जून 2026

मेरी पसन्दलघुकथा का सम्मोहन     Posted: November 1, 2020

कैसा है इस विधा का सम्मोहन कि वर्तमान युग में हर व्यक्ति इससे जुड़ना चाहता है, चाहे रचनाकार के रूप में, या फिर पाठक के रूप में! क्या कारण है कि लघुकथा आज के दौर की सर्वाधिक लोकप्रिय विधाओं में से एक है? क्या इसलिए कि इसका आकार छोटा है, सारगर्भित है, अत्यंत प्रभावशाली है…या इसलिए कि वास्तविकता के धरातल पर होने के उपरांत भी इसमें संवेदना की ऐसी कलात्मक सृष्टि है कि पाठक मंत्रमुग्ध हो उसमें न केवल भीगता है; अपितु गहन चिंतन के सागर में कब गोते खाने लगता है, उसे स्वयं बोध नहीं होता। !ये दोनों ही कारण हैं जो किसी भी पाठक का मन मोह लेने में पर्याप्त हैं!

पिछले कई वर्षों में लघुकथा.कॉम और अन्य वरिष्ठ पत्रिकाओं के माध्यम से, कई सम्मानीय और बहुचर्चित लघुकथाकारों को पढ़ने का सौभाग्य मिला। रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ जी की ‘नवजन्मा’ और ‘ऊँचाई’, सुकेश साहनी जी की ‘गोश्त की गंध’ और ठंडी रजाई, श्याम सुंदर अग्रवाल जी की ‘माँ का कमरा ‘और ‘वापसी’, कृष्णा वर्मा जी की ‘हैप्पी मदर्स डे’, सुधा गुप्ता जी की ‘कन्फेशन’, इन उम्दा रचनाओं से भला कौन-सा लघुकथा-प्रेमी अपरिचित होगा!’मेरी पसन्द’ के अंर्तगत आज ऐसी दो लघुकथाओं की चर्चा करना चाहूँगी जो, पढ़ने के बहुत देर बाद तक भी, मेरे साथ ही रह गईं।

प्रथम रचना है श्री सुरेश शर्मा जी की, ‘उसके बिन’।  यह एक बड़े ही साधारण से प्रतीत होने वाले दादा की अपने पोते के प्रति प्रेम और अपनत्व की असाधारण कथा है। जब भी वे लिखने बैठते हैं, तो- कभी चश्मा झपट लेना, कभी टाँगों से लिपटना,  जैसी नन्हें पोते की अटखेलियाँ उन्हें खूब उलझाए रखती हैं; परन्तु इससे न तो उनकी तन्मयता और चिन्तन- धारा ही भंग होती, और न ही उन्हें कोई असुविधा महसूस होती, बल्कि उनकी लेखनी को मानो और अधिक गति और ऊर्जा मिल जाती  है। देखते ही देखते उनका लेख पूर्ण हो जाता। नन्हे शिशु का सान्निध्य और उसकी बाल-क्रीड़ाएँ उन्हें ऐसा सुख -संतोष और ऊर्जा प्रदान करती  हैं कि ‘उसके बिन’ उनका जीवन अकल्पनीय था। एक दिन समाचार-पत्र की माँग पर किसी प्रंसग विशेष पर लेख लिखकर शाम तक तैयार करना था । प्रेस से दो बार फोन आ चुके थे । बहू ने सोचा यह शैतान चैन से काम नहीं करने देगा; इसलिए वह अपने पापा के यहाँ ले जाती हूँ। शाम तक लौट आऊँगी। तब तक आपका काम भी निपट जाएगा। पौत्र के चले जाने के बाद तो दादाजी के लिए  यूँ तो बड़ा सुनहरा अवसर होता है, एकांत और शांत में अपना लेख पूरा करने का। घर में छाया सन्नाटा उन्हें इस प्रकार विचलित कर देता है कि वे कुछ लिख ही नहीं पाते। अंत में बहू को वापस आने के लिए   फ़ोन मिलाने लगते हैं। अथाह प्रेम को  इतनी सहजता से प्रस्तुत करने के लिए कहानी मार्मिक बन गई है/

दूसरी लघुकथा, सुश्री अपराजिता जग्गी द्वारा रचित ‘’भेड़ियों के बीच’‘ है। यह एक ऐसी अभागी लड़की की कथा है जिसके साथ दुराचार यूँ तो केवल एक ही बार होता है;  परन्तु उसकी भयंकर पीड़ा उसे दिन प्रतिदिन सहनी पड़ती है। जब भी वह कहीं निकलती, तो लोग अभद्र टिप्पणी करते ताने कसते, उसके चरित्र पर उँगली उठाते, उसके पहनने ओढ़ने, आचरण पर प्रश्न करते। बस किसी न किसी तरह से उसे ही दोषी ठहराने और आहत  करने का प्रयत्न करते हैं। अधिक शोचनीय बात यह कि ऐसा संत्रास देने वालों की गिनती में कई अन्य स्त्रियोँ भी हैं, जो अमर्यादित व्यवहार में बढ़-चढ़कर भाग लेती हैं। वह बेचारी पल-पल एक मूक दर्शक की भाँति अपने अस्तित्व और मान-सम्मान को तार- तार होते देखती!

