लघुकथा का इतिहास लगभग पचास वर्ष पुराना है। इस अर्ध शताब्दी में लघुकथा ने सृजन के अनेक पक्ष देखे हैं। आज लघुकथा ने सृजन,मनन, चिंतन, समालोचन के वैराट्य को छुआ है। अपने आरंभ से
लेकर आज तक यद्यपि इसकी काया छोटी ही रही है, तथापि कम से कम शब्द- योजना में अधिक से अधिक भावबोध भरने का काम और नाम लघुकथा का है। लघुकथा की यही विशिष्टता उसे साहित्य की अन्य विधाओं से अलग करती है। प्रसन्नता की बात है कि आज लघुकथा में सृजन के साथ-साथ सिद्धांत का भी स्थान निर्धारित है। अनेक वरिष्ठ लेखकों के साथ नये लेखक भी लघुकथा- सर्जन में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। स्थापित लघुकथाकारों से यह भी आशा की जाती रही है कि वे अपने अनुभवों को समय-समय पर साहित्य समाज में बांटते रहें। संतोष की बात यह है कि इस दिशा में कुछ सकारात्मक कदम उठे हैं। लघुकथा के सिद्धांतों पर आधारित कुछ महत्त्वपूर्ण कृतियाँ पिछले पांच-सात वर्षों में आती रही हैं। वरिष्ठ लघुकथाकार सुकेश साहनी की नवीन पुस्तक ‘लघुकथा-सृजन और रचना कौशल’ इस प्रक्रिया में एक महत्त्वपूर्ण कड़ी कही जा सकती है।
सुकेश साहनी अपने समीक्षापरक आलेखों के माध्यम से यहाँ लघुकथा के वैचारिक और चिंतन पक्ष को सामने लाने का प्रयास करते हैं। सुकेश साहनी के चिंतन के चार बिंदु लघुकथा के संदर्भ में महत्त्वपूर्ण हैं–लघुकथा के रचनात्मक पहलू पर विचार और मंतव्य, विभिन्न विषयों पर केंद्रित लघुकथाओं की गुणधर्म के आधार पर समालोचना, कथादेश की वार्षिक लघुकथा प्रतियोगिता में निर्णीत रचनाओं के माध्यम से सृजनप्रक्रिया और रचनाकौशल पर महत्त्वपूर्ण टिप्पणियाँ तथा स्थापित कथाकारों की चुनिंदा लघुकथाओं की गुण-दोष पर आधारित समीक्षाएँ।इन मुख्य चार चिंतन बिंदुओं को आधार बनाकर प्रस्तुत पुस्तक में कुल उन्नीस आलेख लिखे गए हैं।
लघुकथा सृजन की रचना प्रक्रिया दर्शाते हुए साहनी जी महत्त्वपूर्ण बात कहते हैं,“जीवनयात्रा के विभिन्न पल छोटे-छोटे एहसासों के रूप में दिलोदिमाग पर छा जाते हैं। अनुकूल परिस्थितियाँ पाते ही जब इनमें साहित्यिक रूप के साथ जीवन का गर्म लहू दौड़ने लगता है, जब उसके साथ उससे संबंधित कुछ विचार व्यवस्थित होकर घुलमिल जाते हैं; तभी लघुकथा कागज़ पर उतरती है।” सरल शब्दों में एक मार्मिक बात साहनी जी यहाँ प्रस्तुत करते हैं। प्रायः लघुकथा को कथा के साथ ‘लघु’ शब्द जुड़ा होने के कारण कहानी का छोटा रूप मान लिया जाता है। आलेख ‘कहानी का बीज रूप नहीं है लघुकथा’ में इसे स्पष्ट किया गया है,“यह भ्रम की स्थिति भी दूर होनी चाहिए कि जिन विषयों पर लघुकथाएँ लिखी गई हैं, उन पर कहानी नहीं लिखी जा सकती। लघुकथा के साथ जुड़े लघु शब्द को उसके शाब्दिक अर्थ में न समझा जाए, बल्कि आकारगत लघुता की दृष्टि से देखा जाए।”
