अगस्त 2026

अध्ययन -कक्षलघुकथा के पुरोधा-सतीश राज पुष्करणा     Posted: March 1, 2026

आई आई टी मुंबई से शिक्षा पूर्ण करने के बाद मेरी शासकीय सेवा में पहली पदस्थापना आगरा में हुई थी। विभाग के निदेशक द्वारा मुझे आगरा में एक नई क्षेत्रीय  इकाई स्थापित करने का कार्य दिया गया था, जो काफी चुनौतीपूर्ण था। मेरा 13 से 16 वर्ष की आयु के बीच उपन्यास- लेखन के कारण शिक्षा में उत्पन्न व्यवधान आया, जिसके कारण लेखन स्थगित रहा था। आगरा में नौकरी सम्बन्धी व्यस्तताओं के बीच मेरा लिखना- पढ़ना शुरू हो गया था। वर्ष 73-75 के आसपास ‘रिश्ते के बीच’, ‘शासक और शासित’ और ‘मर मिटने का आनंद’ जैसी कुछ लघुकथाओं के सृजन के बाद चार -पाँच साल का अंतराल रहा। आगरा में ही पत्र-पत्रिकाओं से लघुकथा विषयक कुछ पुस्तकों की जानकारी मिलने पर मैंने कुछ पुस्तकें डाक से मँगाई। इन प्राप्त पुस्तकों में सतीशराज पुष्करणा की सम्पादित पुस्तक –‘लघुकथा बहस के चौराहे पर’ भी थी। इस पुस्तक से मुझे उस दौर में सक्रिय लघुकथा लेखकों और लघुकथा के शास्त्रीय पक्ष की जानकारी प्राप्त हुई। पुष्करणा जी के नाम और काम से यह मेरा पहला परिचय था।

इसी दौर में सारिका के लघुकथा विशेषांक में मेरी लघुकथा ‘डरे हुए लोग’ प्रकाशित हुई, जो काफी सराही गई। मेरे पास ‘मिनीयुग’ के संपादक जगदीश कश्यप का पत्र आया। बाद में  मुझसे मिलने के लिए उनका बरेली आना हुआ और उनके प्रस्ताव पर मैं मिनियुग के संपादक- मंडल में शामिल भी हुआ। इसी घटनाक्रम के बीच मेरा और पुष्करणा जी का पत्राचार भी चलता रहा। ‘काशें’ के लिए उन्होंने मेरी कुछ लघुकथाओं की स्वीकृति भेजी। मेरी एक आदत बहुत ख़राब थी- मैं पत्रोत्तर देने में बहुत लापरवाह रहा हूँ, लेकिन पुष्करणा जी  की तारीफ करनी होगी कि मेरी इस लापरवाही के कारण वे कभी खफा नहीं हुए और उनका पत्र लिखने का सिलसिला बना रहा। अपने एक संस्मरण में उन्होंने इस्से सम्बद्ध एक टिप्पणी भी की है –

‘मेरे पटना लौटने के पश्चात् हमारे मध्य पत्राचार का सिलसिला चला, जिसमे सुकेश कि गति अक्सर धीमी ही रही; किन्तु भावनाओं  की गर्मी में कभी कमी नहीं आई।’

      पुष्करणा जी के पत्र सारगर्भित और स्नेह से ओतप्रोत होते थे। कुछ ही दिनों में उनके स्नेहपूर्ण पत्राचार और लेखन/संपादन के कारण उनके लिए मेरे ह्रदय में विशिष्ट स्थान बन गया था।

