
डॉ पुरुषोत्तम दुबे हिन्दी लघुकथा के जाने माने समीक्षक है । उनका समीक्षा कार्य तब सामने आया जब दिशा प्रकाशन के मधुदीप ने पड़ाव और पड़ताल के एक के बाद एक कुल तैंतीस खंड प्रकाशित किए, इनमें बतौर समीक्षक डॉ दुबे का योगदान स्मरणीय है।
इनकी पुस्तक ‘लघुकथा : रचना पद्धति और समीक्षा सिद्धांत’ में समीक्षा संबंधी कई आलेख हैं जिन्हें हम चार भागों में विभाजित कर सकते हैं। पहला सैद्धांतिक आलेख, दूसरा पुस्तकों की समीक्षा, तीसरा अन्य आलेख और चौथा क्षेत्रीय पड़ताल। सैद्धांतिक आलेख इस पुस्तक का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है इसके अंतर्गत लघुकथा और संरचनात्मकता, लघुकथा की रचनात्मक उत्तमता पर विचार, हिन्दी लघुकथा में शिल्प प्रयोग का तात्विक अभिव्यंजन, लघुकथा में सही शब्द की खोज, प्रयोगधर्मी लघुकथा लेखन का व्याकरण और अति महत्वपूर्ण लघुकथा : रचना पद्धति और समीक्षा सिद्धांत है। ये लेख लघुकथा समीक्षा की बुनियाद रखते प्रतीत होते हैं। लघुकथा लेखन में रुचि रखने वाले लेखकों को इन्हें अवश्य पढ़ना चाहिए।
कुछ लघुकथा संग्रहों की समीक्षाएँ भी इस पुस्तक में शामिल की गई है। प्रताप सिंह सोढ़ी के संग्रह ‘मेरी प्रिय लघुकथाएँ’, अंतरा करवड़े और वसुधा गाड़गिल की ‘धारा’, पंजाबी लेखक हरभजन सिंह खेमकरणी की ‘जागती आँखों का सपना’, ओजेंद्र तिवारी की ‘काश!’, पारस दासोत की ‘एक और अभिमन्यु’, चैतन्य त्रिवेदी की ‘कथा की अफवाह’, कनक हरलालका की ‘कितना कुछ अनकहा’ और योगराज प्रभाकर की ‘फक्कड़ उवाच’ की समीक्षाएँ पढ़ते हुए समीक्षा करने का सलीका सीख सकते हैं।
कुछ रचनाकारों के लेखन का मूल्यांकन भी किया गया है जैसे शील कौशिक, अलका पाण्डेय, इसके साथ ही सुकेश साहनी के संपादकीय कौशल पर भी डॉ दुबे ने कलम चलाई है। इनके अतिरिक्त कुछ और आलेख भी सम्मिलित किये गए हैं जैसे पुरुष लघुकथाकारों की लघुकथाओं में स्त्री विमर्श, उर्फ.. हम हाले दिल सुनाएँगे’ जिसमें लघुकथा के पाठक न होने पर चिंता जताई है।
पूरे मध्य प्रदेश और उसके विशेष शहरों का लघुकथा के विकास में योगदान की चर्चा की गई है। कुछ लेखों के शीर्षक – मध्य प्रदेश में आकाशवृत्त के समानांतर लघुकथा का क्षैतिज और उद्धर्वत विकास, तथा इंदौर, उज्जैन, भोपाल, जबलपुर, ग्वालियर, गंज बासौदा के योगदान की अलग-अलग आलेखों में चर्चा की गई है। यह उल्लेखनीय और अनूठा प्रयोग है जिसकी जानकारी मध्य प्रदेश के लेखकों को अवश्य होनी चाहिए। बरेली के ‘आयोजन’ की समीक्षा रपट ‘लघुकथा विमर्श का दस्तावेजीकरण’ शीर्षक से लिखी गई है। क्षितिज संस्था इंदौर के लघुकथाकारों की भाषा, शिल्प, शैली और सौन्दर्य बोध की पड़ताल भी की गई है।
