जून 2026

दस्तावेज़लघुकथा समय का दृष्टिसंपन्न लघुकथाकार – रवि प्रभाकर     Posted: October 1, 2022

एक चेहरा जिसके व्यक्तित्त्व अथवा कृतित्व पर लिखना एक समान है। वह चेहरा रवि प्रभाकर का है। रवि प्रभाकर जितने वाक्पटु थे उतने ही समृद्ध लघुकथाकार भी। उनकी बातें अर्थवान होती थीं। शब्दों को तौलकर बोलना उनका स्वभाव था। इसी स्वभाव के कारण रवि हम सबको और ख़ासकर आजकल की युवा लघुकथाकार पीढ़ी को बहुत भाने लगे थे। उनके व्यक्तित्त्व को लेेकर यह बात मैं मन गढ़न्त और सतही तौर से नहीं कह रहा हूँ प्रत्युत उनको बहुत क़रीब से जानने और समझने वाली युवा पीढ़ी के लघुकथाकारों से गाहे-बगाहे होने वाली मेरी चर्चाओं के आधार से कह रहा हूँ। रवि प्रभाकर ख़ुद परिपक्व लघुकथाकार थे ही बरअक्स इसके नई पीढ़ी के महत्त्वाकांक्षी लघुकथाकारों के सच्चे मार्गदर्शक भी थे।

रवि प्रभाकर लघुकथा को जीते थे या लघुकथाएँ उनमें जीती थीं। बाहरी अर्थ से दोनों कथ्य समानार्थी हैं। मगर आभ्यंतरिक तरीक़े से देखें तो जान सकते हैं कि उनमें लघुकथा विषयक सृजन-प्रक्रिया की पूर्ण जानकारी थीं। लघुकथा के ‘मीटर’ का ज्ञान था। अन्वेषणात्मक रूप से लघुकथा के प्रणयन में अविवादित अंतर्वस्तु की तलाश का माद्दा उनमें था। विचारों में सार्थक शब्दों की बुनाई और निरर्थक शब्दों की खरपतवार काटते हुए चलने वाले वे खाँटी लघुकथाकार थे। लघुकथाओं का सृजन करना और लघुकथाओं की समीक्षा लिखना इन दोनों बातों में रवि प्रवीण थे। समीक्षा की चुनौतीपूर्ण डगर से अपनी लघुकथाओं की रचना-प्रक्रिया को संपादित करना और अपनी ही लिखीं लघुकथाओं की रचनात्मक पद्धति के आश्रय से लघुकथा के समीक्षा बिंदु की खोजबीन करते चलना- इस ढँग के दो महत्त्वपूर्ण समानांतर आयाम उनको गंभीर लघुकथाकार और लघुकथा का समीक्षक बनाने में मददगार सिद्ध हुए। रवि जानते और समझते थे कि लघुकथा में विचार पक्ष की प्रबलता होनी चाहिए। वे लघुकथा के आकार पर दो टप्पी बातें किया करते थे, उनके अनुसार “आगत अंतर्वस्तु को लघुकथा की-फ़्रेम में सही मढ़ने में भाषागत अभिव्यंजना के बूते जो विचार ख़र्च होते हैं, उन्हीं विचारों का अर्थवान समुच्चय अर्थवान संप्रेषण ही लघुकथा का आकार तय करता है।’’

एक सफल लघुकथाकार के अर्थ में रवि प्रभाकर के व्यक्तित्त्व को निरूपित करने में उनकी लिखी लघुकथाओं में झाँककर उनके लघुकथा विषयक ‘कृतित्व की पड़ताल करना होगी? क्योंकि माना जाता रहा है कि ‘कृतित्व ही व्यक्तित्त्व की कसौटी है।’ रवि की लघुकथाएँ क्या हैं? कैसी हैं? क्यों है और कहाँ तक हैं। ऐसे सवालों के चतुर्दिंक कोणेां को नापकर ही उनकी लघुकथा की पड़ताल की जा सकती है।

