अक्तुबर 2026

दस्तावेज़शोषण के पार्श्व और विवशता के दंश : सतीश राठी की लघुकथाएँ     Posted: October 1, 2026

शोषण के पार्श्व और विवशता के दंश : सतीश राठी की लघुकथाएँ/ प्रो. बी. एल. आच्छा

     यों तो किसी भी नई साहित्य विधा की घट-स्थापना और झण्डाबरदारी की अपनी सुर्खियाँ होती हैं, पर जब सार्थक विमर्श और रचनाधर्मिता की निरन्तरता से वे आन्दोलन का रूप ले लेते हैं तो उसकी स्वीकृति भी मिलने लगती है। लघुकथा के बीज तो भारतीय और पश्चिमी साहित्य की परम्परा में विद्यमान हैं, पर जीवन-संघर्षों और मूल्यों के साथ उसके सहकार तथा रचाव का नयापन लघुकथा को नई संज्ञा के रूप में प्रतिष्ठित करता है। सतीश राठी हिन्दी लघुकथा के आन्दोलन के सक्रिय सहभागी हैं और रचनाकार भी। ‘शब्द साक्षी हैं’ (2002) लघुकथा-संग्रह के माध्यम से उन्होंने इस विधा में दस्तक दी थी। साथ ही ‘क्षितिज’ पत्रिका के नौ अंकों में इस विधा के विमर्श और रचनात्मक प्रवाह को गति दी। ‘समक्ष’ लघुकथा-संग्रह के पंच-लेखकों में वे भी एक हैं। मध्य प्रदेश में लघुकथा के सृजन एवं विकास में उनका योगदान सहयात्री के रूप में ही रेखांकित हुआ है, यद्यपि उनके हाथों में पत्रिका भी थी और सम्पादन भी। पर यह जमीन उन्होंने लघुकथाकारों के लिए विकसित की, बिना निर्देशात्मक विमर्श के। वे जानते हैं कि रचनाधर्मिता के तनाव और आयाम रचना में ही विकीर्ण होते हैं और वे सहज शिल्प को अपने तईं विकसित कर लेते हैं। आठवें दशक की अनुगूँज और शिल्पीय चेतना के तेवर उनकी लघुकथाओं में दृष्टिगत होते हैं, जिनका निरन्तर विकास आज तक होता रहा है।

         सतीश राठी उच्चवर्गीय रंगीनियों और उनके अहमीले तनावों से रूबरू तो हैं, पर मध्यमवर्गीय और विशेषतः निम्नवर्गीय जीवन की विशेषताओं को उससे सटाकर प्रस्तुत करते हैं, जिससे समाज का विषम आर्थिक द्वैत सामने आता है। इन रंगीन रोशनियों और ऊँची इमारतों की छाया में विवश गरीबी और विषम

दिनचर्या उनकी बेकसी को व्यंजित करती है। इस कैनवास पर बुनी उनकी अधिकतर लघुकथाएँ विद्रोह और विवशता, सफेदपोशी और भिखमंगेपन, दबंग और लाचार, मोटी चमड़ी और खिंचती चमड़ी, भ्रष्टता और ईमान, धर्म और बाजार जैसे जीवन- द्वन्द्वों में अपना आकार गढ़ती हैं। इन गहरी फाँकवाले जीवन के परिदृश्यों में तनाव, आक्रोश, द्वन्द्व, विवशता, छटपटाहट लघुकथा के पात्रों में वास्तविकताएँ उकेरते हैं। कहीं हारते भी हैं, कहीं आक्रोश के दाँव भी भरते हैं। यह इसलिए कि लघुकथा की विकासयात्रा में कहीं विवशता का युगीन स्वर करुणा को उकेरता था, परवर्ती दशकों में आक्रोश निर्भय स्वतन्त्रता के प्रतिमान को करता रहा। इसी कारण उनकी लघुकथाओं के परिदृश्य और पात्र बेबसी के मारे बुलन्द भी हैं और शोषक चेहरों को बेनकाब करनेवाली प्रतिध्वनियों के व्यंजक भी।

