सितम्बर 2026

दस्तावेज़लघुकथा में विषयगत नवबोध     Posted: September 1, 2026

नवबोध बदलती हुई सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और मानवीय परिस्थितियों से जन्मी वह नई दृष्टि है, जो स्थापित मान्यताओं और जड़ हो चुके मूल्यों की पुनःजाँच करते हुए किसी घटना, संबंध, मूल्य, व्यवहार या व्यवस्था के अब तक अनदेखे पक्ष को सामने लाती है और पात्र, पाठक अथवा दोनों की समझ बदल देती है। यह केवल नई जानकारी मिलने का नाम नहीं, बल्कि पहले से बनी धारणा के टूटने, बदलने या अधिक व्यापक होने की प्रक्रिया है। लघुकथा में नवबोध तब उत्पन्न होता है, जब कोई सामान्य-सी घटना अपने भीतर छिपे सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, मनोवैज्ञानिक, नैतिक या मानवीय अंतर्विरोध को इस तरह उजागर करती है कि यथार्थ का कोई नया अर्थ खुलने लगता है। केवल नया विषय चुन लेने से नवबोध पैदा नहीं होता। मोबाइल, सोशल मीडिया, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, बाज़ार, पर्यावरण या राजनीति का उल्लेख विषयगत नवीनता तो हो सकता है, लेकिन नवबोध तभी बनेगा, जब इन संदर्भों के भीतर मनुष्य, संबंधों, मूल्यों या व्यवस्था से जुड़ा कोई ऐसा सत्य सामने आए, जो हमारी बनी-बनाई समझ को चुनौती दे। यह बोध कभी पात्र तक पहुँचकर उसके व्यवहार या निर्णय को बदलता है, कभी पात्र अपनी सीमित समझ में रह जाता है और पाठक छिपे सत्य को पहचान लेता है, तो कभी दोनों एक साथ नए अर्थ तक पहुँचते हैं। नवबोध लघुकथा पर बाहर से थोपा गया संदेश नहीं होता। वह कथा की घटना, पात्रों के व्यवहार और उनके बीच मौजूद अंतर्विरोध से स्वाभाविक रूप में उपजता है तथा नई संवेदना, विचार और उपयुक्त शिल्प के माध्यम से व्यक्त होता है। इसीलिए नवबोध लघुकथा का केवल विषय नहीं, उसकी अंतर्दृष्टि और प्रभाव से जुड़ा गुण है। हिंदी लघुकथा के आलोचनात्मक विमर्श में इसे एक स्वतंत्र और व्यवस्थित विश्लेषणात्मक अवधारणा के रूप में प्रस्तावित करना नया प्रयास है। यह अवधारणा लघुकथा को उसके विषय भर से नहीं, बल्कि उससे उपजने वाली नई समझ और दृष्टि-परिवर्तन के आधार पर परखने की कसौटी सामने रखती है।

नवबोध का स्वरूप एकरेखीय नहीं होता। जीवन लगातार बदल रहा है। राजनीति हो या धर्म, बाज़ार हो या तकनीक, पर्यावरण हो या हमारे आपसी रिश्ते, हर बदलाव अपने साथ कुछ नए सवाल भी लेकर आता है। जब लघुकथा इन बदलावों के नीचे दबी किसी उलझन, विडंबना या नए सच पर उँगली रखती है, तभी नवबोध का कोई रूप हमारे सामने खुलता है। आगे जिन विषयगत नवबोधों की उदाहरण सहित चर्चा की जा रही है, उन्हें कोई आख़िरी सूची या पत्थर की लकीर न माना जाए। यह बँटवारा केवल बात को साफ़-साफ़ समझने के लिए किया गया है। कई बार एक ही लघुकथा में सामाजिक, मनोवैज्ञानिक, आर्थिक और दूसरे कई नवबोध एक साथ मौजूद होते हैं। तब यह देखना पड़ता है कि लघुकथा की सबसे गहरी चोट कहाँ पड़ती है और वह पाठक को अपनी किस पुरानी धारणा पर दुबारा सोचने के लिए विवश करती है। यहाँ दिए गए उदाहरण किसी नवबोध की सरहद नहीं बाँधते, वे केवल यह समझने का रास्ता खोलते हैं कि नवबोध जन्म कैसे लेता है और पाठक की दृष्टि में क्या बदलता है।

1. राजनीतिक नवबोध

राजनीतिक नवबोध वह चेतना है जो सत्ता, लोकतंत्र, नागरिकता, राष्ट्रवाद, चुनाव, प्रशासन और सार्वजनिक संस्थाओं के घोषित चरित्र तथा उनके वास्तविक आचरण के बीच की दरार खोलती है। इसमें राजनीति केवल नेता या चुनाव तक सीमित नहीं रहती; आँकड़े, भाषा, जनकल्याण और निष्पक्षता के दावे भी सत्ता की कार्यविधि के रूप में पढ़े जाते हैं। यह बोध देखता है कि विकास की शब्दावली किसके हित छिपाती है, किसी नीति का बोझ कौन उठाता है और नागरिक की चुप्पी सत्ता को बल देती है या प्रतिरोध को जन्म देती है।

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ की लघुकथा एजेंडा1 किसी बड़े राजनीतिक मंच पर नहीं जाती। वह रोज़मर्रा के एक छोटे-से प्रसंग में सत्ता का चेहरा पकड़ती है। सरकार और संस्थाएँ क्या कहती हैं, इससे अधिक ज़रूरी यह है कि वे आदमी के साथ करती क्या हैं। सतीशराज पुष्करणा बोफोर्स काण्ड2 में इसी राजनीति को पात्रों की ज़रूरत, डर और फ़ैसलों तक ले आते हैं। दूर घटता दिखाई देने वाला सत्ता का खेल चुपचाप आम आदमी के घर में घुसता है और उसकी ज़िंदगी की दिशा बदल देता है। अशोक भाटिया की अकर्मक क्रिया3 में राय साहब हैंडपंप लगवाने और रुकवाने, दोनों अर्जियों पर दस्तख़त कर देते हैं। दोनों गुट उनकी मुस्कान लेकर लौट जाते हैं, लेकिन गली के हिस्से में पानी नहीं, बरसों का झगड़ा आता है। यहीं शीर्षक अपना पूरा अर्थ खोलता है। नेता सक्रिय दिखाई देता है, पर उसके किए से कुछ होता नहीं। योगराज प्रभाकर की काले पन्ने काले अक्षर4 में तोता-मैना का रूपक सत्ता और बाज़ार की मिलीभगत को बेनक़ाब करता है। काले फ़रमान, चमड़ी उधेड़ने और माँ को नीलाम करने के संकेत भले तीखे हों, पर उनका निशाना साफ़ है। सुधार के नाम पर निकला आदेश जब किसान की ज़मीन और रोज़ी पर चढ़ बैठता है, तब सरकारी भाषा का असली मतलब समझ में आता है। अशोक लव की वृक्ष ऊँचे रहेंगे5 का राजा पेड़ों और इमारतों की ऊँचाई तक सहन नहीं कर पाता। वह हर चीज़ को अपने क़द से छोटा कर देना चाहता है और प्रशासन उसकी कुंठा को नीति मानकर लागू करने लगता है। अंत में वृक्ष फिर ऊँचे हो जाते हैं। बौना रह जाता है राजा का क़द और वह व्यवस्था, जिसने उसकी सनक के आगे घुटने टेक दिए थे।

2. सामाजिक नवबोध

सामाजिक नवबोध जाति, वर्ग, लिंग, वृद्धावस्था, परिवार, श्रम, प्रतिष्ठा और सामुदायिक व्यवहार के भीतर जमी ऐसी असमानताओं को पहचानता है जिन्हें समाज सामान्य या स्वाभाविक मान चुका है। इसका काम केवल सामाजिक बुराई गिनाना नहीं, बल्कि यह दिखाना है कि बदलती शिक्षा, अर्थव्यवस्था और जीवनशैली के बाद भी पुराने भेद किस नए रूप में लौट रहे हैं। यह बोध समानता की घोषणा और रोज़मर्रा के व्यवहार के अंतर पर विशेष ध्यान देता है, क्योंकि पद अथवा आधुनिक वेश बदल जाने से चेतना अनिवार्य रूप से नहीं बदलती।