लघुकथाओं में वैचारिक तौर पर गहन अर्थ पिरोने वाले रवि की छोटे आकार की लघुकथाओं पर पहले विचार कर लिया जाए, ताकि इसी से होकर उनकी लंबी लघुकथाओं की राह का जायज़ा लेने में सुगमता होगी। उनकी छोटे आकार की लघुकथाओं में ‘अंधे अंधा ठेलिया’ में दृष्टव्य है कि जाति-पाँति के सवाल मनुष्यों तक सीमित है। हलाल करने में जातिगत सवाल नहीं उठाया जाता और यह भी देखा नहीं जाता कि जानवर किस जाति के बाड़े का है। लघुकथा ‘अभागे’ में बाल श्रमिकों के उन्मूलन का सवाल, अंततः सवाल ही बना रहने दिया जाता है। लघुकथा ‘अर्ज़ी’ में वैधव्यतुषारावृता की पेंशन विषयक अर्ज़ी की टेबल-टू-टेबल होती छीछालेदर दर्शायी गई हैं। लघुकथा ‘आज़ादी’ के दीवाने में दर्शाया गया है कि ‘मुहाजिर’ होने का सवाल पक्षियेां की अदालत से भी वाबस्ता है। पिंजरे का ग़ुलाम पंछी पिंजरे में ही सुरक्षित है, आज़ादी का स्वाद चखने में उसे आत्म बलिदान की क़ीमत चुकानी होगी। लघुकथा ‘कर्मजली’ में नारी चरित्र की विडंबना का परीक्षण समाज की बाणशय्या पर हवस के भेड़ियों द्वारा कराया गया है। प्रतीकात्मक लघुकथा ‘कौआ’ में बतलाया गया है कि वैचारिक जुगत के साम्य से व्यक्तित्त्व में कृत्रिम परिवर्तन पैदाकर अतृप्त कौआ हँस की चाल चलते हुए अपनी जिजीविषा का सवाल हल करता है। लघुकथा ‘गर्भाधान’ परिजनों की भौतिक माँग-पूर्ति के मध्य भटकते अर्थशास्त्र की सृजनकार के अंतस में संरचना का बीजारोपण करता मिलता है।

लघुकथा ‘घर’ में भिखारी का घर फ़ुटपाथ है। मगर जिनके घर है उन घरों की नौजवान पीढ़ी घर का आराम छोड़ देर रात तक फ़ुटपाथ पर समय बीता रही हैं। इस विसंगति का नापतौल बड़ी ईमानदारी के साथ लघुकथा में किया गया है। लघुकथा ‘चट्टे-बट्टे’ में भ्रष्टाचार के समाजवाद का कलेवर चुना गया है और निर्माणाधीन ‘पुल’ में लागत राशि का आनुपातिक आवंटन राजनीतिक समर्थन जुटाने में भ्रष्टाचारियों के बीच करना बताया गया है। लघुकथा ‘तरकीब’ में गाँव के मजदूरेां का पलायन करने से रोकने में उनको निरक्षर बनाए रखने की वैचारिक युक्ति का अभिलेखन है। लघुकथा ‘दंश’ में दुराचारियों की लिप्सा में भभकी वासना की जलती आग की लपटों से सुकुमारियों के चरित्र को बचाने का उपक्रम रचा गया है। लघुकथा ‘दीवारें’ जातिगत शुद्धि से बड़ी आत्मशुद्धि का विवेचन प्रस्तुत करती है। लघुकथा ‘पहचान’ में धर का जोगी जोगड़ा का मुहावरा हल किया गया है।

सृजना की छोटी-सी ज़मीन पर न तो रवि ने बिहारी के दोहों-सा खेल खेला है, न सरोजिनी प्रीतम की तरह क्षणिकाओं के बाँध बाँधे हंै। प्रत्युत सृजना की छोटी ज़मीन पर ऐसी अर्थसंपन्न लघुकथाओं का रोपण किया है जो गमले में खिले बोनसाई के रूप में कथ्यानुरूप वटवृक्ष का भान कराती है। मैं तो कहुंगा कि रवि प्रभाकर छोटी लघुकथा रचने में बड़ा महारत रखते थे।