        सतीश राठी की लघुकथा-यात्रा के इस परिदृश्य के बावजूद उनकी ग्यारह लघुकथाएँ वस्तुपरक अवेक्षण के लिए मेरे सामने हैं। इन लघुकथाओं के संवेद्य पक्ष और बुनावट के शिल्प के विश्लेषण से न केवल उनके भीतर का समाज रेखांकित होगा, बल्कि लघुकथा का समीक्षाशास्त्र भी विकसित होगा।

       ‘जिस्मों का तिलिस्म’ मनुष्य की अस्मिता और विवशता को प्रश्नांकित करती है। एक पूरी कतार है; मनुष्यों की नहीं, मनुष्यनुमा जिस्मों की; जिनके कुरूप कलेवर को अन्न की ही दरकार है। जैसे राशन की दुकान से अन्न मिल जाना इन मनुष्यनुमा जिस्मों की सर्वोच्च आकांक्षा और सार्थकता है, पर वह भी गूँगे प्रशासन और दुकान पर लटके ताले के आगे विवश-कातर हैं। यह ताला उन्हें चिढ़ाता है, पर विवशता उनके दोनों हाथों को भी गायब कर देती है। जिस्म में तब्दील हुए इन्सानों के सिर कटे हैं, और विद्रोह की वाणी के लिए नाक के नीचे मुँह नहीं हैं। न सिर का विवेक, न मुख से आग उगलती कर्कश वाणी। बचे तो सिर्फ हाथ हैं। और निराशा की कसमसाहट में ये हाथ विद्रोही होना चाहते हैं, पर प्रशासन के आगे हाथ भी तिलिस्मी ढंग से गायब हो जाते हैं। ये वे ही लोग हैं जो मानव समुदाय के होकर भी अजनबी और असहाय हैं। भरपेट राशन के मोहताज बने जिस्म। राशन की दुकान से राशन न मिल पाने के विरोध में मानव की तरह हाथ से हुंकार भरते भी हैं तो प्रशासन के आगे हाथ तिलिस्मी ढंग से गायब हो जाते हैं। लोकतन्त्र का यह अर्थतन्त्र कितना बेबस और लाचार है; विवशताओं का पुतला, महज एक भूखा जिस्म। जीवन-विवेक और आत्मा से वंचित इस निरीह समुदाय में विद्रोह और विवशता इस तरह पसरे हुए हैं कि भूख और उसका निदान ही उनके जीवन की एकमात्र प्रत्याशा बन जाता है। इस परिदृश्य में नौकरशाही, बाजारवाद के प्रपंच दमित समूह की मुखरता को गूँगेपन में तब्दील कर देते हैं। लघुकथा फैण्टेसीनुमा शिल्प में असरदार इसलिए है कि वह राशन की दुकान और प्रशासन की निर्मम संवेदनहीनता की सच्चाइयों के ब्यौरों की पेशबन्दी के बजाय उसकी परिणति को ही सामने लाता है, जिसके आगे ये गरीब अजनबी और लाचार हैं। मौलिक अधिकारों के बावजूद अभिव्यक्ति से वाणीविहीन और हाथों के संघर्ष से वंचित। यह तिलिस्म परिणति का यथार्थ है, लघुकथा को ब्यौरों के विवरण से शिथिल नहीं होने देता है।