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ की लघुकथा ऊँचाई6 हमारे सामने एक असुविधाजनक सवाल रखती है कि आदमी सचमुच ऊँचा कब होता है। जाति, वर्ग और प्रतिष्ठा की असली गाँठ भाषणों में नहीं, रोज़ के व्यवहार में खुलती है। विक्रम सोनी की बनैले सुअर7 आधुनिक दिखाई देते समाज के नीचे दबे पुराने भेद को बाहर खींच लाती है। पहनावा बदल गया, भाषा सँवर गई, पर डर और फ़ैसलों के भीतर बैठी असमानता अभी वहीं है। अखिलेश शर्मा की कूड़ा8 और भी सीधी चोट करती है। कथावाचक अपने पुराने सहपाठी संकल्प को घर-घर कूड़ा उठाते देखकर विचलित है, क्योंकि संकल्प उच्च जाति का है। सदियों से यही काम करते आए लोगों को देखकर उसके भीतर ऐसी टीस कभी क्यों नहीं उठी? प्रश्न कूड़ा उठाने वाले पर नहीं, देखने वाले की संवेदना पर आ टिकता है। सभ्यता का दावा करने वाला मन अपने भीतर जमा मैल से पहली बार रू-ब-रू होता है। रवि प्रभाकर की सिसकियाँ9 बताती है कि सामाजिक सीढ़ियाँ चढ़ लेना और बराबरी को जीना दो अलग बातें हैं। ऊँचे पद पर पहुँचे दलित परिवार की रसोई से उसी समुदाय की कामगार स्त्री पानी लेती है तो अपमानित की जाती है। साझा अपमान का इतिहास भी नई हैसियत के दरवाज़े पर आकर छूट जाता है। पद ऊँचा हुआ, देहरी का भेद नहीं गया।

3. धार्मिक नवबोध

धार्मिक नवबोध आस्था को नकारने के बजाय आस्था, कर्मकांड, कट्टरता, धर्म-व्यवसाय, पाखंड और मनुष्यता के परस्पर संबंधों की नई जाँच करता है। वह पूछता है कि धर्म मनुष्य को जोड़ रहा है या सत्ता, भय और पहचान का औज़ार बन रहा है। इस बोध में पूजा और नैतिक आचरण के बीच का अंतर विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण होता है। लघुकथा जब अनुष्ठान के सामने व्यवहार और सांप्रदायिक पहचान के सामने साझे जीवन को रखती है, तब धर्म की विश्वसनीयता मनुष्यता की कसौटी पर परखी जाती है।

अशोक भाटिया की लघुकथा क्या मथुराक्या द्वारका?’10 तीर्थ और धार्मिकता के बीच बची दूरी को सामने रखती है। मथुरा या द्वारका पहुँच जाना आसान है, अपने व्यवहार में आस्था बचाए रखना कठिन। पात्रों की कथनी और करनी का फ़र्क़ ही बता देता है कि पूजा कहाँ ख़त्म होती है और मनुष्यता कहाँ से शुरू होती है। युगल की नामान्तरण11 नाम और धर्म बदलने की बाहरी प्रक्रिया से आगे जाती है। कोई घोषणा मनुष्य का नैतिक चरित्र रातोंरात नहीं बदलती। भीतर का डर, स्वार्थ और संबंध वही रहें तो नया नाम केवल नई पट्टी है, नया मनुष्य नहीं। योगराज प्रभाकर की अवशेष12 सांप्रदायिक उत्तेजना के सामने साझा घर, पूर्वजों के संबंध और पुरानी स्मृतियाँ खड़ी कर देती है। भीड़ वर्तमान को आग देती है, मगर मिली-जुली विरासत उस आग के बीच गवाही बनकर बची रहती है। रिश्तों के पुराने निशान बोलने लगें तो अभी-अभी उठाई गई मज़हबी दीवार कुछ कमज़ोर पड़ती है। भगीरथ की धार्मिक होने की घोषणा13 इस पाखंड को दंगे की ज़मीन पर पकड़ती है। दुकानें जल रही हैं, लोग मारे जा रहे हैं, पुलिस जा चुकी है और तमाशबीन घरों में छिपे हैं। ऐसी घड़ी में यदि धार्मिक पहचान दूसरे संप्रदाय की लाशों से साबित होती है, तो वह आस्था नहीं, संगठित वहशीपन है। धर्म की परीक्षा घोषणा में नहीं, संकट में बचाई गई मनुष्यता में होती है। प्रताप सिंह सोढ़ी की अहसास14 में सांप्रदायिक दंगे के बीच एक दरवेश घनश्याम पंडित को शरण देकर बचाता है। जिस धार्मिक पहचान को वह संदेह से देखता था, वही संकट में सुरक्षा और मनुष्यता का चेहरा बन जाती है। उसके साथ योगेश की समझ भी बदलती है।

4. साहित्यिक नवबोध

साहित्यिक नवबोध लेखक, पाठक, संपादक, प्रकाशक, आलोचक, पुरस्कार, साहित्यिक संस्थाओं और रचनात्मक श्रम के बदलते संबंधों को पहचानता है। यह साहित्य को पवित्र मानकर उसकी कमजोरियाँ नहीं छिपाता, बल्कि नाम, प्रतिष्ठा, बाज़ार और सत्ता के बीच रचना की नैतिकता परखता है। रचनाकार का श्रेय छीनना, पुरस्कार को प्रभाव का साधन बनाना या प्रतिभा की जगह निजी स्वार्थ रखना साहित्यिक संस्कृति के संकट हैं। यह रचना की नैतिक जवाबदेही और कलाकार की अस्मिता, दोनों को कसौटी पर रखता है।

अशोक भाटिया की लघुकथा लघुकथा अनन्ता15 साहित्य की उस जगह पर हाथ रखती है जहाँ रचना, प्रतिष्ठा और लेखक की ईमानदारी आपस में उलझते हैं। शब्द लिख देना एक बात है, उनके पीछे अपनी रीढ़ बचाए रखना दूसरी। सतीशराज पुष्करणा की पुरस्कार16 सम्मान की चमक के पीछे चल रहे प्रभाव, स्वार्थ और जोड़-तोड़ को सामने लाती है। पुरस्कार तब उपलब्धि से अधिक उस व्यवस्था की जाँच बन जाता है, जो तय करती है कि किसे दिखाई देना है और किसे नहीं। योगराज प्रभाकर की अनाम सैनिक17 में युवा रचनाकार मकबूल अपने आदर्श गीतकार से मार्गदर्शन चाहता है, पर सामने रचना बेचकर नाम छोड़ देने का प्रस्ताव रख दिया जाता है। अभाव उसके सामने है, फिर भी वह अपनी पहचान मिटाने से इनकार करता है। लेखक का नाम केवल प्रसिद्धि नहीं, अपने लिखे की ज़िम्मेदारी और उसकी आख़िरी जमा-पूँजी भी है। जयप्रकाश मानस की मंच के पीछे का सच18 साहित्य के सजे हुए चेहरे से पर्दा हटाती है। मंच पर स्त्री-सशक्तीकरण की बातें हैं, पीछे लेखिका की प्रतिभा से अधिक उसकी देह का मोल लगाया जा रहा है। पुरस्कार, समीक्षा और संपादकीय सत्ता की सारी चमक इसी एक विरोध के सामने फीकी पड़ जाती है।

5. मनोवैज्ञानिक नवबोध

मनोवैज्ञानिक नवबोध मनुष्य के भीतर चल रहे आत्मछल, अपराध-बोध, भय, अकेलापन, दबी स्मृति, मानसिक दबाव और व्यक्तित्व के विखंडन को खोलता है। इसमें बाहरी घटना से अधिक महत्त्व उस अर्थ का होता है जो पात्र अपने भीतर बनाता है। सामान्य शब्द, वस्तु या व्यवहार अचानक किसी पुराने आघात का दरवाज़ा भी बन सकता है। यह बोध असंगत दिखाई देने वाली प्रतिक्रिया के पीछे दबे अनुभव को पढ़ता है और मनुष्य को केवल उसके बाहरी व्यवहार से परखने की सीमा बताता है।