लघुकथा के आरंभ से आज तक अनेक विषयों पर आधारित लघुकथाओं का सृजन किया गया है। समाज का कोई भी पक्ष लघुकथा से अछूता नहीं रह पाया है। विभिन्न लेखकीय आयाम लघुकथा को सृजन विस्तार प्रदान करते हैं। सुकेश साहनी इन आयामों की यहाँ गहराई से पड़ताल करते हैं।वे मुख्यत: चार सामाजिक आधार चुनते हैं, जिन पर सशक्त लघुकथाएं लिखी गई हैं। स्त्री-पुरुष सम्बंध, महानगर, देह व्यापार, बाल मनोविज्ञान–इन चार आधारों पर केंद्रित लघुकथाओं के गुण-दोषों की विस्तृत समालोचना यहाँ द्रष्टव्य है। इन समालोचनाओं में लघुकथाओं के सौंदर्यबोध, उनका कथानक, शीर्षक उपयुक्तता, शिल्प संरचना जैसे विषयों पर कलम चलाई गई है। ‘महानगर की लघुकथाएँ’ आलेख में साहनी जी के विचार हैं,“अर्थप्रधान महानगरीय सभ्यता में सम्बंधों की शिथिलता पर केंद्रित बहुत-सी लघुकथाएँ लिखी गई हैं। महानगर का आदमी केवल अपने विषय में सोचता है।” इन महानगरीय जीवन की लघुकथाओं में मानव मूल्यों हेतु संघर्ष, अर्थ लोलुपता, झूठे सम्बंध, कुंठित जीवन, कलुषित राजनीति आदि तत्वों पर आधारित अनेक लघुकथाकारों की लघुकथाओं को साहनी जी ने चुना है और उनकी विवेचना की है।
देह व्यापार पर केंद्रित लघुकथाओं वाले आलेख में साहनी जी इस संवेदनशील मुद्दे पर अपनी कलम चलाते हैं। वेश्यावृत्ति का विश्वव्यापी तंत्र किस प्रकार स्त्री को एक वस्तु या कीमत में तब्दील कर देता है,यहाँ जाना जा सकता है।पति-पत्नी सम्बंधों के बिगड़ने पर भी अनेक स्त्रियों को ऐसा जीवन यापन करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। वहीं कुछ शौक को पूरा करने वाली लड़कियाँ भी इस काम को करती हैं। साहनी जी इस समस्या को यूँ दर्शाते हैं, “वेश्याओं के प्रति संवेदनापूर्ण व्यवहार, उनके सामाजिक स्वीकार की कोशिश, उनके प्रति एक मानवीय दृष्टि, सम्मानपूर्ण नागरिक अधिकार और उनके लिए रोजी-रोटी का विकल्प तैयार करना आदि किसी भी सरकार की जिम्मेदारी होते हैं; जिन्हें पूरा करने के लिए पुलिस, प्रशासन और नेताओं का सहयोग अपेक्षित होता है। वास्तव में लघुकथा ऐसे ज्वलंत सामाजिक मुद्दों को न केवल पाठकों के समक्ष ला रही है बल्कि उन्हें व्यापक विमर्श का केंद्रबिंदु भी बना रही है।
बच्चे किसी भी राष्ट्र के कर्णधार हैं। उनके पालन की प्रवृत्तियों पर आधारित अनेक लघुकथाएँ लिखी गई हैं।बाल मनोविज्ञान बच्चों के शारीरिक-मानसिक चिंतन की अभिव्यक्ति करता है। सुकेश साहनी ‘बाल मनोविज्ञान पर आधारित लघु कथाएँ’ आलेख में इस दिशा में किए गए कार्यों का समीक्षात्मक अनुशीलन प्रस्तुत करते हैं। संतोष की बात यह भी है कि लघुकथा ने बालविमर्श को भी अपना स्वर प्रदान किया है। बाल मनोविज्ञान पर आधारित अनेक लघुकथाएँ बच्चों के सामाजिक, नैतिक, शैक्षिक जीवन को संवारने में पर्याप्त उपयोगी हैं।
