
रात में धमाका हुआ। बारूद की गंध बिना छत की पत्थर की दीवारों से अब भी आ रही थी। मेहर शेष बचे अपने लकड़ी के घर के पास खड़ी थी। पास ही रखा सिर्फ एक जूता भरे-पूरे परिवार कहानी बता रहा था। वह डरी नहीं पर आँखों से आँसू बह रहे थे। उसने अपनी दोनों बाँहें फैलायी। उसने देखा कि उसकी परछाई पक्षी के समान दिखायी दे रही थी। उसने परछाई से पूछा, “क्या आसमान में बम का डिब्बा है?”
परछाई मौन रही पर रेस्क्यू टीम के एक सैनिक अंदर आया और उसे देखकर कहा,”बेबी! तुम अकेली हो? सुरक्षित जगह पर जल्दी चलो।”
“अंकल! हम अपने घर कब लौटेंगे?”
“पता नहीं बेबी। आओ चले। वहाँ तुम्हारे जैसे कई बच्चे हैं। उनके साथ मिलकर तुम्हें अच्छा लगेगा,” रेस्क्यू टीम में एक वयोवृद्ध ने रोती हुई मेहर को चुप कराते हुए कहा।
आँसू पोंछते हुए मेहर बोली,”अंकल! आसमान से बोलो अगली बार बम नहीं खिलौने गिराना और ढेर सारे सफेद कबूतर भी।”
परछाई मौन रही पर रेस्क्यू टीम के एक सैनिक अंदर आया और उसे देखकर कहा,”बेबी! तुम अकेली हो? सुरक्षित जगह पर जल्दी चलो।”
“अंकल! हम अपने घर कब लौटेंगे?”
“पता नहीं बेबी। आओ चले। वहाँ तुम्हारे जैसे कई बच्चे हैं। उनके साथ मिलकर तुम्हें अच्छा लगेगा,” रेस्क्यू टीम में एक वयोवृद्ध ने रोती हुई मेहर को चुप कराते हुए कहा।
आँसू पोंछते हुए मेहर बोली,”अंकल! आसमान से बोलो अगली बार बम नहीं खिलौने गिराना और ढेर सारे सफेद कबूतर भी।”