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ की लघुकथा पिघलती हुई बर्फ़19 इस सच से टकराती है कि मन टूटता है तो हमेशा शोर नहीं करता। चेहरा संभला रह सकता है, बोलचाल सामान्य बनी रह सकती है, लेकिन भीतर कोई चीज़ लगातार दरकती रहती है। पात्र बाहर से जैसा दिखाई देता है, असली हलचल उससे कहीं अलग है। अशोक भाटिया की आत्मालाप20 में आदमी अपनी ही आवाज़ से बच नहीं पाता। वह ख़ुद से बात करते-करते उस जगह पहुँच जाता है, जहाँ दबे हुए डर और अनचाहे सच उसका रास्ता रोककर खड़े हैं। विक्रम सोनी की लाठी21 सहारे और निर्भरता के बीच की महीन रेखा पकड़ती है। जिस चीज़ को व्यक्ति अपनी ताक़त मानता है, कई बार वही उसके भीतर बैठी असुरक्षा का पता दे रही होती है। रवि प्रभाकर की संत्रास22 में एक सहज-सा ‘बेटी’ संबोधन युवती को अचानक कठोर कर देता है। पहली नज़र में उसका व्यवहार बदतमीज़ी लग सकता है, लेकिन यही शब्द कभी उस आदमी ने भी कहा था जिसने उसे देह-व्यापार में धकेला था। उसके लिए ‘बेटी’ अब स्नेह का शब्द नहीं, पुरानी हिंसा की दस्तक है। वह सामने खड़े बुज़ुर्ग के अपनत्व को नहीं ठुकरा रही, अपने भीतर खुलते उस डरावने दरवाज़े को बंद करना चाहती है। तब समझ आता है कि कई बार कठोर व्यवहार असभ्यता नहीं, किसी पुराने घाव पर रखी हुई ढाल होता है।

6. दार्शनिक नवबोध

दार्शनिक नवबोध जीवन, मृत्यु, सत्य, नियति, स्वतंत्रता, समय, न्याय, अस्तित्व और मनुष्य की सार्थकता से जुड़े मूल प्रश्नों को नए प्रसंग में खोलता है। इसका उद्देश्य तैयार उत्तर देना नहीं, परिचित सत्य को अस्थिर करना है। यहाँ एक फूल, दर्पण अथवा अच्छाई-बुराई का संबंध भी मनुष्य के अस्तित्व पर बड़े प्रश्न खड़े कर सकता है। छोटा प्रसंग व्यक्ति और समष्टि, चुनाव और परिस्थिति तथा विरोधी मूल्यों के संबंध पर सोचने को विवश करता है; इसलिए प्रश्न लघुकथा के अंत के बाद भी बना रहता है।

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ की लघुकथा कालचिड़ी23 एक मामूली-सी घटना से जीवन, मृत्यु, समय और नियति के बीच की पतली रेखा सामने ले आती है। कोई तैयार उत्तर नहीं मिलता। बस यह बेचैनी रह जाती है कि जिस जीवन को हम स्थिर मानकर बैठे हैं, वह अगले ही पल हाथ से फिसल सकता है। युगल की औरत24 स्त्री की सामाजिक भूमिका से आगे उसके अपने अस्तित्व तक पहुँचती है। सवाल सीधा है कि उसे पहले से तय रिश्तों और भूमिकाओं से पहचाना जाएगा या एक स्वतंत्र मनुष्य की तरह देखा जाएगा। विक्रम सोनी की अजगर25 भय, विवशता और नियति को आसमानी विचार नहीं रहने देती। ये सब पात्रों की रोज़ की ज़रूरतों और चुनावों में उतरते हैं, जहाँ बच निकलना भी आसान नहीं और ठहर जाना भी। अवधेश तिवारी की व्यष्टि में समष्टि26 एक फूल के टूटने में पूरे उपवन की पीड़ा देखती है। एक मनुष्य की मृत्यु में हमारी मनुष्यता का अंश मरता है और मिट्टी बहती है तो पृथ्वी की देह घटती है। हम अलग-अलग खानों में रखी इकाइयाँ नहीं हैं। एक छोटी हानि की लहर भी बहुत दूर तक जाती है। रवि प्रभाकर की शेड्स ऑफ़ ब्लैक27 अच्छाई और बुराई के सुविधाजनक बँटवारे को उलझा देती है। बुराई का तर्क है कि उसके बिना अच्छाई पहचानी ही नहीं जाएगी। इससे बुराई सही नहीं हो जाती, मगर अच्छाई को अपनी जड़ अवश्य टटोलनी पड़ती है। अच्छाई कोई सुरक्षित विरासत नहीं, बार-बार चुना जाने वाला कठिन रास्ता है।

7. आर्थिक नवबोध

आर्थिक नवबोध भूख, श्रम, बाज़ार, ऋण, संपत्ति, रोज़गार और संसाधनों की असमानता को केवल ग़रीबी-अमीरी के स्थिर विरोध में नहीं देखता। वह बताता है कि आर्थिक शक्ति संबंधों, स्वास्थ्य, आवास, सम्मान और निर्णय की स्वतंत्रता को किस तरह नियंत्रित करती है। सहायता, विकास और स्वामित्व भी कई बार निर्भरता या वंचना का नया रूप बन जाते हैं। यह बोध उत्पादन और उपलब्धता की दूरी पहचानता है, जहाँ अन्न की प्रचुरता के बीच श्रमिक भूखा रह सकता है और सहायता उसके स्वाभिमान को नियंत्रित कर सकती है।

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ की लघुकथा छोटे-बड़े सपने28 बताती है कि ग़रीबी आदमी की थाली ही छोटी नहीं करती, उसके सपनों का आकार भी तय करने लगती है। भूख सामने हो तो बड़ी आकांक्षाएँ पहले रोटी की शक्ल लेती हैं। बराबरी की सारी बातें वहीं आकर कसौटी पर चढ़ जाती हैं। रवि प्रभाकर की सहारा29 मदद के भीतर छिपी क़ीमत खोलती है। मालिक कर्मचारियों पर की गई कृपा को करुणा नहीं, उन्हें आज्ञाकारी और आश्रित बनाए रखने वाला निवेश मानता है। यह सुनते ही रामचरन पौधों के सहारे निकाल देता है। गिरने का ख़तरा है, फिर भी अपने बल पर खड़ा होना ख़रीदी हुई सुरक्षा से अधिक सम्मानजनक लगता है। जयप्रकाश मानस की प्रचलन से हटकर30 भूखे मज़दूर और पेट भरे मालिक के बीच एक तीसरा रास्ता तलाशती है। पात्र न किसी के आगे झुकना चाहता है, न मालिक बनकर किसी और का श्रम निगलना। अपनी ज़मीन पर अपनी रोटी उगाना उसके लिए श्रम पर अपना हक़ वापस लेना है। विचार आकर्षक है, हालाँकि पात्र के जीवन की थोड़ी और मिट्टी इसमें जुड़ती तो यह बात विचार से बढ़कर पूरा अनुभव बन सकती थी।

8. पर्यावरणीय नवबोध

पर्यावरणीय नवबोध प्रकृति को केवल सुंदर पृष्ठभूमि या संरक्षण के नारे के रूप में नहीं देखता। वह जलवायु, जंगल, जल, पशु-पक्षी, शहरीकरण, युद्ध और उपभोग के बीच संबंध खोलता है तथा मनुष्य-केंद्रित विकास की क़ीमत पूछता है। इसमें पृथ्वी पीड़ित वस्तु नहीं, मनुष्य के अस्तित्व से जुड़ी जीवित साझेदार बनकर सामने आती है। युद्ध, सड़क, शहरी निष्क्रियता और अंधा उपभोग भी इसके दायरे में आते हैं, क्योंकि प्रकृति से हिंसक संबंध समाज की संवेदना और जीवन-व्यवस्था को भी उजाड़ता है।

सुकेश साहनी की लघुकथा प्रदूषण31 याद दिलाती है कि प्रकृति के साथ किया गया अन्याय बाहर कहीं जमा नहीं रहता। वह लौटकर हमारे पानी, हवा, खेत और शरीर में उतरता है। पेड़, जल और धरती को केवल इस्तेमाल की चीज़ मानने वाला मनुष्य अंततः अपनी ही ज़मीन काट रहा होता है। अंजना मनोज गर्ग की कलपती धरती माँ32 में लोग धरती की धड़कन को भूकंप समझते हैं, जबकि वह सड़क दुर्घटनाओं में मरे युवाओं की हूक है। जिस सड़क को विकास का निशान कहा गया, वही यदि जीवन निगल रही है तो उसकी चोट मिट्टी के भीतर भी दर्ज होगी। यहाँ पृथ्वी संसाधन नहीं, हमारे कर्मों की बेचैन साक्षी है। अमृता पांडे की वैमनस्य33 जलवायु सम्मेलनों के नारों के सामने युद्ध और हथियारों का कारोबार रख देती है। मंच पर शून्य कार्बन की घोषणा है, ज़मीन पर बम, आग और धुआँ बढ़ रहे हैं। युद्ध केवल सीमा या राजनीति का मामला नहीं। वह पृथ्वी और बच्चों की साँस पर भी हमला है। पर्यावरण की बात शांति की बात से अलग करके नहीं की जा सकती।