रचनाकार यदि वरिष्ठ है तो उससे यह अपेक्षा भी की जाती है कि वह अपने पीछे आने वाले लेखकों को सही मार्गदर्शन प्रदान करे। सौभाग्य से सुकेश साहनी अपने दायित्व को बखूबी निभाते आ रहे हैं। अनेक लघुकथा प्रतियोगिताओं के आप निर्णायक मंडल में रहे हैं। ‘कथादेश’ मासिक पत्रिका की प्रतिवर्ष सम्पन्न होने वाली लघुकथा प्रतियोगिता के आप निर्णायक रहे हैं। प्रतिवर्ष सैकड़ों की संख्या में प्राप्त होने वाली लघुकथाओं में से सर्वश्रेष्ठ पाँच लघुकथाओं का चयन करना आपको नीर-क्षीर विवेकी सिद्ध करता है। पुस्तक के नौ आलेखों में प्रत्येक वर्ष सम्पन्न इस प्रतियोगिता की पूरी रिपोर्ट क्रमश: प्रस्तुत की गई है। किन आधारों पर वह लघुकथा चुनी गई, उसकी गुणवत्ता की क्या-क्या कसौटियाँ हैं; इन सबका विवेचन यहाँ उपलब्ध है। साहनी जी लघुकथा सृजन के मर्म को इन शब्दों में समझाते हैं, “लघुकथा को सुगठित होना चाहिए, उसमें दोहों जैसी बारीक खयाली होनी चाहिए। लघुकथा को सांकेतिक, प्रतीकात्मक या अभिव्यंजनात्मक होना चाहिए। कथ्य प्रकटीकरण का समायोजन सशक्त होना चाहिए। लघुकथा को चरमोत्कर्ष पर समाप्त होना चाहिए आदि न जाने कितने निकष हैं, जिन पर लघुकथा को खरा उतरना चाहिए। आम पाठक के लिए इन बातों का कोई महत्त्व नहीं है। उसे तो रचना पढ़कर मुकम्मल कृति का स्वाद मिल गया तो रचना सफल अन्यथा बेकार। लेकिन लघुकथा लेखन में लगे रचनाकारों को इन बिंदुओं पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।” अन्य आलेखों में कथोपकथन की रूपरेखा, शीर्षक, समापन, कालदोष जैसे महत्त्वपूर्ण तत्वों को उठाया गया है। वास्तविकता तो यह है कि ये नौ आलेख लघुकथा लिखने की ‘प्रैक्टिकल अप्रोच’ हैं, जिनके सम्यक् पालन से लघुकथा सृजन की बारीकियों को जान-समझा जा सकता है। उल्लेखनीय तथ्य यह भी है कि साहनी जी सृजन के साथ-साथ शास्त्र के भी धनी हैं और रचना कौशल के मूल तत्वों को भलीभांति समझाना भी जानते हैं।
अपने स्वाध्याय को पुष्ट करते हुए साहित्यकार अपने वरिष्ठ व समकालीन रचनाकारों को भी पढ़ता-गुनता है। इससे उसकी पाठकीयता और लेखनशक्ति– दोनों में ही गुणात्मक अभिवृद्धि होती है। साहनी जी ने विश्व की अनेक भाषाओं की लघुकथाओं का अनुवाद भी किया है। प्रस्तुत पुस्तक में आपने खलील जिब्रान, राजेंद्र यादव, रामेश्वर काम्बोज, डॉ. श्यामसुंदर दीप्ति की लघुकथाओं का विवेचनात्मक अनुशीलन प्रस्तुत किया है। लेबनानी लेखक खलील जिब्रान की लघुकथाएँ वर्तमान समय की धरोहर हैं।आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री के शब्दों में,“मैं खलील जिब्रान को लघुकथा का जनक मानता हूँ। खलील जिब्रान के पास जो अंतर्दृष्टि है, उच्च कोटि की प्रतिभा है, मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि वर्तमान में हमारे यहाँ अभी किसी के पास नहीं है।” साहनी जी खलील जिब्रान की लघुकथाओं को कुल छ: श्रेणियों में वर्गीकृत करते हैं– सामाजिक असमानता और शोषण के खिलाफ संघर्ष के लिए प्रेरित करती लघुकथाएँ; धर्मांधता-कुरीतियों