           ‘संवाद’ लघुकथा मध्यमवर्गीय दाम्पत्य की तल्खियों के बीच सहकार के उस आस्वाद को रचती है, जो तनातनी के बावजूद जीवनयात्रा की मर्म भरी चाहत बन जाता है। मामूली शिकवा-शिकायतों के तीखे संवादों में यह दाम्पत्य अबोलेपन में पसर जाता है। यान्त्रिक रूप से पति-पत्नी के बीच दिनचर्या घिसटती रहती है, पर प्रेम भरी मनुहार का दरिया सूख-सा जाता है। पत्नी कर्तव्य के रूप में चीजों को पति के लिए परोसती रहती है और पति भी इस प्रेमविहीन यान्त्रिक दिनचर्या की आदत में ढल जाता है। पर पन्द्रह दिनों के लिए भोपाल जाने की बात पति-पत्नी के बीच आती है तो अलगाव का अकेलापन आँसू के संवादों में बह जाता है। तल्ख संवादों से उपजा दाम्पत्य का कसैलापन अलगाव से बहते आँसुओं में घुलकर सहकार की राह पकड़ लेता है। भारतीय मध्यवर्गीय दाम्पत्य तनता-बिखरता भी है। और सहकार से छटपटाते हुए जीवन को फिर संवादी बना लेता है। इस लघुकथा में संवाद ही मध्यवर्गीय दाम्पत्य का प्रतिरूप बन जाते हैं और दिनचर्या की ठण्डी-सी निष्क्रियता में अलगाव की पीड़ा दाम्पत्य की जीवन सरिता को फिर बहा देती है।

        ‘कालीन तले दबा लहू’ सांकेतिकता में सफेदपोश अमीरी और मामूली चीजों के लिए ललचाती गरीबी के कण्ट्रास्ट को रचती है। झोंपड़पट्टियों को लीलती हुई ठेकेदारी दान के स्वाँग रचती है, पर ‘पाँच’ रुपये के मामूली स्वार्थ में गरीब को अधिक नंगा और मजलूम बना देती है। ठेकेदार के तिरस्कार से लांछित झोंपड़पट्टी का धरमू खून भरी आँखों के बावजूद बेबस लाचार खड़ा है, अपने फटे बनियान में कम्बल की आस लिए। विद्रोह और विवशता, आँखों के लाल रंग और विवशता की ठण्डी सफेदी में खड़ी भर रह जाती है। अमीर के कालीन के नीचे झोंपड़पट्टी का लहू कितना दबा है, मगर राजनीति और ठेकेदारी की जुगलबन्दी दान-दया का परचम लहरा रही है। कालीन और लहू शोषक-शोषित, अमीर-गरीब के स्तरों में बे हुए जीवन की सांकेतिक व्यंजना करते हैं।

     ‘मक्खियाँ’ लघुकथा ‘अन्धों के हाथी’ का अतिक्रमण है। सड़क पर गिरे  भिखारीनुमा आदमी की कितनी व्याख्याएँ हैं और अन्ततः उसकी पीड़ा में उलझनेकी कारुणिक आस्था के बजाय कुछ तंज कसते हुए अपने दायित्व से पिण्ड छुड़ाने के बहाने कितने मौजू हैं? कोई उसे भूख से, तो कोई लू से मरा समझता है। थोड़ा-सा हिल भर गया, तो जिन्दा समझता है, मगर दारू पिया हुआ बदमाश।कोई उसे लफड़ेबाज कहकर खिसक जाता है। देखते सभी हैं, सभी मन्तव्य देते हैं, कुछ लांछन लगा देते हैं। मगर कोई छूता तक नहीं है, अलबत्ता संवेदना को धता बताते हुए बिना जाने ही आरोप लगाते हुए हर कोई खिसक लेता है। बच रहता है भिखारी और भिनकती मक्खियाँ, और रास्ता नापते हुए पलायन कर जाती है भीड़ की मानवीय संवेदना। मनुष्यों की संवेदनशीलता से छिटककर भिखारी और मक्खियाँ ही सड़क पर पड़े रह जाते हैं। लघुकथा का प्रत्येक संवाद संवेदनहीनता की नई व्यंजना को गढ़ता है और अलग-अलग कोणों से उभरी ये व्यंजनाएँ संवेदनहीन मनुष्यों की भीड़ पर ही व्यंग्य करती हैं।