‘मिनीयुग’ से जुड़ने के बाद मेरा गाज़ियाबाद (जगदीश कश्यप) और दिल्ली (कुलदीप जैन ) यहाँ आना जाना होता रहता था। इसी दौर में पटना से नरेंद्र प्रसाद ‘नवीन’ और कासिम खुर्शीद का दिल्ली आगमन हुआ।  कुलदीप जैन के निवास पर जगदीश कश्यप,अखिलेन्द्र पाल  सिंह, बलराम अग्रवाल और मेरा मिलना हुआ। हम लोगों के बीच लघुकथा और साहित्य को लेकर विस्तृत चर्चा हुई,जो काफी सार्थक रही। चर्चा के मध्य किसी न किसी रूप में सतीशराज पुष्करणा जी और उनकी भावी योजनाओं का जिक्र आता रहा। नवीन जी और भाई कासिम खुर्शीद ने पटना पहुँचकर इस महत्त्वपूर्ण साहित्यिक-चर्चा के बारे में पुष्करणा जी से  भी चर्चा की थी। इस बारे में पुष्करणा जी ने पोस्टकार्ड से मुझे अवगत भी कराया था।

अप्रैल 1984 का दिन था, मैं कमला नगर स्थित अपने कार्यालय में बैठा था। चपरासी ने कक्ष में आकर बताया कि पटना से कोई आए हैं। मुझे ख़ुशी भरी हैरानी हुई-पुष्करणा जी और आगरा में! मैं उनसे मिलने के लिए बाहर की ओर लपका। सामने से प्रसन्नता से भरे पुष्करणा जी आते दिखे और करीब पहुँचकर पूरी गर्मजोशी से हम मिले।

यह मेरी सतीशराज पुष्करणा जी से पहली मुलाकात थी। तब मुझे यह आभास  नहीं था कि मैं तन-मन-धन से विधा के प्रति  समर्पित लघुकथा के भावी पुरोधा से मिल रहा हूँ। उनके साथ लगभग पाँच वर्ष की एक बच्ची थी और साथ में उनके हमउम्र  साथी थे, जिनका  परिचय उन्होंने अपने बाल सखा राजेंद्र मोहन त्रिवेदी ‘बन्धु’ के रूप में कराय , साथ में कनिष्ठ  बेटी निक्की (क्षमा पुष्करणा) थी। दो तीन मिनट की बातचीत में ही मैं उनके व्यक्तित्व से प्रभावित हो गया था। मैं उनके सत्संग का पूरा लाभ उठाना चाहता था,जो कार्यालय में संभव नहीं था। मेरा घर कार्यालय से पाँच मिनट की दूरी पर था। अपने अपने अधीनस्थ को आवश्यक निर्देश दिए और उन सबके साथ निवास पर आ गया।

तब हमारी कोई संतान नहीं हुई थी। पत्नी रीता से सबका परिचय कराया। कुछ ही घंटों के सानिध्य में पुष्करणा जी के आत्मीय व्यवहार ने मन मोह लिया।

थोड़ी देर बाद पुष्करणा जी ने प्रख्यात साहित्यकार रावी जी से मिलने की इच्छा जताई। मैं रावी जी के नया नगर स्थित आवास पर कई बार जा चुका  था। मैं बेरोक- टोक उनसे मिल लेता था। उनमें  खास बात यह थी कि लघुकथा के प्रसिद्ध लेखकों के नाम वे जानते थे, कुछ कि रचनाएँ भी पढ़ी हुई थीं। अमर उजाला में प्रकाशित मेरी लघुकथा ‘चतुर गाँव’ उन्हें बहुत पसंद थी। पुष्करणा जी के नाम से वे परिचित थे।

जब हम लोग रावी जी से मिलने गए, तो वह भोजन कर रहे थे,जो समाप्ति पर था।

पुष्करणा जी और रावी जी में बातचीत हो रही। मैं पुष्करणा जी के संतुलित और अनुशासित संवाद  ध्यान से सुन रहा था।

बातचीत के क्रम में पुष्करणा जी ने उनसे पूछा कि आज तक वह जिस साहित्यकार के निवास पर गए हैं, उसके कमरे में किताबों का भंडार देखने को मिला, पर आपके कमरे में तो एक पुस्तक भी नहीं दिख रही है। रावी जी का उत्तर मुझे मालूम था;क्योंकि मैं भी यह सवाल उनसे पूछ चुका था। पुष्करणा  जी का प्रश्न सुनकर उनके होठों पर रहस्यमयी मुस्कान दिखाई दी। उन्होंने अलमारी के सबसे ऊपर रखे काले रंग के बक्से की ओर देखा ,फिर बोले- “किताबों की क्या जरूरत है? मैं जब लिखने बैठता हूँ, तो आकाश की ओर देखता हूँ। मुझे सबकुछ वहीं लिखा हुआ दिखाई देता है। बस उसी को उतार देता हूँ।”

