मानव सदियों से अपने भावों को अभिव्यक्ति देने के विभिन्न माध्यम खोजता रहा है। अपने अनुभवों को संजोकर रखने के लिए उसने कहानियाँ बनाईं। गीत बनाए, जिन्हें सुनाकर, गाकर आगे की पीढ़ियों तक पहुँचाया जाता रहा। जब लिपि का
आविष्कार हुआ तो विभिन्न लेखन विधाएँ भी प्रचलन में आई। पहले के समय में लेखकों और पाठकों दोनों में असीम धैर्य था और समय की कोई कमी नहीं थी। आधुनिक काल में समय जैसे पंख लगाकर उड़ रहा है। लंबे-लंबे आख्यानों के अध्ययन की प्रवृत्ति ही लुप्त होने को है। भाग-दौड़ भरे जीवन में कुछ सार्थक क्षण मिल जाएँ; दो-चार अच्छी लघुकथाएँ पढ़ ली जाएँ, तो भी दिन सफल अनुभव होता है। अच्छा अन्न स्वस्थ शरीर के लिए आवश्यक है वैसे ही अच्छा साहित्य आत्मा की खुराक है। ऐसा साहित्य जो मन को जाग्रत कर दे। हमें थोड़ा और संवेदनशील बना दे। लघुकथा ऐसी ही विधा है जिसमें गागर में सागर भरा होता है। जो सामाजिक विद्रूपताओं पर प्रहार करती है। सोई हुई आत्म-चेतना को झंकृत करती है। लघुकथा में एक पैनापन होता है जो हमारे सोचने समझने के नज़रिए को तराशता है। बहुत कुछ अनकहे की परतें होती हैं, जिन्हें हम अपने अनुभवों से समझते हैं। कथा की कई तहें होती हैं, जिन तक आहिस्ता-आहिस्ता पाठक को उतरना होता है। कई बिम्बों, प्रतीकों के माध्यम से बात की प्रभावात्मक शक्ति उभरती है।
पिछले कुछ दशकों में लघुकथा पर बहुत काम हुआ है। इसका सारगर्भित स्वरूप पाठकों के हृदय में स्थान बना चुका है। लघुकथा.कॉम पर बहुत अच्छी-अच्छी व संग्रहणीय लघुकथाएँ मैंने पढ़ी हैं। इसके लिए आदरणीय रामेश्वर काम्बोज हिमांशु जी और सुकेश साहनी जी के प्रयास व मेहनत प्रशंसनीय हैं। हिमांशु जी की लघुकथाएँ ‘सपने और सपने’, ‘ऊंचाई’, ‘नवजन्मा’, ‘ख़ुश्बू’ सीखने की पाठशाला के समान हैं। सोद्देश्यपूर्ण, सामाजिक विमर्शों को बिना हो हल्ले के उठाना इनकी विशेषता है। सुकेश साहनी जी की लघुकथाएँ कोलाज़, गोश्त की गंध, खेल आदि प्रतीकात्मक ढंग से सामाजिक विद्रूपताओं पर प्रहार करती हैं। बलराम अग्रवाल जी की ‘बिना नाल का घोड़ा’, रामकुमार आत्रेय जी की ‘पिताजी सीरियस हैं’, जानकी वाही जी की ‘सहमा हुआ सच’, सुनील सक्सेना जी की ‘आठ सिक्के’ ऐसी ही अनेक लघुकथाएँ हैं जो इसी पत्रिका में पढ़ी हैं और स्मृति में हैं।
मेरी पसन्द अंक के लिए दोनों लघुकथाओं के चयन आधार हाल-फ़िलहाल में पढ़ी हुई लघुकथाएँ हैं। दोनों ही लघुकथाओं में एक और बात है, वह है तहदारी। किसी कहानी, कविता, शेर आदि में जो गहराई होती है, उसे समझने के लिए हमें उसकी तह में उतरना होता है। जितनी तहें होंगी, उतनी गहराई होगी। हम सबका पाठ अलग-अलग होता है। कई बार स्वयं लेखक यह तय नहीं कर सकता कि उसकी रचना का जो अर्थ पाठक ने निकाला है, वही उसके मन में था या नहीं। कहने का अर्थ है कि किसी भी रचना को हम अपनी संवेदना और समझ के आधार पर ग्रहण करते हैं। सम्भव है कि हमारे पाठ से अन्य पाठक सहमत न हों।
डॉ. सुषमा गुप्ता जी की कुछ लघुकथाएँ पत्र-पत्रिकाओं में पढ़ी हैं। वे बहुत संवेदनशील इंसान हैं और लेखन भी संवेदनाओं से सराबोर है।