         ‘बीज का असर’ गँवई परिवेश में अमीर-गरीब के बीच की खाई को ही नहीं बल्कि नारी के देह शोषण की व्यथा को रचती है, मूल्यविहीन ललचाई परम्परा के रूप में। गरीब की सुन्दर लड़की किसी अमीर के बीज का ही खिला हुआ पुष्प है, जिस पर अमीर की ललचाई देह-लालसा है और गरीब गम्मू विवशतावश हाथ की लाठी फर्श पर रगड़ते हुए यही कहने को मजबूर है- “ई बड़े लोग ससुर…खुद ही बीज बोत हैं, और खुद ही फसल काट लेत हैं।” कहानी के संवाद शोषण की इस परम्परा के व्यंजक हैं- “गंगुआ की ना, कौने लाट नवाब की बेटी लगत है।” और जवानी में निखरी गंगुआ की छोरी पर लार टपकानेवाला भी किसी ‘लठैत’ से उठवाने का तजवीज रचता है। जमींदारी के जमाने के अवशेष आज भी इस समाज का यथार्थ हैं।

         ‘आटा और जिस्म’ भी देह शोषण की नियति पर ही केन्द्रित है। मशीन में हाथ कट जाने से विकलांग पति और बर्तन माँजकर पेट पालनेवाली रमिया।भूख की मार से बचने के लिए आटे के बन्दोबस्त के लिए बनिए तक पहुँचती औरत। बनिए से आटा तो मिल गया, पर उसके बाल अस्त-व्यस्त हो गए। माँसल देह गुँथ गई और आटा मिल गया। लेखक ने एक महीन व्यंजना इस वाक्य में भर दी है- “कराहते हुए सुजान को उस गूंथे हुए आटे में और पत्नी के जिस्म में कोई फर्क नहीं लग रहा था।” जीवन की मार, करुण बेबसी, मजदूरिन नारी, पेट भरने के लिए आटे की दरकार और आटे के बदले नारी देह को गूँथकर सुखकर व्यापार की मॉसल वृत्तियाँ- यही सब विकलांग सुजान के भीतर कराह भर देता है, पर इस कराह का कोई निदान नहीं।

         ‘क्लीन सिटी’ अपनी इतिवृत्तात्मकता में संवादीपन को भले ही न रचती हो,पर लोकतन्त्र के नकाबी फितूरों का पर्दाफाश अवश्य करती है। ‘क्लीन सिटी’ का  खिताब पाने के झमेले कितने ‘क्लीन’ हैं और क्लीन सिटी की गरीब बस्तियाँ कितनी ‘मलिन’ हैं; बल्कि वे न्यायकर्ताओं की दृष्टि से ओझल हैं, फिर भी शहर पुरस्कृत हुआ है। व्यंग्य यह है कि दृश्यावली का अवलोकन पुराने राजप्रासादों तक सीमित है। उन सड़कों पर दौड़नेवाली कार काले शीशे से ढँकी है। निरीक्षण के लिए घुमानेवाली नगर की लोकतान्त्रिक सरकार के सामने गन्दी बस्तियाँ हैं, पर उनको दरकिनार रखने की समझदार आँख है। लगता है क्लीन सिटी का अवॉर्ड देने के बहाने घुमक्कड़ पर्यटन टोली आई हैं, जो पुराने राजमहलों की सड़कों और मेहमानों को परोसे गए शाही व्यंजनों से मुग्ध होकर यह खिताब दे गई है। अलबत्ता इस क्लीन सिटी की खबर के सामने गन्दी बस्तियाँ, उनके लोग, सूअरों की हुँफ-हुँफ और बदबूदार हवाओं के दृश्य सचित्र होकर एक-दूजे को चिढ़ा रहे हैं। शहर को मिले क्लीन सिटी के ‘ताज’ के आगे गन्दी बस्तियों के लोग कितने ‘बेताज’  हैं? यह कहानी सच्चाई और स्वप्न के बीच की गन्दी खाई को रहने देती। कण्ट्रास्ट ही इस कहानी के व्यंग्य को बुनता है। चुप नहीं  ‘पेट का सवाल’ लघुकथा ईमानदारी को तमाचा मारती ठेकेदारी के ‘भ्रष्ट मिक्सचर’ को परोसती हैं, जिनसे देश की सड़कें ‘आबाद’ होकर ‘बर्बाद’ होती रहती हैं। युवक नया है, जो अधिक डामर डालकर मजबूत सड़क बनाना चाहता है। मगर ठेकेदार अनुभवी घाघ है जो जानता है कि बाबू, इन्जीनियर, अधिकारी, मन्त्री का प्रसाद निकाले बगैर सड़क नहीं बन पाएगी। तब गिट्टी-चूरे की अधिक मिलावट ही मुनाफा रच पाएगी। गिट्टी का चूरा जल्दी ही गड्ढा बन जाएगा और नए होते गड्ढे पेट के गड्ढों को भरते चले जाएँगे। सड़कें तो सबके पेट पालती हैं, निरन्तर गड्ढों में तब्दील होकर उन्हें फिर-फिर भरती हुईं। असल में यह कहानी उस मॉडल की व्यंजक है, जिसमें ‘मरम्मत’ की लम्बी सम्भावनाएँ हैं, न कि एक बार ‘स्टैण्डर्ड’ रचकर प्रतिशत की सम्भावनाओं को लील जानेवाली पक्की सुविधा। यह ‘मरम्मतवाद’ ही बड़े होते जाते पेट की भूख भरी अनन्त आस्था है।

