उस दिन सड़क पर एक कार रुकी। कार से चार आदमी उतरे। उनमें से एक के हाथ में हॉकीनुमा डंडा था। उन्होंने अपने पीछे आ रहे ट्रक को रोका। उसके चालक को भला बुरा कहा। ट्रक के सामने का पूरा शीशा तोड़ा और इतने पर भी सब्र नही हुआ तो खिड़की खोलकर चालक को डंडे से पीटने लगे।
मार खा चुका चालक भय से थर-थर काँपता हुआ ड्राइविंग सीट के दूसरे कोने पर उकड़-कूं बैठा अपने आपको बचाने की कोशिश कर रहा था। सड़क पर जमा भीड़ इस दृश्य को देख रही थी। किसी की कोई प्रतिक्रिया नहीं थी, बस जैसे किसी फिल्म का दृश्य देख रहे हों।
तभी भीड़ में से विक्षिप्त-सा लगने वाला एक युवक आगे बढ़ा। उसने तोड़-फोड़ करने वाले युवक के हाथ से हाकीनुमा डंडा छीना और फिर उकड़-कूं बैठै भयभीत चालक को पुकारता हुआ बोला-‘‘चल, नीचे उतर!’’ भय से थर-थर काँपता हुआ चालक वहीं सिमटा हुआ था।
‘‘मैंने कहा, नीचे उतर! तेरा कुछ नहीं बिगड़ेगा।’’ बचने का कोई उपाय न देख लाचार चालक आखिर नीचे उतरा।
‘‘ले पकड़ डंडा और तोड़ डाल कार के शीशे !’’ कहते हुए उसने डंडा चालक के हाथ में थमाया।
‘‘सोचता क्या है? तोड़ डाल!’’ युवक के स्वर में आक्रोश था।
‘‘हाँ, तोड़ डाल! तोड़ डाल!!’’ युवक के साथ कई और स्वर सम्मिलित हुए। सामूहिक उद्घोष का चालक पर ऐसा असर पड़ा कि उसने डंडा पकड़ा और कार के शीशे तोड़ डाले।
‘‘शाबाश!’’ एक साथ कई स्वर उभरे। चालक दुगुने जोश से पूरी ताकत के साथ कार पर प्रहार करने लगा।
अपने आपको मुसीबत में देख कार वाले जैसे तैसे कार में सवार हुए,कार स्टार्ट की और भाग खड़े हुए।
उनके भागने पर चालक के चेहरे पर विजयी मुस्कान उभरी। विरोध से उपजी ताकत को उसने पहली बार महसूस किया था।