‘अतीत में खोई हुई वर्तमान की चिट्ठियाँ’- डॉ. सुषमा गुप्ता जी की यह लघुकथा मैंने लघुकथा.कॉम के फरवरी अंक में पढ़ी थी, तभी से मैं मन में इस लघुकथा से संवादरत हूँ। इसमें इतने नाजुक भाव हैं कि इस पर कुछ भी लिखते हुए अनजानी- सी झिझक है। प्रेम पर कुछ लिखना स्वयं में ही परीक्षा से गुज़रना है और वह भी ऐसे समय में, जबकि प्रेम पर बहुत धूमधाम से लिखा जा रहा हो; ज़्यादा मुश्किल है। एक चार साल की बच्ची है, जो सामने वाले घर में हो रहे चिट्ठी-व्यवहार का जाने-अनजाने निरीक्षण कर लेती है। बच्चों की यह प्रवृत्ति होती है कि सवाल बहुत पूछते हैं, जो भी देखा, जो न समझ आया बहुत सहजता से पूछ लेते हैं। दूसरी प्रवृत्ति यह कि बच्चे अनुकरण बहुत करते हैं। लेखिका ने इस बाल-मनोविज्ञान का बख़ूबी उपयोग किया है। चार साल की बच्ची ने जो आचरण देखा; जिसने कि उसे आकर्षित किया, उसे दोहराया भी। इसलिए कहा जाता है, बच्चों को सिखाना हो , तो उन्हें आदेश न देकर वो काम हमें स्वयं करना चाहिए। फिर देखिए कितनी शीघ्रता से वे अपने व्यवहार में इसे उतारते हैं। अब दीदी की देखादेखी वो बच्ची भी अपने दो साल के नन्हे दोस्त के लिए कागज़ में जो भी उसे आता है, लिखती है और उसके आँगन में डाल देती है। अब सवाल यह उठता है कि क्या चार साल की बच्ची प्रेम को समझती है? चिट्ठी का मतलब समझती है? कह सकते हैं कि जिस अर्थ में बड़ी उम्र के लोग समझते हैं, उस अर्थ में तो नहीं ही समझती। लेकिन उस चार साल की बच्ची की स्मृति में दर्ज़ रहती है वो घबराहट जो उस दीदी के चेहरे पर आ गई थी जब चिट्ठी के बाबत लड़की ने उससे पूछा था। वह उस घबराहट का सही-सही मतलब उस समय नहीं समझ पाई; लेकिन जब समाज की बंदिशों में रहते हुए वह लड़की बड़ी हुई, तो उस घबराहट के मायने उसके मन पर खुले। वर्जनाओं का कोई एक अध्याय नहीं होता कि पढ़ लिया या छोड़ दिया। वे तो हर घड़ी हवा में मौजूद रहती हैं कि जब भी साँस ली अनजाने ही लागू हो गई। चिट्ठी लिखने वाली दीदी के चेहरे की हवाइयाँ कितने लंबे अरसे बाद भी छोटी लड़की जो कि अब बड़ी हो चुकी है; के मन पर खरोंचें बन अंकित रही कि वो लड़की अब चिट्ठी नहीं लिखती। इसीलिए वर्जनाओं की कड़ियाँ टूटना आसान नहीं। हमारा व्यक्तित्व अनेक घटनाओं, दृश्यों व प्रभावों से मिलकर बनता है। छोटी-छोटी बातें भी स्मृति में रहकर हमारी सोच व व्यवहार पर कितना असर डालते हैं; यह बात इस लघुकथा से निकल कर आ रही है। प्रेम और प्रेम-पत्र आज भी बन्धनों में जकड़े समाज के लिए एक टैबू हैं।
यह तो एक पाठ हुआ। दूसरा पाठ यह कहता है कि लड़की ने जो शब्द बड़े चाव से लिखे थे; यह पता होते हुए भी कि उन्हें पढ़ा नहीं जाएगा, फिर भी तसल्ली थी कि वह उन्हें सुना सकेगी। उन शब्दों का खो जाना इस बात का प्रतीक है कि लड़की के जीवन में ऐसे कई अवसर आए, जब उसे अपनी बात कहनी थी; लेकिन उसे सही समय पर सही शब्द नहीं मिले या वह कह नहीं पाई अथवा तो उसे अनसुना किया गया और उसका हृदय निरन्तर पीड़ा में रहा। इस तरह एक कृति में कई भाव निहित होते हैं, जिन्हें पाठक अपनी संचित अनुभूति के आधार पर ग्रहण करता है।
1-अतीत में खोई हुई वर्तमान की चिट्ठियाँ
डॉ.सुषमा गुप्ता
चार साल की बच्ची का मन मासूम था। अपने घर की खिड़की से अक्सर वह सामने वाले घर की बालकनी में कुछ खेल होते देखती थी। एक रोज़ उसने सामने वाली दीदी से पूछा
“आपने सामने क्या फेंका?”
