कलश शब्द ही उस पात्र का प्रतीक है ,जो सदा शुभ संकेत हेतु प्रयुक्त किया जाता है। जब यही शब्द लघुकथा के साथ जुड़ जाए ,तो यह सम्पूर्ण विधा के लिए शुभसंकेत का दावा करता प्रतीत होता है। दावा कितना सटीक है यह साबित करने हेतु ,जिस टूल का प्रयोग किया जाता है ,उसे ही साहित्य की दुनिया में आलोचना या समीक्षा कहते हैं।
विशेषांक ,अर्थात् किसी एक ही विषय, व्यक्ति, विधा या विचार को लेकर किया गया रचनात्मक प्रयोग है और उस प्रयोग को सफलता की कसौटी पर कसने का साधन है -समीक्षा, आलोचना, समालोचना। अपने कार्यों का आकलन किए बिना आगे बढ़ते रहना उत्तरोत्तर विकास को बाधित करता है, जबकि समीक्षात्मक विश्लेषण नए उत्साह के साथ अगली पायदान पर चढ़ने का मार्ग प्रशस्त करता है। किसी भी विशेषांक में उस विधा से सम्बन्धित सामग्री का समावेश होता है ,जबकि यदि वह महाविशेषांक हो ,तो उस विषय से संबंधित लगभग हर सामग्री की अपेक्षा की जाती है।
यहाँ हम बात कर रहे हैं श्री योगराज प्रभाकर व उनके संपादक मंडल के संपादन में प्रस्तुत महाविशेषांक लघुकथा-कलश की। पूर्व में प्रकाशित दो महाविशेषांकों के बाद यह तृतीय अंक है। संपादक मंडल ने तृतीय अंक का पाठकों व विधा के लेखकों द्वारा आकलन कराने का निर्णय लिया है, जो प्रशंसनीय है। वस्तुतः पाठक सबसे बड़ा आलोचक होता है ; किंतु समीक्षा एक पृथक विषय है। यहाँ लघुकथाकारों के लिए समीक्षा के पहलुओं को जानने, समझने व लिखने का एक उपयुक्त अवसर है।
राम स्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार -‘रचना यदि जीवन का अर्थ विस्तार करती है, तो आलोचक रचना का अर्थ विस्तार करता है। दूसरे शब्दों में जीवन के अंतर्द्वंद्व को देखने-परखने में आलोचना दीपक की भूमिका निभाती है।आलोचना रचनात्मक संकेतों को सामाजिक अनुभवों के आलोक में ‘डी-कोड’ करती है। इस तरह जहाँ रचनाकार की रचनाशीलता विराम लेती है ,वहीं से आलोचक का कार्य प्रारंभ होता है। आलोचना साहित्य का शास्त्र नहीं है बल्कि साहित्य का जीवन है जो बदलते सामाजिक सन्दर्भों में बार-बार रचा जाता है। इस प्रकार आलोचना परखे हुए को बार-बार परखती है और जीवन-सम्बन्धों के विकल्प की तलाश में साहित्य और आलोचना की सह-यात्रा जारी रहती है ।’ यह कहना समीचीन होगा कि आलोचना या समीक्षा का कार्य रचना या सम्पूर्ण कृति को सामाजिक सरोकारों, समय परिवर्तन के महत्त्व के साथ ही साहित्य के मानदंडों पर परखना होता है। इससे कृतिकार को उत्साह, विचारों की प्रौढ़ता, रचनात्मक विचारों और शिल्प एवं भाषा के परिमार्जन और परिवर्द्धन की प्रेरणा मिलती है, जबकि पाठक की बोध-वृत्ति का भी परिष्कार होता है|
महाविशेषांक में विधा से संबंधित सभी पूर्ववर्ती, वर्तमान व आगामी आयामों को समाहित करती सामग्री थोड़ी या अधिक मात्रा में उपलब्ध होनी ही चाहिए, जो इस अंक में भी है। लघुकथा कलश का तृतीय महाविशेषांक अनेक अर्थों में अनूठा है। ‘ए-फोर’ साइज़ का अंक, ग्लेज़्ड पेपर में छपा है। प्रिन्टेड अक्षरों का आकार ऐनक व ऐनकरहित दोनों प्रकार के पाठकों के लिए पढ़ना सुगम है। महाविशेषांक में पृष्ठों की संख्या 264 व मूल्य 300 रुपये है।
