जून 2026

मेरी पसन्दलघुकथा- दीर्घगामी प्रभाव- संवेदना से सम्पृक्त     Posted: September 1, 2023

           लघुकथा आज अपने विकास के दौर में है, तब यह अवश्य हमारे ध्यान में रहे कि इस संश्लिष्ट गद्यकथा में अनेक प्रयोग होने की प्रबल संभावना है। भूमंडलीकरण के दौर में अंतरजाल की व्यापकता ने विषयों का अंबार खड़ा कर दिया है, तब लेखक के समक्ष यह गंभीर चुनौती है कि देशकाल और समकालीन परिस्थितियों की विसंगतियों और सामाजिक मूल्यों के ह्रास को भाव और संवेदना के स्तर पर मितशाब्दिक प्रस्तुति को उद्देश्यपूर्ण बनाते हुए,  लघुकथा को और प्रभावी बनाते हुए , उसमें अधिक से अधिक ऊर्जा संरक्षित करते हुए, समाज से सोचने का आग्रह किया जाए।

   लघुकथा में विस्तार के विपरीत मात्र अपरिहार्य वांछनीय वर्णन, प्रभावशाली सार्थक संवाद,घटना प्रधान मुद्दों का सामाजिक प्रभाव, रससिक्त तीव्र रोचकता और संवेदना के स्तर पर मर्मस्पर्शी उद्देश्य निस्संदेह लघुकथा को साहित्य और समाज की धरोहर बनाता है। इनके अतिरिक्त लघुकथा में कथा के तत्त्व और उसका दीर्घगामी प्रभाव- संवेदना से सम्पृक्त होना नितांत आवश्यक है l 

          दर्शन का गहरा पुट लिये कार्ल सेंडबर्ग की लघुकथा ‘रंगभेद’ सृष्टि के वृहद रूप को दर्शाती हुई कल्पना को खुला आसमान प्रदान करती है। कथा में दो सामान्य व्यक्तियों के मध्य छोटे से वार्तालाप को बहुत बड़े विचार के साथ प्रस्तुत किया गया है। विकार के चलते मनोविकारों के परिवर्तन से आदमी स्वयं को श्रेष्ठ समझे जाने की मानवीय मनोवृत्ति उससे नाना प्रकार के कृत्य करवाती है। ‘मैं’ की बलवती होती भावना से व्यक्ति को लगने लगता है कि वही सर्वेसर्वा है, वह सब जानता है। वर्ग विशेष का ज्ञान पर आधिपत्य, श्रेष्ठ समझे जाने की बलवती होती भावना का बहुत सुंदर चित्रण किया गया है। यहाँ सामान्य व्यक्ति के कुछ जानने से तात्पर्य उसके जीविकोपार्जन के साधन से है।

  यहाँ इस लघुकथा में बहुत ही बारीक़ी से नियामी नदी के तट पर दो व्यक्तियों के मध्य वार्तालाप को दर्शाया गया है, जिसमें गोरा व्यक्ति, काले व्यक्ति को घृणा की दृष्टि से देखते हुए उसे उसकी अज्ञानता का बोध कराता है और एक सर्किल बनाते हुए कहता है कि काला व्यक्ति बस इतना ही जानता है l फिर अगले ही पल स्वयं की महत्ता साधते हुए छोटे सर्किल के पास बड़ा-सा सर्किल बनाते हुए कहता है कि गोरा आदमी इतना कुछ जनता है। दोनों के मध्य कुछ पल के लिए मौन पसर जाता है। काला आदमी उठते हुए छोटा-सा पत्थर उठाता है और दोनों के इर्द- गिर्द बड़ा-सा सर्किल बनाते हुए कहता है कि इतना कुछ और भी बचा है, जो न काला जनता है न गोरा।

जानने व न जानने के मध्य पसरा शून्य इस लघुकथा की ओर ध्यान आकर्षित करता है। वहीं वर्ण के आकर्षण को श्रेष्ठता का पैमाना माने जाने को निराधार सिद्ध करते हुए बौद्धिक क्षमताओं की संभावनाओं के क्षितिज पर विवेक के तारे-सी जगमगाती नज़र आती है।

               ‘दूध’ कालजयी लघुकथा है, जिसका बाहरी स्वरूप बाल-मनोविज्ञान का सिरा पकड़े हुए वृक्ष पर फैली  बल्लरी की तरह है, जिसमें झाँकते वृक्ष का अपना अस्तित्त्व है।