9. सांस्कृतिक नवबोध

सांस्कृतिक नवबोध मिथक, परंपरा, भाषा, स्मृति, लोकविश्वास, इतिहास और जीवन-मूल्यों को स्थिर विरासत न मानकर वर्तमान की दृष्टि से पुनः पढ़ता है। वह पूछता है कि संस्कृति किसकी आवाज़ बचाती है, किसे चुप करती है और बदलते समाज में पुराने प्रतीकों का नया अर्थ क्या बनता है। पुनर्पाठ इसका प्रमुख औज़ार है। इसमें परंपरा की जीवंतता उसकी मानवीयता और प्रश्न सहने की क्षमता से तय होती है; साथ ही लोकजीवन का अर्थ मिट्टी, स्मृति, देखभाल और संबंधों से जुड़ा दिखाई देता है।

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ की लघुकथा गंगा-स्नान34 परंपरा को केवल निभाए जाने वाला कर्मकांड नहीं मानती। आस्था तभी जीवित रहती है जब उसमें आदमी के लिए जगह और अपने आचरण को जाँचने का साहस बचा हो। विक्रम सोनी की जूते की जात35 बड़ी सामाजिक बहस को एक मामूली वस्तु तक ले आती है। जूते के साथ जाति और प्रतिष्ठा जोड़ते ही साफ़ हो जाता है कि भेदभाव केवल मंदिर, विवाह या अनुष्ठान में नहीं, हमारी भाषा और रोज़ के बर्ताव में भी पलता है। सतीशराज पुष्करणा की सही दिशा36 परंपरा और बदलते समय के बीच कोई आसान फ़ैसला नहीं सुनाती। न आँख मूँदकर पीछे चलना ठीक है, न हर पुराने मूल्य को बेकार कहकर फेंक देना। सही दिशा वही हो सकती है जहाँ संस्कार मनुष्य की गरिमा और विवेक का गला न घोंटें। योगराज प्रभाकर की सुबह का भूला37 परिचित रामकथा को उर्मिला की मौन पीड़ा की ओर मोड़ देती है। सीता लक्ष्मण को फिर वन जाने से रोकते हुए कहती हैं कि पहले उर्मिला के हृदय में झाँको। मर्यादा केवल आदेश निभाने का नाम नहीं, अपने निर्णय से घायल हुए व्यक्ति का दुख देखने की ज़िम्मेदारी भी है। मिथक टूटता नहीं, उसका बरसों से दबा पक्ष बोलने लगता है।

10. तकनीकी-डिजिटल नवबोध

तकनीकी-डिजिटल नवबोध मशीन, इंटरनेट, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डेटा, स्क्रीन और संचार-माध्यमों से बदले जीवन को समझता है। यह तकनीक को केवल सुविधा या संकट नहीं मानता; वह देखता है कि पहुँच, नियंत्रण, स्मृति, संबंध, ज्ञान और निजता पर उसका असर वर्ग तथा सत्ता के अनुसार अलग-अलग पड़ता है। यह बोध डिजिटल पहुँच की वर्गगत दूरी, ज्ञान के केंद्रीकरण की असुरक्षा और उपकरण के पीछे छिपे असली नियंत्रण पर भी प्रश्न उठाता है।

सुकेश साहनी की लघुकथा ‘ कंप्यूटर38 मशीन से मिली सुविधा के साथ आए नए छल, अकेलेपन और नियंत्रण को टटोलती है। तकनीक काम आसान कर सकती है, मगर वह मनुष्य को मनुष्य के क़रीब ही लाएगी, यह ज़रूरी नहीं। कमल चोपड़ा की प्लान39 चमकदार तकनीकी योजना के पीछे बैठे स्वार्थ तक पहुँचती है। साधन अपने आपमें भला या बुरा नहीं होता। वह किसके हाथ में है और किसके लिए इस्तेमाल हो रहा है, असली बात वहीं खुलती है। अनुराग शर्मा की बिग-क्लाउड-2068’40 सुविधा पर अंधे भरोसे का डरावना नतीजा सामने रखती है। सभ्यता अपना पूरा ज्ञान एक डिजिटल क्लाउड में डालकर किताबें ख़त्म कर देती है। संकट आता है तो मरम्मत के निर्देश भी उसी ख़राब क्लाउड में बंद मिलते हैं। वैकल्पिक स्मृति मिटा दी जाए तो एक तकनीकी ख़राबी पूरी सभ्यता को अनपढ़ बना सकती है। रवि प्रभाकर की रिमोट41 घर की स्क्रीन से आगे घर की सत्ता तक जाती है। हर सदस्य रिमोट से अपना मनपसंद संसार चुन लेता है, पर सुधा को हर सेवा-पुकार पर उठना पड़ता है। अंत में पति रिमोट के साथ उसके शरीर पर भी अपना अधिकार जताता है। स्क्रीन चुनाव का भ्रम देती है। घर में असली रिमोट सुधा के जीवन का है और वह उसके हाथ में नहीं।

11. स्त्री-विमर्शात्मक नवबोध

स्त्री-विमर्शात्मक नवबोध स्त्री को त्याग, देवी, पत्नी या पीड़िता की तैयार छवि में बाँधने के बजाय उसकी देह, श्रम, इच्छा, निर्णय, शिक्षा और अस्मिता पर अधिकार का प्रश्न उठाता है। यह पितृसत्ता के खुले दमन के साथ उन कोमल दिखने वाली व्यवस्थाओं को भी पहचानता है जो प्रेम, विवाह, संरक्षण अथवा परंपरा के नाम पर स्त्री को नियंत्रित करती हैं। इसमें सहमति के बिना गर्भ, प्रतिभा या जीवन पर लिया गया निर्णय अतिक्रमण है, जबकि स्त्री का इनकार, आत्मरक्षा और प्रतिरोध उसकी स्वायत्तता के प्रमाण हैं।

अर्चना राय की लघुकथा योद्धा42 किराए की कोख के सौदे में छूट गई स्त्री की आवाज़ सुनती है। कलमी गर्भ से जुड़ चुकी है और आलीशान घर को अपना नया जीवन मान बैठी है, लेकिन डॉक्टर बता देता है कि वहाँ सब कुछ उसका है, पेट में पल रहा बच्चा नहीं। पति की इच्छा और आर्थिक मजबूरी ने मातृत्त्व का सौदा कर दिया, जबकि गर्भ धारण करने वाली स्त्री की भावना और सहमति हिसाब में ही नहीं है। रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ की नवजनमा43 स्त्री की देह, श्रम, इच्छा और प्रतिरोध को उसी की आँख से देखती है। वह किसी तय भूमिका में रखी जाने वाली आकृति नहीं, अपने निर्णय वाली पूर्ण मनुष्य है। योगराज प्रभाकर की कैक्टस का फूल44 में फिल्म निर्माता अवसर नहीं देता, देह का सौदा सामने रखता है। नीला अपने बचाव में खड़ी होती है तो उसकी योग्यता पर ही सवाल लगा दिया जाता है। यदि सफलता की क़ीमत अपने शरीर पर दूसरे का अधिकार स्वीकार करना है, तो इनकार हार नहीं। काँटों के बीच अपना फूल बचा लेना भी उपलब्धि है। डॉ. पुरुषोत्तम दुबे की लड़की पसंद है45 में भावी ससुराल तरंगिता की संगीत-प्रतिभा को घरेलू मर्यादा के विरुद्ध मानता है। उसका उत्तर विवाह की शर्त ही पलट देता है। लड़की पसंद की जाने वाली वस्तु नहीं, अपना जीवन और संबंध चुनने वाली व्यक्ति है।