रावी जी से मिलने के बाद लौटते हुए उनके साहित्य पर चर्चा होती रही। हम लोग एकमत थे कि उनके कथन में कोई -न -कोई दर्शन अवश्य रहा होगा। उनकी पुस्तक ‘मेरे कथा गुरु का कहना है’ पर भी चर्चा हुई, जिसमें प्रकाशित कथाओं के निहितार्थ समझना हर किसी के बस की बात नहीं है। गौर करने की बात यह भी थी कि घूम- फिरकर हमारी चर्चा के केंद्र में लघुकथा आ जाती थी।

पुष्करणा जी को ‘युवक’ मासिक के ‘गोपाल सिंह नेपाली’ अंक विशेष की तलाश थी। हम जीवनी मण्डी खोजते हुए पत्रिका के कार्यालय पहुँचे। मुझे याद है – वह अंक  नहीं मिल सका था; लेकिन यह महत्त्वपूर्ण जानकारी मिली थी कि कभी यहीं से ‘सैनिक’ समाचार-पत्र प्रकाशित होता था, जिसका संपादन सच्चितानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ जी करते थे।

कहना न होगा कि पुष्करणा जी से पहली भेंट में हमारी बातचीत लघुकथा के विभिन्न पक्षों पर केंद्रित रही,जिससे मैंने खुद को काफी समृद्ध महसूस किया।

पहली मुलाकात के बाद मेरे और पुष्करणा जी के बीच आत्मीय सम्बन्ध प्रगाढ़ होते गए। इसी बीच मेरा तबादला आगरा से बरेली हो गया। विचित्र संयोग था कि पुष्करणा जी का स्थायी निवास भी बरेली में था और पटना से उनका आना- जाना बना रहता था। पुष्करणा जी के माता -पिता जी का भरपूर स्नेह भी मुझको मिलने लगा। हमारे सम्बन्ध पारिवारिक हो गए।

1984 की पहली मुलाकात से लेकर 28जून 2021,उनके आखिरी साँस लेने तक हमारा संग-साथ रहा। वे साहित्य  सम्बंधित बातों से लेकर घर -परिवार की हर बात मुझसे साझा करते थे। ये सम्बन्ध दोनों तरफ से थे। इन 37 वर्षों की साहित्य -यात्रा में इतना कुछ घटा है कि लिखने लगूँ, तो पूरी किताब तैयार हो जाएगी और बहुत से महारथियों के चेहरों से मुखौटे उतर जाएँगे। इन विषयों पर अलग से कभी लिखूँगा; लेकिन यह देखकर बहुत दुःख होता है कि पटना सम्मेलन को लेकर देश के दूसरे लघुकथा मंचों पर भ्रांतियाँ फैलाई गईं। पटना में आयोजित अधिकतर सम्मेलनों में मैंने और काम्बोज  जी ने शिरकत की है। हम साक्षी रहे हैं कि पुष्करणा जी ने कभी भी पटना मंच का गलत इस्तेमाल नहीं किया और न ही किसी कथाकार की निंदा की। लघुकथा का हित ही उनका उद्देश्य रहा। यहाँ एक घटना का  उल्लेख करना जरूरी लगता है।अपने एक संस्मरण में पुष्करणा जी लिखते हैं –     

“मैंने ऊपर सुकेश और हिमांशु जी  के संपादन में ‘आयोजन’पुस्तक की चर्चा की है। वस्तुतः यह मात्र पुस्तक नहीं, अपने आप में एक ऐसा ‘आयोजन’ है जिसमें लघुकथा-इतिहास का एक अति महत्त्वपूर्ण कि अध्याय छिपा है, मेरा सौभाग्य कि मैं भी उसका एक अहम हिस्सा रहा हूँ।”