        ‘आक्रोश’ लघुकथा भी अकाल में दुधारू पशु (जीवन) को बचाने की बेचैन आकांक्षा की व्यंजक है, पर भैंस की ममता भरी रम्भाहट और उसके पेट को न भर पाने की विवशता उसके हाथों में बन्दूक थमा देती है, जो अन्ततः अपने ही प्रिय पशुधन को माँस के लोथड़े में बदल देती है। एक ओर परबत सिंह की सूनी आँखों की अश्रुधारा है और दूसरी तरफ आग उगलते आसमान को दागती गोलियाँ। तरलता और आग, ममत्व और ममत्वहन्ता गोलियां, मनुष्यत्व और उसका विवश हन्ता-भाव, ऐसे समानान्तर परिदृश्य को बुनते हैं जिसमें विवश पागलपन ही शेष रह जाता है। लेखक ने प्रकृति के सूखते उपादानों और उनके बीच प्रिय पशु के रम्भाते ममत्व को इस तरह सँजोया हैं कि पशु का पेट भरने की बेचैनी उसे आकुल-व्याकुल करती हुई आकाश के उस पार पहुँचा देती है, जहाँ से जीवन भी आता है और अकाल की आग भी।

     ‘अपनी-अपनी आस्था’ धर्म के बाजारीकरण के छद्म को उजागर करती है। कुछ ऐसे चमत्कार, चमत्कारों का अफवाहों से भी तेज प्रचार, लोगों में श्रद्धा का उफान, बाबाओं के चरणों में खनखनाते सिक्के और नोट तथा उस श्रद्धा को भुनानेवाले गाँव के अगुआ लोग। एक रेला-सा मचल जाता है और श्रद्धालु लोग नतमस्तक होकर उसके चरणों में जेब को उलीचते चले जाते हैं। मगर पूजा के कर्मकाण्ड के बगैर कोई भी श्रद्धा फलती नहीं है। औरों को फले न फले; पर बाजार को तो फलती है। कोई खलनायक या नायक बनकर बाबा के ढोंग धतूरों को भले ही हथकड़ी तक पहुँचा दे, मगर आस्था का यह रेला तब तक बाजार को तो कमाई दे ही जाता है। कर्मकाण्ड और बाजार का रिश्ता इन आस्थाओं से मजबूत हो जाता है। पर ‘श्रद्धेय पुरुष’ के बेनकाब होने पर उजड़ भी जाता है। आस्था का एक स्वरूप प्रधानजी को यशस्वी बना देता है, सरपंचजी को प्रशासनिक शिकायत और भण्डाफोड़क विरोध से खलनायक बना देता है, दुकानों को लक्ष्मीमय बना देता है और गाँव का हुक्का इन्हीं सबमें घुमड़ता रहता है। लेखक ने आस्था के अपने-अपने लाभमय प्रपंचों को उजागर किया है, जिनमें भोला मानस फँसा रहता है।

