नवम्बर 2026

देशवापसी     Posted: April 1, 2025

कोरोना के तीन साल! लाखों लोगों की मृत्यु से होकर गुज़रे हैं ये साल। साल भर पहले माँ भी इसी काफ़िले में शामिल हो सदा के लिए खो गईं।

30 घंटे की लंबी यात्रा कर वह न्यूयार्क से कल शाम ही ग्वालियर पहुँची। माँ के जाने के बाद उसकी पहली यात्रा, वह भी उनकी बरसी पर! उसके पैर ठिठक रहे थे, माँ के बिना उस घर की कल्पना से दिल दहलता था, जबकि भाई-भाभी और बच्चे  सभी तो थे वहाँ। पिता के न रहने पर माँ उसका घोंसला थीं, जिसमें चैन से वह पर फैलाकर लेट भी सकती थी और उनके सीने में सिर गड़ाकर फड़फड़ा भी सकती थी, अब वह घोंसला नहीं था और न सिर गड़ाने को वह सीना! कैसे रहेगी वह माँ से खाली घर में? आँखों में आँसू उमड़े पड़ते थे!

रात खाना खा, वह बिस्तर पर जो गिरी, तो सुबह भाभी के चाय लाने पर ही जागी। भैया भी अपनी चाय लिये उसके  पास आ बैठे थे। अलसाई सुबह की उदास आँखें खुलने लगीं। सब नया लगा, कमरे का पेंट नया, सामने का सोफ़ा भी नया! अलबत्ता कमरे की चौखटें उसी लकड़ी की थीं। मन में कहीं इस नएपन से चिढ़ हुई-  “अभी से सब नया?” 

इतने में भाभी ने पुकारा, “खाली चाय नहीं, साथ में यह भी लो नीता!”

वह अचकचाकर भाभी को देखने लगी। भाभी के हाथ में वही पुराना डिब्बा था।

अचानक बिसरा हुआ पुराना दृश्य आँखों में घूम गया…
माँ इसी डिब्बे से सबको पारले- जी के दो-दो बिस्कुट सुबह की चाय के साथ देतीं, वो मना करती तो कहतीं, “खाली पेट चाय मत पियो, पेट खराब होता है। ”

डिब्बा वही था, पर उसे पकड़ने वाले हाथ अलग थे। वह फिर यादों में खोई चाय का कप पकड़े बैठी रह गई। भाभी ने हल्के से उसे हिलाया, “चाय ठंडी मत करो। पीकर नाश्ते के लिए तैयार हो, तुम्हारे भैया हीरा हलवाई से तुम्हारे लिए गर्मागर्म कचौड़ी -जलेबी मँगवा रहे हैं। ”

भाई ने उसकी तरफ़ मुस्कुराकर देखा और उसकी पीठ पर हाथ रखकर बोले, “तुझे पसंद है, तो सोचा आज मँगा लें, कल से पूजा की तैयारी शुरू…और सुन, यह नया सोफ़ा और पेंट माँ के सामने ही कोरोना शुरू होने से पहले हुआ था, उन्हीं की पसंद का रंग है यह। तुझे बताया था, पर शायद तू इतने दिन बाद आई सो भूल गई होगी। ”

वह झेंप गई, भाई ने उसकी नज़रें पढ़ लीं थीं।

पीठ पर भाई के हाथ और सामने खड़ी भाभी की मुस्कुराहट ने उसके सूने मन को गरमाई से घेर लिया। क्षण भर को लगा, माँ चौखट के पास खड़ी मुस्कुरा रही हैं।

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