रवि प्रभाकर की अधिकांश लघुकथाएँ प्रयोगधर्मी और विचारधर्मी होकर लघुकथा के नए सृजनकारों को दिशा बोध कराने वाली अप्रतिम, अनुपम और बेजोड़ लघुकथाएँ हैं। जिस प्रकार छोटे आकार की लघुकथाओं का कुशल ताना-बाना कथ्यानुरूप अर्थगत संपदा को लेकर रवि प्रभाकर बुनने में कामयाब हुए हैं उसी प्रकार उनकी बड़े आकार की लघुकथाएँ उनकी सृजनात्मक चेतना के आधार पर विराट् स्वरूप में भी अर्थगत सूक्ष्मता जड़ने वाले किसी कुशल मनिहार की मानिन्द कलात्मकता के साथ लघुकथाओं में निहित अंतर्वस्तु के महत्त्व को बढ़ा देती है। उनके बड़े आकार की लघुकथाओं में गहन कहन के साथ विचारों की चरणबद्धता, संप्रेषण की मुखरता, अजब-ग़ज़ब की प्रवहमानता इत्यादि के सृजनात्मक सौष्ठव साथ लेकर दिखाई पड़ती है। उनकी बड़े आकार की लघुकथाओं में अवगाहन करने पर यह बात स्वमेव सामने आती है कि उनकी ऐसी लघुकथाओं में लचरपन, उबाऊपन, वैचारिक पलायन, जैसे आक्षेपों की कहीं कोई गुंजाइश नहीं हैं।

रवि की बड़ी लघुकथाओं में सर्वप्रथम ‘अंधअंधमनुसरित’ है जो अंधों के शहर में आईने बेचने वालों के अन्धत्व को ही आईना दिखाते हुए उनका व्यंग्यात्मक रोशनी से शुद्धिकर्म करने का जैसे को तैसा वाला व्यावहारिक रूप दर्शाती है। पौराणिक कथाओं में आधुनिक समय का युगबोध डालकर लोकमान्यताओं को शिरोधार्य करते हुए रवि प्रभाकर की दो लघुकथाएँ ‘अभियुक्त’ और ‘कठघरे’ किताब की नहीं हिसाब की बात करती है। दोनेां ही लघुकथाओं के केंद्र में मर्यादा पुरुषोत्तमराम की भार्या सीता के निश्कलंक चरित्र को आधार बनाया गया है। लघुकथा ‘अभियुक्त’ में ‘नारी असिमता का ज्वलंत सवाल उठाकर पौराणिक कथ्य के माध्यम से दृष्टिपात किया गया है कि सीता की अग्निपरीक्षा के पीछे सामाजिक दबाव का उल्लेख करते हुए धर्म शास्त्रों को विवेचित करने वाले मान्य एवं यशस्वी रचनाकार धर्मराज यमराज के दंड विधान से वंचित नहीं रह पाए हैं। लघुकथा ‘कठघरे’ में निष्पाप, निरीह और निष्काम रूप से पतिव्रत धर्म का पालन करने वाली माँ सीता की अग्निपरीक्षा के सवाल पर लोकक्रोध को धराशाई करते हुए स्वयं अग्निदेवता श्री राम से दूर रहकर जप, तप और साधना के आश्रय से अपने चरित्र को निष्कलंक बनाए रखने वाली तमाम अकाट्य दलीलों को वर्णित करते हुए सती सीता को अग्निपरीक्षा लेने हेतु अपनी ओर से स्पष्ट इनकार कर देते हैं। लोककोप ही हर बार धर्मकोप अथवा किसी निरपराध के लिए राजकोप बने आवश्यक तो नहीं।

लघुकथा ‘करगा’ में चुनाव के मौसम में टी.वी. के विभिन्न चैनलों पर बजरिए बहस एवं मैदानी साक्षात्कारेां का सिलसिला राजनीति को गर्माने और अपने-अपने चैनलों की टीआरपी बढ़ाने और प्रायोजितों की जेबे खाली कराने के अस्थायी कार्यक्रमों की धूम पर व्यंग्यात्मक प्रकाश डाला गया है।

लघुकथा ‘आज़ादी’ में दृष्टव्य है कि जिन लोगों ने आज़ादी को पाने में प्राण-पण एक किए हैं तथा परतन्त्रता के अँधेरे से मुक्त होकर स्वविकास की धारणाएँ मन में जगाई थीं। ऐसे स्वप्नदर्शियों को निहित स्वार्थ के वशीभूत कतिपय घर के ही बाहुबलियों ने स्वतन्त्रता का स्वाद चखने ही नहीं दिया। ‘अँग्रेज़ी हुकूमत चली गईं उसके स्थान पर देशी हुकूमत सिंहासनारूढ़ हो गई।