      आकार में सबसे छोटी लघुकथा है- ‘जन्मदिन’। दो विरोधी परिदृश्यों की समानान्तर योजना से लेखक ने पशु और मानव को प्रतीक नहीं बनाया है, बल्कि “कुत्ते के अमीर वैभव और गरीब के बच्चे की अकुलाहट को व्यंजित किया है। अल्सेशियन पिल्ले और चौकीदार के बच्चे का जन्मदिन एक ही है। मगर दोनों की नियति नितान्त अलग है। अल्सेशियन कुतिया के पिल्ले का जन्मदिन मालिक की कोठी मना रही है और उसी कोठी के मालिक के चौकीदार की पत्नी बच्चे की वर्षगाँठ पर अपना सूखा स्तन उसके मुँह में ठूंस रही है। पिल्ले और बच्चे के दिन की कुण्डली तो एक है, पर विलास और अभाव का भाग्यफल नितान्त विलोम है।

         सतीश राठी की लघुकथाएँ दबे-कुचले मामूली-से आदमी के जीवन और उनकी विवशताओं का बयान करती हैं। वे उनकी असहाय अवस्था से पाठक को सकरुण बनाती हैं। कभी आक्रोश से दाँतों को भींचती भी हैं, पर मुट्ठियाँ तानकर जुलूस बन जाने की टकराहट तक नहीं जातीं। शायद यह इसलिए हो कि अस्सी-नब्बे के दशक में ये लघुकथाएँ विवशता की कारा में ही भावभूमि बुनती रही हों पर तब का देवदास अब बदल चुका है। अलग बात है कि जमींदारी और बनियावादी शोषण के अवशेष आज भी जिन्दा हैं और शक्ल बदलकर शोषण की नई तरतीबों को रचते रहते हैं। परन्तु ये लघुकथाएँ सतीश राठी को पूरी तरह नहीं। समेटतीं। पंचतन्त्र शैली में रची उनकी लघुकथा ‘बैकग्राउण्ड’ राजनीति और दबावों के तन्त्र को बखूबी पेश करती है, जिसमें चूहा भी दमदार कुत्ते के साथ छपे अपने समारोही फोटो को दिखाकर बिल्ली मौसी को रोब दिखाता है और बिल्ली मौसी नौ दो ग्यारह हो जाती। राजनीति की चालें – कुचालें तथा खतरों से टकराते हुए तनकर निकलने के दाँव-पेंच विवशताओं को तोड़कर निर्भयता को मूल्य बनाते हैं।

