्ते पर, चुपचाप, जो मुल्क से घर की ओर जाता था।
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2-दोषी कोई नहीं? विष्णु नागर

शेर-शेरनी रोते हैं, ऐसा सुना नहीं कभी, मगर एक दिन खबर आई कि शेरनी दहाड़े मार कर रो रही है। पता चला कि उसने एक बकरी का शिकार कर लिया था। उसे बेहद दुख था कि मैंने बकरी जैसे निरीह जानवर को मार क्यों दिया? इतनी निर्दयी हो गई हूँ मैं अब? अभी तो मुझे भूख भी नहीं लगी थी मगर आसान शिकार को देखकर मेरी नीयत बिगड़ गई। बेचारी किसी गरीब का सहारा थी।  क्यों मारा, क्यों मारा मैंने उसे! मुझे नरक मिले।  इतना कह कर वह चट्टान से अपना सिर फोड़ने लगी।

शेरनी ने आत्मग्लानि में अपने पंजों को इसका दोष दिया, जिन्होंने शिकार को ऐसा जकड़ लिया था कि बकरी बेचारी मे-मे करके रह गई। पंजों पर इल्जाम आया तो उन्होंने सफाई दी, वाह स्वार्थी शेरनी! दोष आज मुझे देती है? इन्हीं पंजों की मजबूती की वजह से तूने बड़े-बड़े शिकार किए हैं। अगर दोषी कोई है तो तेरे पैर हैं, जो तुझे चुपचाप उसके पास ले गए और तूने अपने पैने दांतों से उसे दबोच लिया।  पंजे क्या पैरों से स्वतंत्र हैं? और क्या मुझे बकरी या हिरण या जंगली भैंसे के मांस का स्वाद मिलता है? मैं तो तेरी नि:स्वार्थ सेवा करता हूँ और तू मुझी पर दोष मढ़ती है, बेरहम?

पैरों ने स्पष्ट किया, ओय हमारा नाम भी गलती से मत लेना। जब शेरनी दौड़ना चाहती है और शरीर की पूरी ताकत लगाती है तो पैर क्या उसका साथ देने से इनकार कर सकते हैं? इन पैरों की वजह से तुम तमाम शेरनियां मिलकर शिकार कर पाती हो।  जिस दिन ये पैर काम नहीं कर पाएँगे, उस दिन देखना, तुम्हारा क्या हश्र होता है! कौन यह पूछने आता है कि तुम भूखी हो या प्यासी! शिकार देखने के लिए नहीं, खाने के लिए किया जाता है। दोष देना है तो अपनी आँखों को दो। वे बकरी को न देखतीं, तो उस गरीब पर यह मुसीबत न आती!

अच्छा तो बात ये है कि दोषी हम हैं,आंखों ने जवाब दिया! दोषी हम कैसे हैं, कोई बताएगा? आंखें हैं तो जब तक शरीर थक कर चूर नहीं हो जाता, खुली रहेंगी। बंद आंखों से क्या तुम आज तक एक भी शिकार कर पाई हो? कर सकती हो तो हमें निकलवा दो।  ऐसे स्वार्थी शेरनी की मैं होना भी नहीं चाहती। दोष अगर है तो तुम्हारी नाक का है। उसने सूँघा तो मैंने गौर से देखा कि यह जानवर तो बकरी है। इसके बाद मेरा काम खत्म। फिर दोष तुम्हारे मन का है, जो लालची है। वह लालच में आ गया। सही जगह उंगली रखने से डरती क्यों हो?

होते-होते दोषी मुंह और जबड़े हुए। उन्होंने दोष पेट को दिया। पेट ने आँतों को दिया। आंतों ने गुदा को दिया, जहाँ से अंततः सब खाया-पिया बाहर आ जाता है और पेट खाली हो जाता है। गुदा ने सफाई दी, मैं क्या करूँ। सब खाया-पिया मेरी ओर ठेल देते हो, बाहर निकालने के लिए ही तो! यह मेरी गलती है क्या?

अंततः पाया गया कि दोषी कोई नहीं और जो हुआ, ठीक हुआ। यही होना था। बकरी चूँकि पेट में जा चुकी थी, इसलिए उसने इनमें से किसी भी तर्क का जवाब नहीं दिया। वैसे भी बकरियां तर्कप्रणाली में विश्वास नहीं करतीं।
इस तरह यह प्रसंग यहीं समाप्त होता है।इसके बाद आप चाहें तो जन-गण-मन गा सकते हैं।
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