इतने दिनों में लोग सभ्यता के नाम से सभ्य होते-होते बहुत सभ्य हो चुके थे, साथ ही औपचारिक भी। विनम्रता में झुकते-झुकते बहुत झुक गए थे।
सड़क पर सभी साफ़-सुथरे कपड़े पहने झुके हुए चल रहे थे। पुलिस लोगों पर निगरानी रखती कि लोग कितना झुककर चल रहे हैं। यह भी देखती कि कितने औपचारिक हैं। किसी आत्मीय से राह चलते मिलते, तो सीमित हँसी हँसकर अपनी खुशी जाहिर करते। सीमित हँसी, यानी मुस्कुराहट, जो चेहरे पर रहती, उससे कुछ लंबी हो जाती। अगर दाँत साफ़-सुथरे सफ़ेद हैं, तो थोड़ा दिख सकते थे। अधिक हँसना अपराध था। दंड स्वरूप धीरे से रोने को कहा जा सकता था।
सड़क पर एक दिन एक ऊँचा आदमी, लगा कम झुका चल रहा था। नहीं, वह पूरा झुका था, पर लंबा होने की वजह से दूसरों की अपेक्षा कम झुका दिख रहा था। पुलिस को उसके ऊपर शक हो गया कि वह कम विनम्र है। जैसे सैनिकों की परेड में समूह की समता लाने के लिए सभी एक ही ऊँचाई, बराबरी के सैनिक होते थे; वैसे ही आम नागरिकों का निकलना, हर काम परेड की तरह शोभित हो जाता था।
व्यवस्था की ऊँचाई इसी में थी कि लोग झुके हुए हैं। व्यवस्था ने यह होशियारी की थी, पुलिस में, सभी बौने ढूँढ-ढूँढकर भर्ती किए गए थे और पुलिस वालों से कहा गया था कि वे तनकर रहें।
(कहानियों का कहानियाँनाः विनोद कुमार शुक्ल-हिन्दी युग्म से साभार )
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