लघुकथा ‘कुकनूस’ संज्ञारूप में प्रस्तुत लघुकथा संग्रह का नाम और पहचान तो बनी ही है साथ में लघुकथा की अंतर्वस्तु को संयोजित करने में ‘कुकनूस’ शीर्षक लघुकथा के कथ्य को अभिप्रमाणित करने में भी सार्थक प्रतीत होता है। ‘कुकनूस’ एक ऐसा काल्पनिक पक्षी है जो गाता है तो उसके गले से आग निगलती है और उसी आग में जलकर वह भस्म हो जाता है। रवि प्रभाकर ने ‘कुकनूस’ लघुकथा में विलक्षण सोच के परिणामस्वरूप कुकनूस के समानांतर मानवेतर कबूतरों की उपस्थिति को उनकी चारित्रिक विशेषताओं के साथ रेखांकित किया है। गुटर-गूँ का राग अलापने वाले कबूतरों के नीर-क्षीर विवेक का दोहन कर प्रस्तुत ‘कुकनूस’ लघुकथा का सुडौलपन (सौष्ठव) सृजित किया गया है। लघुकथा ‘ख़ामोश चीख़ें’ में अतीत में हुए प्यार के उड़ चुके तोते के पंखेां की फड़फड़ाहट के स्वरेां में प्रेमी से विलग हुई प्रेयसी की तन्हाई का नियति भाव अभिव्यक्त हुआ मिलता है। लघुकथा ‘डूबा तारा’ में ब्याह की उम्र लाँघ रही लड़की की शादी की चिंता को गहराया गया है।

लघुकथा में सबसे बड़ी शक्ति होती है उसमें निहित वाक्य संयोजन। रवि प्रभाकर की लघुकथाओं में वाक्य की कसावट, वाक्य के उद्देश्य एवं विधेय पक्ष के उचित निर्वहन के साथ दिखाई देती है। इसके अतिरिक्त भाषाई संयोजन का कमाल रवि प्रभाकर को ख़ूब आता है। यही कारण है कि उनकी लघुकथाओं में शिल्प की आमद युक्तियुक्त ढंग से होती रही है। लघुकथा में अंर्तवस्तु की दृष्टि से यथार्थ को उद्घाटित करते चलना रवि प्रभाकर के समर्थ भाषा ज्ञान का परिचायक है। उनकी प्रयोगधर्मी लघुकथाएँ विचारपरक होकर अनुकरणीय है। निःसंदेह रवि प्रभाकर अपनी लघुकथाओं के तारतम्य से लघुकथा विधा में एक नई पीढ़ी का प्रतिनिधित्त्व करते जान पड़ते हैं।

अंत में…अलविदा रवि…
अल्प समय में रवि अपनी जीवन यात्रा तय कर हम सबसे दूर परलोक में चले गए हैं। उनका चले जाना परिवार, समाज और विशेषकर लघुकथा जगत् में एक बड़ा रिक्त स्थान छोड़ गया है। रवि का सहृदय व्यक्तित्त्व, आत्मीयता से परिपूर्ण व्यवहार, लघुकथा विषयक रचनात्मक दृष्टि, उनका संपादकत्व पक्ष, एक-एक कर अंततः समूह रूप में याद आते हैं। लघुकथा संसार को रवि से बड़ी उम्मीदें थीं। लघुकथा में रवि प्राण-पण से जुड़े थे। लघुकथा विषयक अनंत संभावनाओं का जज़्बा उनमें जीवंत था। सच में रवि स्वयं लघुकथा के ‘कुकनूस’ थे व लघुकथाओं का सृजन राग गाते हुए उसकी आग में विलीन हो गए। अपनी इहलीला से युक्त हो गए। लघुकथा के इस अप्रतिम लघुकथाकार को मेरा शत शत नमन।
-0-डा. पुरुषोत्तम दुबे, ‘शशीपुष्प’ ,74-जे/ए, स्कीम नं. 71, इंदौर-452009 (म.प्र.)

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