अधेड़ उम्र की उस औरत के साथ बीस-बाईस वर्ष की युवती, सलवार क़मीज़ पहने हाथ में छोटा-सा पर्स लिए मेरे सामने खड़ी थी। मुझे पहचानने में देर नहीं लगी। वह सरस्वती थी। मैं उसे तपाक से मिली। बोली, “यहाँ कैसे सरस्वती , कई साल हो गए मिले।”
हाँ बीबीजी, साल तो बहुत हो गए। आप ही चली गई थीं, मैं तो तब से ही इधर हूँ। आपके आने का पता चला तो मिलने चली आई। इसको पहचाना बीबीजी।” उसने लड़की की ओर इशारा किया
मैं पहचानने की कोशिश करने लगी। उससे पहले ही उसने बताया, “बीबीजी यह कमला है। आप ही की कमला, याद है न आपको।”
जीवन की आपाधापी में मैं कमला को भूल गई थी। बरसों पहले इसी तरह एक दिन सरस्वती ,कमला को साथ लेकर आई थी। मेरे पूछने पर उसने बताया था, “बीबी जी यह मेरी बेटी कमला है , गाँव के स्कूल में पाँच दर्जा तक पढ़ी है, अब आगे और पढ़ने की ज़िद कर रही है। गाँव में तो बड़ा स्कूल है नहीं। दूसरे गाँव में कैसे भेज दूँ। अभी तक तो मुफ़्त में पढ़ती थी। अब के फ़ीस कपड़ा लत्ता सब चाहिए हैं। सोचो भला कहाँ से लाऊँ, और भी तो बच्चे हैं। अब यह भी मेरे संग काम करेगी।” कहते कहते उसकी आँखों में आँसू आ गए।
लड़की किंकर्तव्यविमूढ़-सी देखती रही। वह पढ़ने में तेज़ थी; पर परिस्थितियाँ उसका साथ नहीं दे रहीं थीं।
मैंने सरस्वती को समझाया। लड़की पढ़ना चाहती है, तो इसे पढ़ने दो। तुम चाहो तो इसे मेरे पास छोड़ सकती हो। स्कूल में दाख़िला दिलवा दूँगी।”
पर वह मेरे पास छोड़ने को तैयार नहीं हुई। बोली,” बीबी जी गाँव में रहती हूँ। बिरादरी के लोग ग़लत सोचे हैं, लड़की को किसी के घर छोड़ दिया। न बीबीजी न, ऐसा न कर सकूँ मैं।”
मेरे सुझाव पर वह लड़की को साथ ही लाने लगी। मैंने स्कूल में उसको दाख़िला दिलवा दिया। सरस्वती लोगों के घरों में काम करती। लड़की स्कूल जाती। छुट्टी होने पर वह उसे साथ ले जाती। ख़र्चा मैं देने लगी थी।
लड़की पढ़ती रही। इस बीच मुझे बाहर जाना पड़ा। उसके खर्चे का प्रबंध मैं कर गई थी।
बरसों बीत गए, मैं लौट नहीं पाई। अब वापिस आने पर कमला मेरे सामने थी। ट्रेनिंग लेकर वह स्कूल में पढ़ाने लगी थी।
सरस्वती कह रही थी,” बीबीजी हमारी तो जिंदगी ही सुधर गई। अच्छे घर में इसका ब्याह होने वाला है। छोटे भाई -बहनों को भी पढ़ा रही है। ”
मैं खुश थी। एक दीपक की लौ ने कितने ही दीपकों को रौशन कर दिया था।
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