
लगा कि पूरे शरीर का खून एकबारगी जम गया और तलवे से सनसनाकर उठते हुए आँखों से उबल पड़ा। लगा कि किसी ने नीम से भी कड़वी कोई चीज जबरन मुँह फाड़कर उड़ेल दी। लगा कि पूरा घर , घर की छत ,जमीन , सारे सामान तेजी से घूमते हुए उसी पर आकर गिर जाएँगे। सुकन्या घबराहट और असह्य उत्तेजना मे थी। वह पलंग पर ऐसे गिरी, जैसे कोई कटा हुआ पेड़ गिरा हो। वह भी औंधे मुँह। देर तक रोती रही , तिलमिलाती रही । उसका कलेजा फटा ही जा रहा था कि वह चौंककर उठी, ननद थी। ननद का मुँह उसे ऐसा लगा जैसे वह निगलने आयी हो। सुकन्या ने पड़े – पड़े हाथ जोड़ लिये ।
”भाभी ! माँ और पिताजी तुम्हें बैठक पर बुला रहे हैं।” ननद की आवाज उसके फटे हुए कलेजे को क्षत – विक्षत करने के लिए काफी थी।
सुकन्या का पति सेना मे अफसर था। वह विवाह के तीसरे ही महीने कश्मीर मे किसी फिदाईन हमले का शिकार हो गया था। उसका पति अपने माँ – बाप का इकलौता बेटा था, तो सुकन्या की आँखों मे उतर कर रह गये किसी अमित – अगाध स्नेह के समंदर की तरह । वह आज भी अपने पति के प्रेम पर अपने सौ जन्म लुटाने के प्रण पर अडिग है। पर यह क्या ! विधाता ने अतीत की जिस अनकही दास्तान को उसके सम्मुख ला खड़ा किया, उससे तो उसका समस्त पति- प्रेम धूल धूसरित हो जाएगा। मैके और ससुराल की सारी प्रतिष्ठा स्वाहा हो जाएगी। कॉलेज के दिनों में अर्जुन ने सुकन्या से प्रेम किया था; पर विवाह के बाद सुकन्या के चित्त में भी नहीं आया, आज सुकन्या के विधवा जीवन को ग्लानि में डुबोने उसके सास – ससुर के सामने आकर बैठ गया।
सुकन्या किसी अपराधी की भाँति पेश हुई। सास उठी तो सुकन्या की धड़कन रुक गई । सास ने स्नेहपूर्वक उसे अपने कलेजे से लगा लिया- ”सुकन्या! तेरे पति के साथ तेरे सास- ससुर भी चल बसे। हम दोनों तो तुम्हारे माँ – बाप बनकर बचे हैं। अर्जुन तुम्हें प्राणपण से चाहता है। यह कई बार तुम्हारे साथ विवाह का प्रस्ताव लेकर हमारे पास आ चुका है। इसने तुम्हें फोन भी नहीं किया, हमसे तुम्हारा हाथ माँगा।”
”और हमने दे भी दिया।” -ससुरजी ने पानी का गिलास उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा, ” बेटी! मुझे कन्यादान का अवसर दोगी न!”
” भाभी ! तुम मुझसे रिश्ते में बड़ी भले हो , पर उम्र में छोटी हो ।अपनी छोटी बहन को डोली में बिठाकर विदा करने का सुख मिलेगा। ” ननद ने सुकन्या के माथे पर हाथ फेरा।
सुकन्या ने सिर उठाया , अर्जुन के समीप से उठती हुई एक गंध उसके चित्त मे एक झोंके के साथ उतर गई। उसने अपने आँसुओं को गिरने से बचा लिया; पर दौड़कर पलंग तक आई , फिर औंधे मुँह पड़कर सुबकने लगी। पलटकर देखा, इस बार घर का न तो कोई सामान हिल रहा था, न वह घबरा रही थी। शीशे से झाँकते उसके दिवंगत पति की मुस्कुराहटें उसे शुभकामनाएँ दे रही थीं। उसने तुरंत मुस्कुराकर शुभकामनाएँ स्वीकार कर लीं ।