12. न्यायिक-संवैधानिक नवबोध

न्यायिक-संवैधानिक नवबोध क़ानून, न्याय, अधिकार, प्रक्रिया, पुलिस, प्रशासन और निष्पक्षता के बीच के अंतर को पहचानता है। वह देखता है कि नियम समान दिखाई देकर भी प्रभाव में असमान हो सकते हैं और न्याय की भाषा पक्षपात छिपा सकती है। यह बोध पद, संबंध और प्रभाव से संचालित छिपे भेद को भी देखता है तथा न्याय को प्रक्रिया से आगे गरिमा, समान अवसर, उत्तरदायित्व और वास्तविक निष्पक्षता की कसौटी पर परखता है।

सुकेश साहनी की लघुकथा दीमक46 क़ानून की उस इमारत को देखती है जो बाहर से खड़ी दिखाई देती है, मगर भीतर लगातार खोखली हो रही है। अधिकार काग़ज़ पर मौजूद हो सकते हैं, न्याय फिर भी आदमी तक न पहुँचे। कमल चोपड़ा की क़ैद बा-मशक़्क़त47 सजा और न्याय के बीच का फ़र्क़ पकड़ती है। व्यवस्था सबके लिए समान दिखाई देती है, लेकिन ज़मीन पर उसका बोझ आदमी की हैसियत और ताक़त देखकर बदल जाता है। सतीश दुबे की जन-सुनवाई48 में मंच, प्रक्रिया और आश्वासन सब मौजूद हैं, केवल पीड़ित की आवाज़ निर्णय तक नहीं पहुँचती। सुनवाई का पूरा आयोजन ही उसकी बेबसी का तमाशा बन जाता है। सतीशराज पुष्करणा की सिफ़ारिश49 बेईमानी का बहुत महीन रूप सामने लाती है। उच्चाधिकारी भतीजे की सिफ़ारिश से इनकार करता है, फिर साक्षात्कार बोर्ड के सामने रिश्ते की घोषणा करके बाहर चला जाता है। भतीजा प्रथम आता है। अधिकारी का सबके सामने स्वयं को अलग कर लेना ही सबसे असरदार सिफ़ारिश सिद्ध होता है। निष्पक्षता के लिए कुर्सी से उठ जाना काफ़ी नहीं, पद और संबंध की छाया भी हटानी पड़ती है। हरभगवान चावला की सत्यमेव जयते50 में राजा न्याय के नाम पर शव टँगवाता है, लेकिन अपराधी कहे गए लोग शिक्षक, लेखक, साधु और समाजसेवी निकलते हैं। सच पूछने वाला छोटा समूह भी उन्मादी भीड़ की हड्डियों में बदल जाता है। जब आरोप ही प्रमाण हो और भीड़ न्यायाधीश, तब न्याय का नारा हत्या का औज़ार बन जाता है।

13. जैव-नैतिक नवबोध

जैव-नैतिक नवबोध चिकित्सा, अंगदान, प्रत्यारोपण, इच्छामृत्यु, प्रजनन तकनीक, जीन-संपादन और जीवनरक्षक साधनों से उठने वाले नैतिक प्रश्नों की पड़ताल करता है। इसका केंद्रीय सवाल है कि विज्ञान जो कर सकता है, क्या मनुष्य को वह सब करना भी चाहिए, और निर्णय में व्यक्ति की गरिमा कहाँ है। यह बोध विज्ञान-विरोध नहीं करता; वह संभावना के साथ सहमति, उत्तरदायित्व और जोखिम जोड़ते हुए जीवन बचाने के नाम पर देह को साधन बनाने की प्रवृत्ति पर प्रश्न उठाता है।

कमल चोपड़ा की लघुकथा संतान51 संतान की इच्छा के भीतर छिपे उस ख़तरे को पकड़ती है, जहाँ किसी दूसरे मनुष्य की देह साधन बन जाती है। जीवन पैदा करने की चाह अपने-आप पवित्र नहीं हो जाती। उसमें सहमति, गरिमा और ज़िम्मेदारी न हो तो वही चाह शोषण का रूप ले सकती है। अशोक भाटिया की रोग और इलाज52 एक और कठिन सवाल उठाती है। इलाज का उद्देश्य जीवन बचाना है, लेकिन यदि उसी प्रक्रिया में व्यक्ति की इच्छा, संबंध और आत्मसम्मान कुचल जाएँ तो उपचार और हिंसा के बीच का फ़र्क़ धुँधला पड़ने लगता है। अंजना मनोज गर्ग की आत्मा की प्रार्थना53 फंतासी के सहारे अंग-प्रत्यारोपण और देह की सीमा तक जाती है। आत्मा ईश्वर से प्रार्थना करती है कि नई मानव-देह में लीवर, किडनी और दूसरे अंग न लगाए जाएँ। यह चिकित्सा-विज्ञान का विरोध नहीं, जीवन बढ़ाने की बेचैनी पर सवाल है। विज्ञान ने क्या संभव कर दिया, यह एक बात है। जो संभव है, क्या वह हर हाल में किया जाना चाहिए, यह उससे कहीं कठिन बात। शरीर पुर्ज़ों का गोदाम नहीं, किसी मनुष्य का अपना अस्तित्व है।

14. सूचना-मीडिया नवबोध

सूचना-मीडिया नवबोध समाचार, दृश्य-तमाशे, प्रचार, फेंक न्यूज़, सेंसरशिप, प्रायोजित विमर्श और सूचना पर नियंत्रण की नई समझ है। यह माध्यम की तकनीक से अधिक उस शक्ति पर ध्यान देता है जो तय करती है कि क्या दिखेगा, किसे बोलने दिया जाएगा और दर्शक हिंसा को किस रूप में ग्रहण करेगा। यह लगातार परोसे गए प्रचार के उस असर को भी पहचानता है, जो केवल जानकारी नहीं, दर्शक की संवेदना, व्यवहार और प्रतिरोध की क्षमता तक बदल देता है।

सुकेश साहनी की लघुकथा नब्ज़54 समाचार और प्रचार के उस खेल को पकड़ती है जिसमें पूरा सच नहीं, काम का सच चुना जाता है। माध्यम केवल घटना नहीं दिखाता, वह यह भी तय करता है कि दर्शक क्या देखे और क्या भूल जाए। कमल चोपड़ा की चंगुल55 इस जाल को और बेचैन करने वाली जगह पर ले जाती है। पाठक या दर्शक को लगता है कि वह अपनी समझ से दुनिया देख रहा है, जबकि उसकी निगाह पहले ही चुनी गई सामग्री के चंगुल में है। युगल की जब द्रौपदी नंगी नहीं हुई56 मीडिया की तमाशा-भूख पर तीखा सवाल है। घटना की मनुष्यता से अधिक दृश्य की सनसनी ज़रूरी हो जाए तो किसी स्त्री की बची हुई गरिमा भी माध्यम के लिए निराशा बन सकती है। अर्चना अनुपम की लड़ाई57 में मुर्गों की ख़ूनी लड़ाई से घबराई स्त्री टी.वी. को बेहतर विकल्प मानती है, पर स्क्रीन पर भी युद्ध, विनाश, आयोजक और प्रायोजक मौजूद हैं। होंठों पर रखी उँगली उसे ‘शांति’ लगती है, पाठक उसमें चुप करा दिए जाने की मजबूरी देखता है। हरभगवान चावला की बीमार58 में वृद्ध की हिंसक कल्पनाएँ किसी निजी दुश्मनी से नहीं, दिनभर देखे समाचारों और सोशल मीडिया से पैदा होती हैं। उसका काला पड़ता ख़ून उस ज़हरीले प्रचार का रूपक है जो केवल सूचना नहीं देता, आदमी के भीतर का रंग भी बदल देता है। ज़हर ख़बरों में था, बीमारी मनुष्य में उतर आई।

15. विस्थापन-प्रवासन नवबोध

विस्थापन-प्रवासन नवबोध युद्ध, दंगे, सीमाएँ, रोज़गार, निर्वासन और विदेश-प्रवास के कारण घर, भाषा, स्मृति तथा पहचान से कटते मनुष्य की नई समझ है। इसमें विस्थापन केवल स्थान बदलना नहीं, अपने इतिहास और संबंधों के एक हिस्से से धीरे-धीरे बेदखल होना भी है। यह बोध छूटी मिट्टी के साथ टूटे भरोसे और अनकहे अपमान को भी पढ़ता है तथा अलग-अलग समुदायों के दुख में उनकी साझा असुरक्षा पहचानता है।