संकीर्ण मानसिकता के विकार से उपजी नकारात्मकता ने सदियों से भेदभाव की भावना के कुरूप रूप ने सामाजिक जीवन को प्रभावित ही नहीं किया; बल्कि नारी जीवन पर अपनी गहरी छाप छोड़ते हुए उसकी इच्छाएँ,लालसाएँ जीवन से  पोंछते हुए जीवन- परिधि पर उसके अस्तित्व को नकारते हुए उसे परे धकेल दिया है। 

“दूध घर के मर्द पीते हैं; क्योंकि वे मर्द हैं।” यह मानसिकता समाज में बहुत गहराई में बैठी है, जिससे एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी में शब्दों और व्यवहार के सहारे इसको प्रवाहित करती है। समय के साथ बदलते मूल्यों को उसने भुला दिया है।

         ‘दूध’ लघुकथा में बच्ची हांडी में पके गर्म दूध की ख़ुशबू से दूध पीने को लालायित रहती है। रोज़ रात को खाने के समय माँ अक्सर उसे घर के पुरुषों को गर्म दूध से भरे गिलास पहुँचाने को कहती है।

लालसा में जकड़े बाल-मन का मार्मिक दृश्य यहाँ उभरकर सामने आया है।

एक रोज़ माँ और दादी के घर से बाहर जाने पर, बच्ची हांडी में पक रहे गर्म दूध को स्वयं के लिए गिलास में भरती है; परंतु तभी माँ और दादी का मुख्यद्वार पर प्रवेश देख बच्ची के हाथों से गिलास छूट जाता है। दूध का गुलाबी रंग मिट्टी के फ़र्श पर फैल जाता है। माँ का तमतमाया चेहरा देख बच्ची सकपका जाती है, तभी माँ कहती है तू दूध मुझसे नहीं माँग सकती थी? बच्ची कहती है, मैं रोज़ तुमसे माँगती हूँ; परंतु तुम देती कहाँ हो? बालबोध प्रश्नों की झड़ी से लघुकथा का कैनवास बहुत बड़ा हो जाता है जो शब्दों से परे है।

 

  1. अंग्रेजी / रंगभेद / कार्ल सेंडबर्ग

             मियामी के तट पर बैठे एक गोरे व्यक्ति ने रेत पर एक गोल चक्कर बनाया और सामने बैठे काले आदमी की तरफ घृणा से देखते हुए कहा, “एक काला आदमी इस से अधिक नहीं जानता।”

 फिर उसने उस छोटे चक्कर के गिर्द एक बड़ा-सा चक्कर बनाते हुए कहा, “एक गोरा आदमी इतना अधिक जानता है।”

 इस बार काला आदमी उठा। उसने एक छोटे पत्थर से दोनों चक्करों के गिर्द एक बहुत बड़ा चक्कर खींच कर कहा, “इतना कुछ है जिसे न गोरा आदमी जानता है, न ही काला आदमी।”

 

2.दूध /  चित्रा मुद्गल 

 दूध घर के मर्द पीते हैं; क्योंकि वे मर्द हैं।

उसका काम है—दूध के गुनगुने गिलास को सावधानीपूर्वक उन तक पहुँचाना। पहुँचाते हुए वह हर रोज दूध के सीधे गिलास को सूँघती है। पके दूध की गन्ध उसे बौरा देती है।

एक रोज माँ और दादी घर नहीं होती तो वह चटपट कोठरी खोलकर दुधहड़ी से अपने लिए दूध का गिलास भरती है और घूँट भरने को जैसे ही गिलास होठों के पास ले जाती है—घर के भिड़े किवाड़ भड़ाक से खुल उठते हैं। उसके होठों तक पहुँचा गिलास हाथ से छूट जाता है और दुधहड़ी पर जा गिरता है। मिट्टी की दुधहड़ी के दो टुकड़े हो जाते हैं। कोठरी के गोबरलिपे कच्चे फर्श पर गुलाबी दूध चारों ओर फैल जाता है। निकट आई भौचक माँ को देख वह थर-थर काँपती, पश्चाताप व्यक्त करती माफी माँगती-सी कहती है, “मैं, मैं…”

“दूध पी रही थी कमीनी?”

“हाँअ…”

“माँग नहीं सकती थी?”

“माँगा था, तुमने कभी दिया नहीं…”

“दिया नहीं ,तो कौन तुझे लठैत बनना है जो लाठी को तेल पिलाऊँ?”

“एक बात पूछूँ माँ?” आँसू भीगी उसकी आवाज अचानक ढीठ हो आई।

“पूछ!”

“मैं जनमी, तो दूध उतरा होगा तुम्हारी छातियों में?”

“हाँ…खूब। पर…पर तू कहना क्या चाहती है?”

“तो मेरे हिस्से का छातियों का दूध भी क्या तुमने घर के मर्दों को पिला दिया था?”

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