उसका मन अंदर ही अंदर चीखता, स्त्री – जिसे कोख प्राप्ति का वरदान मिला है, प्रसव पीड़ा झेलने की क्षमता मिली है, वह एक अन्य स्त्री के लिए इतनी निर्मम और संवेदनहीन कैसे हो सकती हैं? इतनी कठोरता, इतनी कटुता आखिर क्यों? क्या औरत ही औरत की सबसे बड़ी शत्रु है? क्या उस दुराचारी के साथ- साथ इन सब लोगों को कोई सज़ा नहीं मिलनी चाहिए,जो रोज़-रोज़ इस व्यभिचार का हिस्सा बनते जा रहे हैं। यदि हाँ तो क्या होनी चाहिए इनकी सज़ा..? अपराजिता जी ऐसे ही कई तीखे सवालों के घेरे में  समाज के असहिष्णु वर्ग को खड़ा कर देती हैं । मन इस बात से द्रवित हो जाता है कि क्या समाज का कोई दायित्व नहीं बनता? बहिष्कार अवश्य होना चाहिए- दरिंदों का और उनकी दरिंदगी का, और ऐसी अभद्र और निम्न स्तर की सोच रखने वाले समाज का, न कि एक मासूम संत्रस्त अबला का! ।यदि हम उसके दर्द में सहभागी बने, उसका आत्मविश्वास बढाएँ , उसको यह यकीन दिलाएँ कि जो हुआ, उसमे उसका कोई कुसूर नहीं है, तो न केवल उसका हौसला बढ़ेगा, और समाज मे एक बार फिर उसके मान- सम्मान की प्रतिष्ठा होगी, अपितु कुकर्मियों का हौसला भी घटेगा ! वर्ना बेचारी पूरा जीवन केवल एक भेड़िये की शिकार न होकर,  अपने को सदा अनगिनत ‘भेड़ियों के बीच’ ही पाएगी। अल्प में अपार परोसने के लिए अपराजिता जी भी बधाई की पात्र हैं।

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1-उसके बिन/  सुरेश शर्मा

वह जब भी कुछ लिखने बैठते, दो साल का पोता उनके पास चला आता । कभी टेबल के नीचे घुसकर उनकी टाँगों से लिपट कर खरोंचता रहता, कभी पेन या चश्मा झपट लेता । उसकी इन बाल सुलभ चंचलताओं के मध्य उनका कार्य भी निबट जाता था ।

आज सुबह से ही बिना नहाए-धोए वे लिखने में व्यस्त थे । समाचार-पत्र की माँग पर किसी प्रंसग विशेष पर लेख शाम तक तैयार करना था । प्रेस से दो बार फोन आ चुके थे ।

घर के सारे काम निपटाकर बहू ने कहा-‘पिताजी, यह शैतान आपको चैन से काम नहीं करने देगा । मैं इसको पापा के यहाँ ले जाती हूँ। शाम तक लौट आऊँगी। तब तक आपका काम भी निपट जाएगा।

उसको गए दो घण्टे से ज़्यादा हो चुके थे । घर सूना था। एकदम शान्त ! फिर भी लेख आगे नहीं बढ़ पा रहा था। विचारों के घोड़े लेख की बजाय बहू के घर की ओर दौड़ने लगते। वह मेरे पास आने के लिए मचल तो नहीं रहा होगा ? उनका ऊबड़-खाबड़ आँगन है, भाग-दौड़ में कहीं गिरा तो नहीं होगा ? बहू तो है ही बातूनी । फिर माँ-बेटी मिल जाने पर बच्चे की चिन्ता रहेगी उसे ? उन्होंने सोचा कि विचारों के घोड़े इसी तरह बहू के घर के चक्कर काटते रहे , तब तो यह लेख पूरा होने से रहा ।

आखिर उससे रहा नहीं गया । वे फोन उठाकर बहू के घर का नम्बर मिलाने लगे ।

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2-भेड़ियों के बीच/  अपराजिता जग्गी

“अरे ये वही है न ! जिसकी इज्जत लूटी गई थी ?”

हाँ वही लग रही है। सारे कपडे फटे बिलकुल वस्त्रहीन मिली थी।

बेचारी के साथ बेहद ग़लत हुआ ! इससे तो अच्छा इसे मौत जाती। माँबाप की इज़्ज़त भी धूल में मिल गई

अरे आग बिना धुवाँ कहाँ। इसी के साथ क्यों हुआ ? ऐसे ही बनीठनी घूमती थी पहले भी।

सोनू के पापा तो कह रहे थे कि इसका पुराना याराना था उस लड़के के साथ। पकड़ी गयी ,तो रेप कह दिया।

ये आजकल की लड़कियाँ कपडे भी तो कैसे पहनती हैं। खुद ही आफत को न्यौता देती हैं

भाई मजे तो इसे भी आए होंगे। अब तो और चटक माल लग रही है।

इसकी माँ भी पागल है मेरे भाई का रिश्ता माँग रही थी। हम पागल हैं क्या जो ऐसी लड़की को ब्याह लाएँ।

पगलाने लगी है वो इन फुसफुहाटों को सुनसुनकर।

अब यही सोचती रहती हैउस लड़के ने जो किया वह बुरा था, पर उसके बाद जो पूरी दुनिया अपनी  नज़रों और अपनी आवाज़ों से शरीर को भेदती है ;चरित्र को तारतार करने में लगी रहती है;उस दिनरात लगातार चलते रेप की सजा क्या होनी चाहिए ??

कुत्ते को मृत्युदंड तो भेड़ियों को क्या ????

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