             लघुकथाओं के गठन, उनकी बुनावट, उनकी तीक्ष्णता, क्लाईमेक्स वगैरह के बारे में सवाल करना भी बेमानी नहीं है। संवेदनाएँ भी उपयुक्त शिल्प पाकर ही निखरती हैं और लेखक की चालक-शक्ति मामूली-से दिखनेवाले संवेदन और घटना को भी असरदार बना देती है। यह अलग बात है कि कुछ आलोचक मानते हैं कि नदी स्वयं अपने किनारे तैयार कर लेती है। इस बहस और सतीश राठी की लघुकथाओं से गुजरते हुए यह कहना समीचीन होगा कि लेखक अमूर्तन, प्रतीकन और सांकेतिकता के फेर में ज्यादा नहीं पड़ता, बल्कि संवादों, प्रतिक्रियाओं, घटनाओं, विरोधी सादृश्यों के माध्यम से ही कथाचक्र का विन्यास करता है। यह सहजता इन लघुकथाओं की भाषा, उनकी बुनावट और शिल्प में है। कहीं-कहीं लक्ष्य तक पहुँचने की सोद्देश्यता मुखर अवश्य होती है, पर शिल्प की अतिरिक्त सजगता उसकी सृजन-प्रक्रिया में नहीं है। दरअसल सतीश राठी अपनी अभिधा भाषा में आम पाठक के बीच पूरी संवेदनीयता के साथ पहुँचते हैं, जहाँ निम्न और मध्यमवर्गीय जीवन की विसंगतियाँ, पारिवारिक दुराव-तनाव, तमाशबीन राजनीति और प्रशासन, मजदूर-किसान की व्यथाएँ, मानवीय संवेदना से छिटकती मनुष्यों की भीड़, नारी देह के शोषण की दास्तानें, भ्रष्टाचार-कसे मोटे होते पेट, धर्म को बाजार में तब्दील करती आस्थाएँ पाठक को दूरन्त सच्चाइयों से संक्रान्त करती हैं। कहीं चेतना के स्तर पर, कहीं आक्रोश के स्तर पर, कहीं यथास्थिति पर चोट करते हुए बदलाव के स्तर पर इन लघुकथाओं में रंगीन परिवेश और रोशनियों को गरीबी और शोषण के पार्श्व में ही उकेरा गया है जिनसे विषमता और विवशता के दृश्य अधिक मुखर हो जाते हैं और उनमें अमीरी और गरीबी के रंगों की गहरी फीकी छायाएँ अधिक मूर्त और जीवन्त नजर आती हैं।

            लघुकथा विधा को जीवन्त और शिल्प को प्रभावी बनाने के सहज यत्न ही उसे नया बना सकते हैं। जीवन के अन्तर्विरोध सामाजिक सत्यों का संकेत देनेवाले खण्ड-सत्य, तकनीक से जीवन में संक्रान्त हुए नए वायरस, संचार में पनपता प्रेम और टूटते हुए जीवन, डिप्रेशन से गले की रस्सी तक पहुँचता जीवन का घातक क्षण, प्रतियोगिताओं और दबावों में सिकुड़ती जिन्दगी, भ्रष्टता की तकनीक और तकनीक के जरिए बढ़ती भ्रष्टताएँ, दाम्पत्य के नए सहचार जैसी अनेक चीजें लगातार सामने आ रही हैं। कभी टूटते हुए घर का सच कहानी में मूल्यों का क्षरण बनकर आया था, नई कहानी में आज अपार्टमेण्ट में ही उभरती दाम्पत्य की उलझनें नई दीवारें बना रही हैं। ऐसा नहीं कि यह सब लघुकथाओं का सच नहीं बना है, पर समय को संक्रान्त करते हुए शिल्प की नवीनता में रचा लघुकथाओं का जीवन्त स्वर इस विधा को मुखर बनाएगा। सतीश राठी की संकलित लघुकथाओं में शोषण के दंश और सामाजिक अन्तर्विरोधों का मुख्य स्वर है, परन्तु अन्य लघुकथाओं में सामाजिक-सांस्कृतिक- प्रशासनिक प्रदूषण को व्यंजित करने का सहज शिल्प भी प्रभावी है।

बी एल आच्छा, नॉर्थटाऊन अपार्टमेंट, फ्लैटनं-701टॉवर-27, स्टीफेंशन रोड(बिन्नी मिल्स), पेरंबूर चेन्नई (तमिलनाडु)-600012

मो-9425083335

गतिविधियाँ

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)


    sahnisukesh@gmail.com

    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´

    रचनाएँ भेजने के लिए ई-मेल-:-

    laghukatha89@gmail.com

    विशेष सूचना-:-

    पूर्व अनुमति के बिना लघुकथा डॉट कॉंम की सामग्री का उपयोग नहीं किया जा सकता ।

    केवल स्वीकृत रचनाओं की ही सूचना दी जाती है।

    -सम्पादक द्वय

Design by TemplateWorld and brought to you by SmashingMagazine