के विरुद्ध लिखी लघुकथाएँ; कूपमंडूक सोच-समाजिक जड़ता के विरुद्ध लिखी लघुकथाएँ; जीवन की विसंगतियों पर प्रहार करती लघुकथाएँ; मानवकल्याण एवं विश्वबंधुत्व का संदेश देती लघुकथाएँ;स्त्री-पुरुष सम्बंधों की लघुकथाएँ। प्रस्तुत आलेख में उपरोक्त छ: श्रेणियों के अंतर्गत खलील जिब्रान की अनेक प्रसिद्ध लघुकथाओं का विवेचन अत्यधिक सतर्कता, सजगता, श्रम और व्यापक समीक्षात्मक दृष्टिकोण के साथ किया गया है। स्वयं साहनी जी के शब्दों में,“लघुकथा के विद्यार्थी के रूप में मैं इन कथाओं को बहुत महत्त्वपूर्ण मानता हूँ। इनसे गागर में सागर भरने की तकनीक सीखी जा सकती है।”
राजेंद्र यादव प्रख्यात् कथाकार और सम्पादक रहे हैं। आपने भी लगभग दस-पंद्रह लघुकथाएँ लिखी हैं। परंतु राजेंद्र यादव के शब्दों में,“ मुझे लगा यह विधा बहुत कठिन है। मैं लघुकथा नहीं लिख पाऊँगा। लघुकथा में लेखक मूल स्वर पकड़ता है। बड़ी कहानी को संक्षिप्त करके लिखना लघुकथा नहीं है।” साहनी जी अपने आलेख में राजेंद्र यादव की पंद्रह लघुकथाएँ लेते हैं और उनका परीक्षण लघुकथा की कसौटियों पर करते हैं। उनका निष्कर्ष यह है कि राजेंद्र यादव लघुकथा के मूल स्वर को नहीं पकड़ना चाहते। उन्हीं के शब्दों में,“अपने पार जैसी उत्कृष्ट लघुकथा का लेखक अपनी दूसरी लघुकथाओं में वैसा गहरा प्रभाव नहीं छोड़ पाता। इसी क्रम में रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ जी की लघुकथाओं पर समीक्षात्मक आलेख भी उपयोगी है। उनकी ग्यारह लघुकथाओं को यहाँ विवेचन के लिए चुना गया है। ‘मिन्नी’ मासिक के संपादक डॉ० श्यामसुंदर ‘दीप्ति’ की लघुकथाओं पर आधारित आलेख में साहनी जी का निष्कर्ष उल्लेखनीय है,“डॉ० दीप्ति की लघुकथाएँ अपनी सरलता के कारण अलग से पहचानी जा सकती हैं। उनकी सीधी-सरल भाषा मुंशी प्रेमचंद की कहानियों की याद दिलाती है। प्रत्येक रचना लघुकथा की कसौटी पर खरी उतरती है। लघुकथा के शीर्षक, प्रारंभ और समापन में स्वाभाविक प्रवाह लेखक की विशेषता है जो उसे अपने समकालीन लेखकों से अलग करती है।”
‘लघुकथा: सृजन और रचना कौशल’ पुस्तक न केवल लघुकथा की सैद्धांतिक विवेचना है बल्कि लघुकथा का व्यावहारिक पक्ष भी यहाँ पूर्णतया उजागर हुआ है। लघुकथा लिखने वाले नए चेहरों को इस कृति का आद्योपांत अध्ययन करना ही चाहिए। सुकेश साहनी अपने इन आलेखों में कहीं भी पक्षपाती दृष्टि नहीं रखते। अपनी बात को स्पष्ट शब्दों में बोधगम्य रूप से रखने में वे पूर्णतया सफल रहे हैं। लघुकथा विधा को यह पुस्तक समालोचना की कसौटी पर कसती है और उपयोगी मंतव्य सृजकों, पाठकों और शोधकर्ताओं के समक्ष प्रस्तुत करती है।
लघुकथा- सृजन और रचना कौशल : सुकेश साहनी, प्रकाशन: अयन प्रकाशन, नई दिल्ली-110030, मूल्य: रु. 300/- पृष्ठ: 150, संस्करण: 2019
-0- डॉ० नितिन सेठी , सी-231, शाहदाना कॉलोनी, बरेली _243005( मो. 9027422306)