दीदी के चेहरे की हवाइयाँ उड़ गईं। कुछ सोचकर उन्होंने कहा-“वह सामने वाले घर में मेरा दोस्त रहता है। कभी मैं उसे कुछ कहना भूल जाती हूँ, तो इस तरह लिख कर संदेश दे देती हूँ। दोस्तों में ऐसे संदेश देना चलता रहता है।”
उस नन्ही बच्ची को यह बात बहुत सुंदर लगी। उसने नया-नया अक्षर- ज्ञान लेना शुरू किया था। उसका एक ही दोस्त था, साथ वाले घर में रहने वाला दो साल का नन्हा बंटी। वह सोचने लगी उसको संदेश भेजती हूँ, पर यह सोचकर उदास हो गई कि उसको अभी पढ़ना नहीं आएगा। अगले ही पल यह सोचकर मुस्कुरा दी कि तो क्या हुआ ,मैं ही पढ़कर सुना दूँगी।
उसने एक कागज़ पर जितने अक्षर सीखे थे, सब लिख दिए और अपने आँगन से उसके आँगन में फेंक दिया, फिर अपने गेट से निकलकर तेज़ी से उसके घर की तरफ गई। उसके आँगन में पड़ी अपनी चिट्ठी को देख ,खुशी से चहकती हुई, उसके घर के अंदर गई।
वह टीवी के सामने बैठा कार्टून देख रहा था। लड़की ने उसका हाथ थामकर कहा-“तेरे लिए कुछ है।”
नन्हे बंटी ने बाल-सुलभ जिज्ञासा से तुतलाहट भरी आवाज़ में पूछा “त्या ?”
लड़की हाथ पकड़के उसको बाहर की तरफ़ खींचने लगी, “आ दिखाती हूँ।”
छोटे-छोटे दो कंगारू फुदकते हुए बाहर आँगन की तरफ बढ़ गए। आँगन में शहतूत का पेड़ भी था, काले शहतूत का पेड़। चिट्ठी उड़कर उस पेड़ के नीचे जा गिरी थी।
हवा तेज़ थी। अनगिनत पके शहतूत ,पेड़ के नीचे पड़े थे। काले धब्बों से ज़मीन पटी हुई थी । चिठ्ठी उड़कर उन काले शहतूतों से लिपट गई थी। लड़की ने आहिस्ता से उसको उठाकर देखा। शहतूत के धब्बों से कागज़ जामुनी हो गया था और बहुत से अक्षर उस रंग में घुलकर काले हो ,लुप्त हो चुके थे। बच्ची का मन बुझ गया। इतने मन से उसने वह चिट्ठी लिखी थी हालाँकि उसको याद था कि उसने उसमें क्या लिखा है पर…
इतनी छोटी उम्र में भी उसको यह तो पता था कि नन्हा बंटी उस चिट्ठी को पढ़ नहीं पाएगा, चिट्ठी उसी को पढ़कर सुनानी थी। उसके बावजूद खो गए शब्द उसके लिए किसी खोई हुई अपनी सबसे सुंदर गुड़िया से कम नहीं थे,जिसका दु:ख बहुत बड़ा था ।
लड़की की नन्ही-नन्ही हिरनी -जैसी आँखों में बड़े-बड़े आँसू तैर गए। छोटा लड़का तो कुछ भी नहीं समझ पा रहा था। वह टुकुर-टुकुर बस देख रहा था। जब छोटी लड़की रोने लगी, तो उस छोटे लड़के के दिल में भी कुछ हलचल हुई। उसने धीरे से उसको हिलाकर अपनी मीठी तोतली ज़ुबान में पूछा
” त्या हुआ!”
काले जामुनी धब्बों से भरी हुई चिट्ठी जो उस लड़की की नन्ही हथेली में रखी थी, उसने लड़के के आगे कर दी। लड़के को तब भी समझ ना आया कि हुआ क्या है। उसने फिर पूछा-” त्या हुआ?”