पटना में 23-24 अप्रैल 1988 में पहला लघुकथा-सम्मेलन इतना सफल हो चुका था कि उसे ‘लघुकथा का महाकुंभ’ की संज्ञा से विभूषित किया गया। इस सम्मेलन में डॉ. शंकर पुणतांबेकर, भगीरथ, सुकेश साहनी,  बलराम अग्रवाल, कुलदीप जैन, जगदीश कश्यप, डॉ० स्वर्ण किरण इत्यादि लगभग दो सौ लघुकथाकार इस द्विदिवसीय समारोह में उपस्थित हुए थे।

इसके बाद जगदीश कश्यप के सुझाव पर सुकेश साहनी, रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ एवं अरविन्द बेलवाल के संयुक्त संयोजकत्व में 11-12 फरवरी 1989 में दो दिवसीय सफल सम्मेलन हुआ। यह सम्मेलन पटना से थोड़ा भिन्न था। इस सम्मेलन में पढ़ी गई लघुकथाओं के उपरान्त विभिन्न लोगों द्वारा उनकी समीक्षा की गई थी। इस पूरे सम्मेलन को सुकेश ने टेप रिकॉर्डर में रिकॉर्ड किया। यही टेप रिकार्ड किया गया समारोह ‘आयोजन’ पुस्तक में ज्यों- का- त्यों छाप दिया गया था।’

बरेली सम्मलेन का यह प्रयोग किसी सम्मलेन में फिर दोहराया नहीं जा सका। ‘आयोजन’ का महत्त्व इस दृष्टि से भी बढ़ जाता है कि इसमें किसी भी वक्ता द्वारा की गई टिप्पणी से कोई छेड़छाड़ नहीं की गई थी।

पुष्करणा जी हमें ‘आयोजन’ के द्वितीय संस्करण निकालने के लिए निरंतर प्रेरित करते रहते थे। अंततः हमने इसका द्वितीय संस्करण निकालने का निर्णय लिया; लेकिन यह वही समय था, जब पुष्करणा जी हर्निया का ऑपरेशन करा चुके थे और इसके बाद हृदय रोग से लड़ रहे थे। बीमारियों से लड़ते हुए भी वे साहित्यिक गतिविधियों के बारे में जानने को उत्सुक्त रहते थे। हमने उन्हें आयोजन के दूसरे संस्करण के बारे में बताया, तो बहुत प्रसन्न हुए। हमें क्या पता था कि अभी वज्रपात होना था। उनके बच्चों से हमें उनके कैंसर- ग्रसित होने का समाचार मिला, तो हमें भी निराशा ने घेर लिया। फ़ोन पर बच्चों से जानकारी मिलती रहती थी, हालत बिगड़ रही थी।

हिमांशु जी ने संजय (अयन प्रकाशन) से तत्काल पाँच प्रतियां मँगवाई थीं। हमें बिलकुल आभास नहीं था कि वे इतनी जल्दी चले जाएँगे। मैंने एक प्रति ब्लू डार्ट से उन्हें भेज दी।अगले दिन गिन्नी (पुष्करणा जी की बेटी ) से हालचाल पूछा, तो पता चला की वे आँख नहीं खोल रहे और बहुत कमजोरी  महसूस कर रहे हैं। अन्ततः28 जून 2021 का वह दिन हमारे लिए मनहूस साबित हुआ। समाचार मिला- पुष्करणा जी  नहीं रहे, लघुकथा का पुरोधा नहीं रहा।

बाद में गिन्नी से पता चला  कि अंतिम समय में जब वे आँख नहीं खोल रहे थे,न ही बात कर पा रहे थे। कूरियर से ‘आयोजन’ की प्रति पहुँची। गिन्नी ने ऊँची आवाज में कहा, ‘‘देखिए सुकेश भैया ने किताब भेजी है आपको!’’

चौंककर अधमुँदी आँखों से उन्होंने “आयोजन” की प्रति की ओर  देखा और अंतिम साँस ली।

मेरे अग्रज और लघुकथा के पुरोधा पुष्करणा जी को शत-शत नमन !  

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