सुकेश साहनी की लघुकथा आइसबर्ग59 विस्थापन की दिखाई देने वाली पीड़ा के नीचे दबे उस बड़े हिस्से तक पहुँचती है, जिसे बाहर वाला देख ही नहीं पाता। घर और ज़मीन छूटते हैं तो केवल पता नहीं बदलता। स्मृतियाँ, रिश्ते और अपने होने की पहचान भी जड़ से हिलती है। योगराज प्रभाकर की कहा-अनकहा60 कश्मीरी मुस्लिम छात्र के बार-बार झेले संदेह और अपमान को घाटी से निकाले गए निर्दोष पंडितों की पीड़ा से जोड़ती है। वह अपने दादा की गांधीवादी आस्था बचाए रखने के लिए पत्र भेजता नहीं। यहाँ दो समुदायों के दुख एक-दूसरे से बड़े सिद्ध करने की होड़ में नहीं उतरते। घर से कटना भरोसे से कटना भी है। जो कहा गया और जो भीतर दबा रह गया, दोनों मिलकर निर्वासन की असली पीड़ा रचते हैं। हरभगवान चावला की शरण61 हमारी सुविधाजनक करुणा पर चोट करती है। घायल कुत्ते को देखकर रामप्रताप को शरणार्थी याद आते हैं, लेकिन अगले ही क्षण वह वही तर्क दोहराता है जिनसे देश अपने दरवाज़े बंद करते हैं। दूर बैठे मनुष्य के लिए दुखी होना आसान है, अपने हिस्से की छोटी-सी ज़िम्मेदारी उठाना कठिन।

16. उपभोक्तावादी नवबोध

उपभोक्तावादी नवबोध उस प्रक्रिया को पहचानता है जिसमें बाज़ार घर, संबंध, सौंदर्य, उत्सव, शोक, प्रतिष्ठा और आत्मीयता तक को प्रदर्शन तथा वस्तु में बदल देता है। यह आर्थिक असमानता से आगे जाकर पूछता है कि ख़रीदी गई चीज़ें मनुष्य की इच्छाओं और संबंधों का मूल्यांकन किस तरह बदल रही हैं। यह बोध दिखाता है कि बाज़ार पहले कमी और हीनता का भय गढ़ता है, फिर उत्पाद या आसान ऋण बेचता है; इसलिए वस्तु सुख और स्वतंत्रता की गारंटी नहीं बन सकती।

सुकेश साहनी की लघुकथा इमीटेशन62 बाज़ार की उस चाल को पकड़ती है जिसमें चीज़ से पहले उसकी कमी बेची जाती है। ब्रांड और दिखावे की नक़ली चमक मनुष्य को अपने ही जीवन से छोटा महसूस कराने लगती है। ज़रूरत पीछे छूट जाती है, दूसरों की निगाह में बड़ा दिखना ज़रूरी हो जाता है। अशोक भाटिया की असली ख़ुशी63 इसी बेचैनी के सामने साधारण-सा प्रश्न रखती है कि सुख ख़रीदी हुई वस्तु में है या संबंध, संतोष और जिए हुए अनुभव में। वस्तु चमक सकती है, जीवन की सहज प्रसन्नता उसकी क़ीमत से तय नहीं होती। सतीश दुबे की बर्थ-डे गिफ़्ट64 उत्सव और आत्मीयता के बीच घुसे बाज़ार को पहचानती है। उपहार प्रेम की सहज अभिव्यक्ति न रहकर क़ीमत, प्रदर्शन और सामाजिक दबाव का पैमाना बन जाता है। पैकेट बड़ा होता जाता है, संबंध की आत्मीयता पीछे सरकती जाती है। जयप्रकाश मानस की गोरा पैकेट65 रंग को कमी बताकर उसी कमी का महँगा इलाज बेचने वाला खेल खोलती है। विज्ञापन, विवाह-बाज़ार और परिवार मिलकर स्त्री के भीतर अपने ही रंग के प्रति अस्वीकार भरते हैं। उत्पाद क्रीम बाद में बेचता है, हीनता पहले। अंत में प्रतिबंध समस्या को कुछ जल्दी समेट देता है, क्योंकि बाज़ार का भूत केवल सरकारी आदेश से नहीं उतरता।

17. शैक्षिक नवबोध

शैक्षिक नवबोध शिक्षा के बाज़ारीकरण, अंक-दौड़, कोचिंग, शिक्षक की अनुपस्थिति, वर्गगत पहुँच, डिग्री और रोज़गार के संबंध तथा संस्थागत पक्षपात को नए ढंग से पहचानता है। यह ज्ञान को केवल पाठ्यक्रम नहीं मानता; सम्मान, अवसर और प्रश्न करने का अधिकार भी शिक्षा का हिस्सा हैं। यह बोध विद्यार्थी की जिज्ञासा और बहुपक्षीय इतिहास-दृष्टि को आवश्यक मानते हुए पूछता है कि शिक्षा आज्ञाकारिता बना रही है या अन्याय के विरुद्ध खड़ा होने वाला विवेक।

कमल चोपड़ा की लघुकथा सीख66 शिक्षा का हिसाब अंकों और नौकरी से आगे ले जाती है। असली सीख आदमी के विवेक, बराबरी के व्यवहार और दूसरे मनुष्य के प्रति ज़िम्मेदारी में दिखाई देती है। पाठ याद कर लेना आसान है, उसे जीवन में उतारना कठिन। अशोक भाटिया की इतिहास-परिचय67 इतिहास पढ़ाने और इतिहास समझने के बीच की दूरी खोलती है। तारीख़ें और घटनाएँ जान लेना पर्याप्त नहीं। यह देखना भी ज़रूरी है कि किसकी दृष्टि दर्ज हुई, किसकी आवाज़ बाहर रह गई और वर्तमान उन पाठों का इस्तेमाल किस तरह कर रहा है। सतीश दुबे की लास्ट लेसन68 शिक्षा के अंतिम अर्थ को विद्यालय की दिनचर्या से बाहर खोजती है। शिक्षक और विद्यार्थी के आचरण के बीच पड़ी दरार बता देती है कि पाठ पूरा करा देना ज्ञान नहीं। शिक्षा जीवन के प्रति ज़िम्मेदार नज़र पैदा करे, तभी उसका कोई अर्थ है। रवि प्रभाकर की मैं एकलव्य नहीं69 पुराने मिथकीय आदर्श को आज के अधिकार-बोध से उलट देती है। ग़रीब छात्र गुरु की अनुपस्थिति पर शिकायत करता है। वह व्यवस्था से बाहर रहकर चुपचाप साधना करने और फिर बलिदान देने को तैयार नहीं। वंचित विद्यार्थी की चुप्पी को महान बताना संस्था की ज़िम्मेदारी से बचना भी हो सकता है। आज का छात्र अँगूठा नहीं देगा। वह शिक्षक की उपलब्धता, समान अवसर और अपने प्रश्न का उत्तर माँगेगा। पृथ्वीराज अरोड़ा की ‘पढ़ाई’70 किताब और जीवन के बीच का कड़ा फर्क सामने रखती है। पुलिस की मार खाता नौजवान बताता है कि वह मज़दूरों के बच्चों को इतिहास, प्रधानमंत्रियों के नाम या बजट के आँकड़े नहीं पढ़ाता; वह उन्हें भूख का इंतज़ाम करना सिखाता है। उसका उत्तर पुलिस अधिकारी को चुप कर देता है। यहाँ शिक्षा पाठ्यक्रम नहीं, भूख के सामने टिके रहने की विवश समझ है।

18. लैंगिक नवबोध

‘लैंगिक नवबोध’ सुनते ही बात अक्सर स्त्री-अधिकारों की ओर चली जाती है। मगर मामला केवल इतना भर नहीं है। इसके दायरे में पुरुष और तृतीय लिंग भी आते हैं। देह, इच्छा और अपनी पहचान के साथ जीने का हक़ भी इसी से जुड़ा है। आख़िर किसने तय किया कि स्त्री ही घर सँभालेगी, पुरुष रोएगा नहीं, प्रेम केवल स्त्री और पुरुष के बीच होगा या विवाह के बाद स्त्री की देह और मेहनत पर उसका अपना हक़ कम हो जाएगा? ये नियम प्रकृति ने नहीं लिखे। समाज ने बनाए हैं और इतने बरस दोहराए हैं कि अब सच लगने लगे हैं। लैंगिक नवबोध इन्हीं पुराने नियमों से टक्कर लेता है। लघुकथा में यह तब उभरता है, जब कोई पात्र तय ढाँचे या साँचे में फिट होने से मना कर देता है। कभी खुलकर, कभी चुपचाप। वह ख़ुद तय करता है कि किससे प्रेम करेगा, अपनी देह पर किसका हक़ मानेगा और अपनी पहचान कैसे जिएगा। घर का बेनाम श्रम भी यहीं सवाल बनता है। बस, इसी जगह से पुरानी व्यवस्था की ज़मीन खिसकने लगती है।