लड़की ने मुट्ठी बंद की और अपने घर की तरफ दौड़ गई। सीधे अपने कमरे में जाकर बिस्तर पर फूट-फूट कर रोने लगी।
शब्दों के गुम जाने के बाद दिल टूटने की यह उसकी ज़िंदगी की पहली घटना थी।
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खलील जिब्रान की लघुकथाएँ विश्व की अनेक भाषाओं में अनूदित होकर पढ़ी जा रही हैं। कथ्य-शिल्प की दृष्टि से परिष्कृत व प्रतीकात्मक लघुकथाओं का अनुवाद भी बहुत अच्छा है। ‘दर्प-विसर्जन’ का अनुवाद सुकेश साहनी जी ने किया है। बाइब्लॅस नामक स्थान का राजा जब राज्याभिषेक के पश्चात अपने निजी कक्ष में आता है तथा मुकुट व शाही परिधान उतार कर अपने राजा बनने के विषय में सोच रहा होता है तभी वह देखता है कि माँ द्वारा दिये गए दर्पण में से एक नंगा व्यक्ति बाहर निकल आता है व राजा से वार्तालाप करता है। नंगा व्यक्ति पूछता है- उन्होंने तुम्हें राजा क्यों बनाया? वह कहता है क्योंकि मैं शक्तिशाली हूँ, नंगा व्यक्ति कहता है- तुमसे अधिक शक्तिशाली भी हैं फिर तुम्हें ही क्यों बनाया? इसी क्रम में राजा कहता है मैं महान हूँ, बुद्धिमान हूँ। नंगा व्यक्ति कहता है तुम इससे महान व बुद्धिमान होते तो भी राजा बनने योग्य नहीं थे।
परेशान होकर राजा फ़र्श पर गिरकर रोने लगा। तब उस नंगे व्यक्ति ने राजा को मुकुट पहना दिया व दर्पण के भीतर ग़ायब हो गया। दरअसल वह नंगा व्यक्ति कोई और नहीं राजा की अन्तरात्मा ही थी। जब राजा को एक शक्तिशाली राजा होने का अहंकार हुआ, तो चेतावनी देने के लिए उसकी आत्मा प्रत्युत्तर में प्रस्तुत हुई। माँ द्वारा दिए गए दर्पण से नंगे व्यक्ति का निकलना इस बात का प्रतीक हो सकता है कि अहंकार का भान होने पर उसे माँ की शिक्षाओं का स्मरण हुआ हो। जब वह दुनिया में आया निर्वस्त्र ही था। यह शाही पोशाकें, ताज आदि सब क्षणभंगुर थे। जब राजा फ़र्श पर गिरा, तो उसका मस्तिष्क का भूमि से स्पर्श हुआ और उसे आभास हुआ कि यह तो उसका भ्रम है कि शक्तिशाली, महान और बुद्धिमान है। जब उसका अहंकार विसर्जित हो गया, तो नंगे व्यक्ति ने ताज पुनः उसके शीश पर रख दिया। अब ताज गर्व का प्रतीक न होकर एक महती जिम्मेदारी का प्रतीक था। मुस्कुराता हुआ वह अक्स फिर से दर्पण में समा गया। अब राजा विनम्रता के आभूषण से अलंकृत था। दर्पण के भीतर राजा की छवि पर ताज विराजमान था। खलील जिब्रान की लघुकथाओं का शिल्प बेजोड़ है।
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दर्प–विसर्जन
खलील जिब्रान (अनुवाद: सुकेश साहनी)
राज्याभिषेक के बाद बाइब्लॅस का राजा अपने उस सोने के कमरे में चला गया जिसे तीन एकान्तवासी जादूगरों ने उसके लिए बनाया था। उसने अपना मुकुट और शाही परिधान उतार दिए और कमरे के बीच खड़ा होकर अपने विषय में सोचने लगा–अब मैं बाइब्लॅस का शक्तिशाली शासक बन गया हूँ।
एकाएक उसने देखा, माँ द्वारा दिए गए चांदी से चमकते शीशे से एक नंगा आदमी बाहर निकल रहा है।
राजा चौंक पड़ा, उसने उस आदमी से चिल्लाकर पूछा, “तुम क्या चाहते हो?”
नंगे आदमी ने उत्तर दिया, “कुछ भी नहीं! पर उन लोगों ने तुम्हें मुकुट क्यों पहनाया है?”
राजा ने कहा, “क्योंकि मैं पूरे देश में सबसे महान हूँ।”
तब नंगे आदमी ने कहा, “अगर तुम इससे भी महान होते तो भी राजा बनने लायक नहीं थे।”
तब राजा ने कहा, “मैं देश का सबसे बुद्धिमान आदमी हूँ इसलिए उन्होंने मुझे मुकुट पहनाया है।”
नंगे आदमी ने कहा, “अगर तुम इससे भी अधिक बुद्धिमान होते तो भी राजा चुने जाने लायक नहीं थे।”
तब राजा फ़र्श पर गिर पड़ा और फूट–फूटकर रोने लगा।
नंगे आदमी ने उस झुके हुए आदमी की ओर देखा।
फिर उसने मुकुट उठाया और उसे दोबारा राजा के झुके हुए सिर पर नर्मी से रख दिया और राजा को प्यार भरी नजरों से एकटक देखता हुआ वह दर्पण में समा गया।
राजा चौंककर उठा। उसने सीधे दर्पण की ओर देखा। वहाँ अब वह अपने आपको मुकुट पहने हुए देख रहा था।
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