छठा पुरस्कार
उस दिन सुबह-सुबह ही शहर के लोगों की नींद जब खुली तो हवा में एक अफवाह घुली हुई थी। कोई बता रहा था कि हबीबगंज के एक धार्मिक स्थल के दरवाजे पर एक काले रंग का पैकेट मिला है, जिसके चारों ओर मक्खियां भिनभिना रही हैं। अचरज वाली बात यह थी कि लगभग उसी समय यह भी खबर उड़ी कि हबीबगंज से सटे दूसरे मोहल्ले सुंदर नगर में भी दूसरे संप्रदाय के धार्मिक स्थल के निकट भी एक काले रंग का पैकेट पड़ा मिला। उस पर भी मक्खियां भिनभिना रही थीं। पैकेट के नजदीक कोई नहीं गया। किसी ने उसे परखने की जहमत नहीं उठाई। लेकिन तनाव दोनों मोहल्लों में पसरने लगा। देखते-देखते दोनों संप्रदाय के लोग अपने-अपने धार्मिक स्थल के पास जुटने लगे। उनकी फुसफुसाहट धीरे-धीरे आक्रोशित शोर में तब्दील होने लगी। शहर प्रशासन के आला अधिकारियों के हाथ-पांव फूलने लगे। पुलिस फोर्स, पैरा मिलिट्री की गाड़ियां उन इलाकों की तरफ कर्कश सायरन की आवाज के साथ दौड़ पड़ीं।
उधर लोगों का हुजूम बढ़ता जा रहा था। उनके हाथों में अब सरिया, डंडे, पत्थर, कुल्हाड़ी भी नजर आ रहे थे। कुछ लोगों की कमर में खुंसे हुए कट्टे, तमंचे और लंबे चाकू भी झांक रहे थे। दोनों समुदाय की भीड़ यह मान चुकी थी कि उसके धर्म में पवित्र माने जाने वाले पशु के ही कटे अंग उन पैकेट्स में हैं। उन पशुओं के लिए दोनों समुदाय के लोग एक दूसरे का खून बहाने के लिए नियंत्रण से बाहर होते जा रहे थे। किसी तरह सुरक्षा बलों ने उन्हें रोका हुआ था। तभी पुलिस कर्मियों ने उन पैकेट्स को वहां से हटाने के लिए उठाया। घबराहट और जल्दबाजी में पैकेट फट गए। एक पैकेट से किसी बच्चे की कटी हुई हथेली गिर पड़ी तो दूसरे से बच्चे के पैर का टखना। यह देखते ही सुरक्षाकर्मी स्तब्ध रह गए। उग्र भीड़ का आक्रोश शांत होने लगा। किसी मासूम को भले ही निर्ममता से मारा गया था लेकिन दोनों धर्म अब सुरक्षित थे।
-0- विज्ञान भूषण, मुख्य उपसंपादक, हरिभूमि (हिंदी दैनिक), 129 ट्रांसपोर्ट सेंटर, पंजाबी बाग, पश्चिमी दिल्ली, नई दिल्ली-110035, bhushanvigyan@gmail.com
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