यही टकराहट लघुकथा में अलग-अलग शक्लों में सामने आती है। योगराज प्रभाकर की आठवाँ सुर71 में दो नदियाँ समाज से इजाज़त नहीं माँगतीं। वे एक-दूसरे को चुनती हैं और समुद्र में समा जाने से इनकार कर देती हैं। स्त्री-समलैंगिकता यहाँ भाषण देकर नहीं समझाई गई, वह दो बहावों के आकर्षण से ख़ुद सामने आ जाती है। पीछे मचा ‘अनर्थ’ का शोर साफ़ कर देता है कि समाज को प्रेम से नहीं, उसकी आज़ादी से डर है। उन्हीं की आत्मस्वीकृति का युद्ध72 पूछती है कि किसी लड़के की आवाज़ और चाल समाज क्यों तय करे। कोमलता मर्द होने के विरुद्ध कबसे हो गई? दिव्या शर्मा की अभिनिषेध73 में स्त्री की मर्ज़ी पर परिवार और व्यवस्था अपना ठप्पा लगाना चाहते हैं। डॉ. शील कौशिक की गाली74 में जिसे समाज गाली समझता है, वही किन्नर बच्ची को अपनाते हैं। असली गाली बेटी से घृणा करने वाली सोच है। चंद्रेश कुमार छतलानी की अहमियत75 में बेटा आधी आइसक्रीम बहन को देकर घर के भीतर पलता भेद चुपचाप तोड़ देता है। बच्चे के लिए बहन की अहमियत ख़ुद से कम नहीं है। घर के बड़े जिस भेद को सामान्य मान चुके हैं, वह उसे आइसक्रीम बाँटकर एक झटके में नकार देता है। संतोष श्रीवास्तव की मंगलसूत्र76 की असली चोट अंत में लगती है। मंदा पति की मौत पर वैसा शोक नहीं ओढ़ती, जैसा समाज किसी विधवा से चाहता है। वह पहले भी कमाती थी; पति कमाई शराब में उड़ाता, उसे पीटता और गालियाँ देता था। मंगलसूत्र बेचकर वह बच्चों के लिए किताबें, कॉपियाँ और लिमका खरीदती है। समाज जिसे सुहाग की रक्षा मानता है, वही उसके गले में हिंसा की गाँठ था। “भोत चुभता था ताई, मंगलसूत्र!” एक संवाद सारा मुलम्मा उतार देता है। प्रताप सिंह सोढ़ी की मर्द77 उस तथाकथित मर्दानगी का चेहरा उजागर करती है, जिसमें शराब, हिंसा और स्त्री पर अधिकार को पुरुषत्व मान लिया गया है। दगड़ू बेटे को शराब पिलाकर ‘मर्द’ बनाने का दावा करता है, लेकिन यही दावा तथाकथित मर्दानगी का खोखलापन पाठक के सामने रख देता है।


संदर्भ-सूची
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1-राजनीतिक नवबोध

1. ‘एजेंडा, रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’, ‘असभ्य नगर एवं अन्य लघुकथाएँ’ (2013), अयन प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ: 100

2. ‘बोफोर्स काण्ड, सतीशराज पुष्करणा, ‘कथादेश’ (1990), अयन प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ: 444

3. ‘अकर्मक क्रिया, अशोक भाटिया, ‘अँधेरे में आँख’ (2020), हिंदी साहित्य निकेतन, बिजनौर, पृष्ठ: 123

4. ‘काले पन्ने काले अक्षर, योगराज प्रभाकर, ‘फक्कड़ उवाच’ (2021), देवशीला पब्लिकेशन, पटियाला, पृष्ठ: 41

5. ‘वृक्ष ऊँचे रहेंगे, अशोक लव, ‘सलाम दिल्ली’ (1991), पारुल प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ: 85

2. सामाजिक नवबोध

6. ‘ऊँचाई, रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’, ‘असभ्य नगर एवं अन्य लघुकथाएँ’ (2013), अयन प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ: 19

7. ‘बनैले सुअर, विक्रम सोनी, ‘पड़ाव और पड़ताल’, खंड-1 (2013), दिशा प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ: 96

8. ‘कूड़ा, अखिलेश शर्मा, ‘लघुकथा कलश’ (जुलाई-दिसंबर 2014), पृष्ठ: 9

9. ‘सिसकियाँ, रवि प्रभाकर, ‘कुकनूस’ (2022), देवशीला पब्लिकेशन, पटियाला, पृष्ठ: 99

3. धार्मिक नवबोध

10. ‘क्या मथुरा, क्या द्वारका?’, अशोक भाटिया, ‘अँधेरे में आँख’ (2020), हिंदी साहित्य निकेतन, बिजनौर, पृष्ठ: 27

11. ‘नामान्तरण, युगल, ‘पड़ाव और पड़ताल’, खंड-2 (2014), दिशा प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ: 96

12. ‘अवशेष, योगराज प्रभाकर, ‘फक्कड़ उवाच’ (2021), देवशीला पब्लिकेशन, पटियाला, पृष्ठ: 29-30

13. ‘धार्मिक होने की घोषणा, भगीरथ, ‘पड़ाव और पड़ताल’, खंड-16 (2016), दिशा प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ: 111

14. ‘अहसास, प्रताप सिंह सोढ़ी, ‘चमक जुगनूँ की’ (2025), देवशीला पब्लिकेशन, पटियाला, पृष्ठ: 34

4. साहित्यिक नवबोध

15. ‘लघुकथा अनन्ता, अशोक भाटिया, ‘अँधेरे में आँख’ (2020), हिंदी साहित्य निकेतन, बिजनौर, पृष्ठ: 119

16. ‘पुरस्कार, सतीशराज पुष्करणा, ‘प्रसंगवश’ (1997), अयन प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ: 89

17. ‘अनाम सैनिक, योगराज प्रभाकर, ‘फक्कड़ उवाच’ (2021), देवशीला पब्लिकेशन, पटियाला, पृष्ठ: 25

18. ‘मंच के पीछे का सच, जयप्रकाश मानस, ‘बची हुई हवा’ (2025), न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन्स, दिल्ली, पृष्ठ: 119

5. मनोवैज्ञानिक नवबोध

19. ‘पिघलती हुई बर्फ़, रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’, ‘असभ्य नगर एवं अन्य लघुकथाएँ’ (2013), अयन प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ: 58

20. ‘आत्मालाप, अशोक भाटिया, ‘सूत्रधार’ (2024), किताबवाले, दिल्ली, पृष्ठ: 45

21. ‘लाठी, विक्रम सोनी, ‘पड़ाव और पड़ताल’, खंड-1 (2013), दिशा प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ: 106

22. ‘संत्रास, रवि प्रभाकर, ‘कुकनूस’ (2022), देवशीला पब्लिकेशन, पटियाला, पृष्ठ: 93

6. दार्शनिक नवबोध

23. ‘कालचिड़ी, रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’, ‘असभ्य नगर एवं अन्य लघुकथाएँ’ (2013), अयन प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ: 70

24. ‘औरत, युगल, ‘पड़ाव और पड़ताल’, खंड-2 (2014), दिशा प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ: 111

25. ‘अजगर, विक्रम सोनी, ‘कथादेश’ (1990), अयन प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ: 368

26. ‘व्यष्टि में समष्टि, अवधेश तिवारी, ‘लघुकथा कलश’ (जुलाई-दिसंबर 2014), पृष्ठ: 19

27. ‘शेड्स ऑफ़ ब्लैक, रवि प्रभाकर, ‘कुकनूस’ (2022), देवशीला पब्लिकेशन, पटियाला, पृष्ठ: 92

7. आर्थिक नवबोध

28. ‘छोटे-बड़े सपने, रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’, ‘असभ्य नगर एवं अन्य लघुकथाएँ’ (2013), अयन प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ: 60

29. ‘सहारा, रवि प्रभाकर, ‘कुकनूस’ (2022), देवशीला पब्लिकेशन, पटियाला, पृष्ठ: 97-98