समीक्षा पुस्तक की समीक्षा जरा कठिनतर कार्य है और यह विस्तार की मांग करता है जो यहाँ संभव नहीं है, अतः परिचयात्मक टिप्पणी ही यहाँ की गई है। चूँकि सैद्धांतिक खंड महत्त्वपूर्ण भाग है इसलिए इन सैद्धांतिक लेखों पर विशेष टिप्पणी की गई है। ‘लघुकथा और संरचनात्मकता’ में फिर एक बार उसके आकार प्रकार की बात की गई है। लघुकथा की कसावट पर विशेष बल दिया गया है। पंच लाइन को भी महत्वपूर्ण माना गया है।
‘लघुकथा की रचनात्मक उत्तमता पर विचार’ में लघुकथा की रचना में समापन बिन्दु और आरम्भ बिन्दु के महत्व की चर्चा की गई है।
‘हिन्दी लघुकथा में शिल्प प्रयोग का तात्विक अभिव्यंजन’ आलेख में शिल्प की तीन बातों की चर्चा है-कौशल से तात्पर्य लेखकीय कौशल से है। प्रणाली में वे शब्द चयन और कसावट की बात करते हैं। अभिव्यक्ति के ढंग यानी शैली की चर्चा के साथ शिल्प के विभिन्न प्रकारों जैसे सपाट, पेंचदार, बिम्बात्मक, विकासात्मक, प्रयोगात्मक, आंचलिक, गवेषणात्मक, उत्प्रेरक, ध्वन्यात्मक, प्रतीकात्मक, परिवेशजन्य, पौराणिक, सामयिक आदि शिल्प के बारे में सार्थक चर्चा की गई है।
‘लघुकथा में सही शब्द की खोज’ आलेख में लघुकथा रचना के चार तत्व कल्पना, संवेदना, विचार और भावना को अंगीकृत किया गया है। बिम्ब लघुकथा में अनावश्यक विस्तार पर लगाम लगाता है। डॉ दुबे ने कई उदाहरण देकर इसे समझाने की कोशिश की है।
‘प्रयोगधर्मी लघुकथा लेखन का व्याकरण’ नामक लेख में ‘आधुनिक मनुष्य को अज्ञानता और तर्कहीनता से मुक्त करनेवाली लघुकथा ही प्रयोगधर्मी लघुकथा कहलाएगी, जो नई चेतना के साथ नई चुनौतियों को समाहित करते हुए प्रगतिशील विचारों की बुनियाद रखने में भी समर्थ सिद्ध होगी।’ कथ्य के मांग के अनुसार प्रचलित विभिन्न शैलियों में लघुकथा लिखी जा सकती है और नई शैलियों को भी आविष्कृत किया जा सकता है।
‘लघुकथा : रचना पद्धति और समीक्षा सिद्धांत’ अति महत्वपूर्ण और विस्तार लिया हुआ आलेख है यही कारण है कि इस पुस्तक को यही शीर्षक दिया गया है। समीक्षक के आचरण पर निम्न बिन्दुओं का उल्लेख है- समीक्षक अभिमानी नहीं होना चाहिए, समीक्षक का आलोच्य रचयिता के उद्देश्यों और प्रयोजनों को दृष्टि में रखना चाहिए। समीक्षक में भाव-प्रधान बुद्धि का होना जरूरी है, नियमानुसार रची गई लघुकथा को मान्यता देनी चाहिए, रचनाकार को दृष्टि में रखकर उसकी लघुकथा की आलोचना नहीं करनी चाहिए, झूठी नवीनता से प्रभावित होकर रचना के पक्ष में अभिमत नहीं देना चाहिए और आलोचना संतुलित होनी चाहिए। आलोचना निंदा या स्तुति नहीं है इसे ध्यान में रखा जाना चाहिए। समीक्षा एक तरह से सृजन ही है, आलोचना का प्रधान कार्य अर्थ निर्णय, आलोच्य लघुकथा में समीक्षा के प्रतिमानों की खोज आदि विषयों की गहन चर्चा की गई है।
कुल मिलाकर यह पुस्तक समीक्षक और लेखक के लिए अपरिहार्य है। लघुकथा समीक्षा के विकास में इसका महत्त्वपूर्ण योगदान रहेगा।
-0-1-लघुकथा : रचना पद्धति और समीक्षा सिद्धांत- पुरुषोत्तम दुबे, प्रकाशक : राइजिंग स्टार्स,गली नंबर 15, मौजपुर,दिल्ली-110053, संस्करण-2022, मूल्य-450/-,पृष्ठ-160