30. ‘प्रचलन से हटकर, जयप्रकाश मानस, ‘बची हुई हवा’ (2025), न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन्स, दिल्ली, पृष्ठ: 29

8. पर्यावरणीय नवबोध

31. ‘प्रदूषण, सुकेश साहनी, डरे हुए लोग’ (2010), अयन प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ: 113

32. ‘कलपती धरती माँ, अंजना मनोज गर्ग, ‘लघुकथा कलश’ (जुलाई-दिसंबर 2014), पृष्ठ: 7

33. ‘वैमनस्य, अमृता पांडे, ‘लघुकथा कलश’ (जुलाई-दिसंबर 2014), पृष्ठ: 15

9. सांस्कृतिक नवबोध

34. ‘गंगा-स्नान, रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’, ‘असभ्य नगर एवं अन्य लघुकथाएँ’ (2013), अयन प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ: 34

35. ‘जूते की जात, विक्रम सोनी, ‘पड़ाव और पड़ताल’, खंड-1 (2013), दिशा प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ: 100

36. ‘सही दिशा, सतीशराज पुष्करणा, ‘प्रसंगवश’ (1997), अयन प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ: 58

37. ‘सुबह का भूला, योगराज प्रभाकर, ‘फक्कड़ उवाच’ (2021), देवशीला पब्लिकेशन, पटियाला, पृष्ठ: 136

10. तकनीकी-डिजिटल नवबोध

38. ‘कंप्यूटर, सुकेश साहनी, ‘पड़ाव और पड़ताल’, खंड-25 (2016), दिशा प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ: 117

39. ‘प्लान, कमल चोपड़ा, ‘अकथ’ (2018), अयन प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ: 86

40. ‘बिग-क्लाउड-2068’, अनुराग शर्मा, ‘पड़ाव और पड़ताल’, खंड-33 (2022), दिशा प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ: 21

41. ‘रिमोट, रवि प्रभाकर, ‘कुकनूस’ (2022), देवशीला पब्लिकेशन, पटियाला, पृष्ठ: 78

11. स्त्री-विमर्शात्मक नवबोध

42. ‘योद्धा, अर्चना राय, ‘लघुकथा कलश’ (जुलाई-दिसंबर 2014), पृष्ठ: 18

43. ‘नवजनमा, रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’, ‘असभ्य नगर एवं अन्य लघुकथाएँ’ (2013), अयन प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ: 106

44. ‘कैक्टस का फूल, योगराज प्रभाकर, ‘फक्कड़ उवाच’ (2021), देवशीला पब्लिकेशन, पटियाला, पृष्ठ: 49

45. ‘लड़की पसंद है, डॉ. पुरुषोत्तम दुबे, ‘छोटे-छोटे सायबान’ (2021), जन लघुकथा साहित्य, दिल्ली, पृष्ठ: 12

12. न्यायिक-संवैधानिक नवबोध

46. ‘दीमक, सुकेश साहनी, ‘पड़ाव और पड़ताल’, खंड-25 (2016), दिशा प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ: 109

47. ‘क़ैद बा-मशक़्क़त, कमल चोपड़ा, ‘अकथ’ (2018), अयन प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ: 49

48. ‘जन-सुनवाई, सतीश दुबे, ‘पड़ाव और पड़ताल’, खंड-18 (2016), दिशा प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ: 127

49. ‘सिफ़ारिश, सतीशराज पुष्करणा, ‘प्रसंगवश’ (1997), अयन प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ: 110

50. ‘सत्यमेव जयते, हरभगवान चावला, ‘बीसवाँ कोड़ा’ (2019), बोधि प्रकाशन, जयपुर, पृष्ठ: 38

13. जैव-नैतिक नवबोध

51. ‘संतान, कमल चोपड़ा, ‘मेरी चुनिंदा लघुकथाएँ (2019), दिशा प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ: 94

52. ‘रोग और इलाज, अशोक भाटिया, ‘सूत्रधार’ (2024), किताबवाले, दिल्ली, पृष्ठ: 121

53. ‘आत्मा की प्रार्थना, अंजना मनोज गर्ग, ‘लघुकथा कलश’ (जुलाई-दिसंबर 2014), पृष्ठ: 7

14. सूचना-मीडिया नवबोध

54. ‘नब्ज़, सुकेश साहनी, ‘पड़ाव और पड़ताल’, खंड-25 (2016), दिशा प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ: 139

55. ‘चंगुल, कमल चोपड़ा, ‘मेरी चुनिंदा लघुकथाएँ’ (2019), दिशा प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ: 57

56. ‘जब द्रौपदी नंगी नहीं हुई, युगल, ‘पड़ाव और पड़ताल’, खंड-2 (2014), दिशा प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ: 108

57. ‘लड़ाई, अर्चना अनुपम, ‘लघुकथा कलश’ (जुलाई-दिसंबर 2014), पृष्ठ: 18

58. ‘बीमार, हरभगवान चावला, ‘बीसवाँ कोड़ा’ (2019), बोधि प्रकाशन, जयपुर, पृष्ठ: 68

15. विस्थापन-प्रवासन नवबोध

59. ‘आइसबर्ग, सुकेश साहनी, ‘डरे हुए लोग’ (2010), अयन प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ: 97

60. ‘कहा-अनकहा, योगराज प्रभाकर, ‘फक्कड़ उवाच’ (2021), देवशीला पब्लिकेशन, पटियाला, पृष्ठ: 39

61. ‘शरण, हरभगवान चावला, ‘बीसवाँ कोड़ा’ (2019), बोधि प्रकाशन, जयपुर, पृष्ठ: 107

16. उपभोक्तावादी नवबोध

62. ‘इमीटेशन, सुकेश साहनी, ‘डरे हुए लोग’ (2010), अयन प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ: 70

63. ‘असली ख़ुशी, अशोक भाटिया, ‘अँधेरे में आँख’ (2024), हिंदी साहित्य निकेतन, बिजनौर, पृष्ठ: 46

64. ‘बर्थ-डे गिफ़्ट, सतीश दुबे, ‘पड़ाव और पड़ताल’, खंड-18 (2016), दिशा प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ: 73

65. ‘गोरा पैकेट, जयप्रकाश मानस, ‘बची हुई हवा’ (2025), न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन्स, दिल्ली, पृष्ठ: 137

17. शैक्षिक नवबोध

66. ‘सीख, कमल चोपड़ा, ‘पड़ाव और पड़ताल’, खंड-20 (2016), दिशा प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ: 135

67. ‘इतिहास-परिचय, अशोक भाटिया, ‘अँधेरे में आँख’ (2020), हिंदी साहित्य निकेतन, बिजनौर, पृष्ठ: 133

68. ‘लास्ट लेसन, सतीश दुबे, ‘पड़ाव और पड़ताल’, खंड-18 (2016), दिशा प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ: 90

69. ‘मैं एकलव्य नहीं, रवि प्रभाकर, ‘कुकनूस’ (2022), देवशीला पब्लिकेशन, पटियाला, पृष्ठ: 76

70. ‘पढ़ाई’, पृथ्वीराज अरोड़ा, ‘तीन न तेरह’ (1997), अयन प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ: 34-35

18. लैंगिक नवबोध

71. ‘आठवाँ सुर, योगराज प्रभाकर, ‘आठवाँ सुर’ (2025), देवशीला पब्लिकेशन, पटियाला, पृष्ठ: 42

72. ‘आत्म-स्वीकृति का युद्ध, योगराज प्रभाकर, ‘दीपांजलि’ (2025), देवशीला पब्लिकेशन, पटियाला, पृष्ठ: 39

73. ‘अभिनिषेध, दिव्या शर्मा, ‘कैलेंडर पर लटकी तारीखें’ (2022), साहित्य विमर्श प्रकाशन, गुरुग्राम, पृष्ठ: 28

74. ‘गाली, डॉ. शील कौशिक, ‘छूटा हुआ सामान’ (2021), देवशीला पब्लिकेशन, पटियाला, पृष्ठ: 55

75. ‘अहमियत, चंद्रेश कुमार छतलानी, ‘हाल-ए-वक्त’ (2022), हिमांशु पब्लिकेशन्स, पृष्ठ: 78

76. ‘मंगलसूत्र, संतोष श्रीवास्तव, ‘मुस्कुराती चोट’ (2020), वनिका प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ: 57

77. ‘मर्द, प्रताप सिंह सोढ़ी, ‘चमक जुगनूँ की’ (2025), देवशीला पब्लिकेशन, पटियाला, पृष्ठ: 85

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  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
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