मुखपृष्ठ पर सुसज्जित उदात्त लहरों के साथ सागर, प्रकाशस्तंभ , नीला आसमान व पखेरू मिलजुल कर एक दास्तान सी कहते प्रतीत होते हैं। लघुकथा विधा रूपी सागर के विलोड़न से निकला कलश ही लघुकथा-कलश है।जिस प्रकार ऊपर आकाश व नीचे गहरा सागर हो ऐसे वीराने में प्रकाशस्तंभ ही मार्गदर्शक की भूमिका निभाता है, उसी प्रकार उम्दा सामग्री से परिपूर्ण यह संकलन लघुकथाकारों के लिए प्रकाशस्तंभ की भूमिका निभाएगा, ऐसा मेरा मत है।
संपादकीय पर दृष्टिपात करें तो एक संपादक के कार्यों में विधा व विशेषांक की विशेषताएँ उद्धृत करने के साथ ही विधा के सम्बन्ध में हो रही सकारात्मक व नकारात्मक गतिविधियों से रूबरू कराना भी अपेक्षित होता है, अपने इस दायित्व का निर्वहन संपादक के तौर पर योगराज प्रभाकर ने बख़ूबी किया है। “सच कहूँ, सुन लेहुँ सबै” -में अधुना समय में लघुकथा को लेकर हो रही राजनीति से आहत मन की पीड़ा है तो वहीं समाधान भी प्रस्तुत किया गया है। विधा के प्रति समर्पित व्यक्ति को सब कुछ दरकिनार करते हुए अपने काम में गंभीरतापूर्वक संलग्न रहना होता है जिसमें वे सफल हैं। संपादकीय में विभिन्न विद्वानों के लघुकथा के कलेवर को लेकर प्रस्तुत विचार काबिले -गौर हैं। लघुकथा के दो बिंदुओं, कालखंड व चरमबिंदु यानी जिसे ‘पंचपंक्ति’ की अवधारणा पर अपने अमूल्य व विस्तृत विचार व्यक्त किए हैं। उनके अनुसार- लघुकथा रचना के मूल में एक बिंदु, एक क्षण होता है अर्थात् अर्जुन की भाँति एक लघुकथा का निशाना भी केवल मछली की आँख पर ही केन्द्रित रहना चाहिए। वहीं वे कहते हैं -अनेक लघुकथाएँ अपनी सटीक पंचपंक्ति के कारण चिरजीवी हो गई हैं। उन्होंने नवलेखकों को गुमराह न होने की सलाह भी दी है। संपादन का काम एक टीमवर्क होता है। उनकी टीम में समायोजित प्रत्येक व्यक्तित्व स्वयं में एक समर्थ लघुकथाकार है व विशेषांक का अवलोकन करते हुए अपने उद्देश्य के प्रति समर्पित व कर्मठ दिखाई पड़ता है।
किसी भी विधा के विकास के लिए उस पर समीक्षात्मक दृष्टिपात व विश्लेषणात्मक अध्ययन होना अतिआवश्यक है। इसी उद्देश्य को दृष्टिगत रखते हुए नवोदित लघुकथाकार महेन्द्र कुमार व वरिष्ठ लघुकथाकार मुकेश शर्मा व कमल चोपड़ा की सात-सात लघुकथाओं की समीक्षा क्रमशः प्रसिद्ध लघुकथाकार व समीक्षक अशोक भाटिया, बी.एल आच्छा व रवि प्रभाकर द्वारा की गई है। इन लघुकथाओं की समीक्षा समीक्षात्मक बिंदुओं के अनेक आयाम खोलती है। महेन्द्र कुमार की लघुकथाएँ पृथक् पृथक् विषयों को लेकर बुनी गई हैं जो सामाजिक सरोकारों से गुम्फित हैं। लघुकथा का भविष्य ऐसे नवोदित लघुकथाकारों के हाथों में सुरक्षित रहेगा, ऐसी आशा बँधती है। अशोक भाटिया ने भी लिखा है कि ‘महेन्द्र जी की लघुकथाएँ पहली श्रेणी की सम्भावनाएँ लिये हुए हैं’, यह लघुकथा समाज के लिए हर्ष का विषय है ;क्योंकि ये ही लघुकथा के भविष्य के कर्णधार हैं।
वहीं बी.एल आच्छा के शब्दों में मुकेश शर्मा की लघुकथाएँ पुराने विषयों में भी नए कोण, नए परिदृश्य व नए ट्रीटमेंट तलाशती हैं। इस प्रकार ये नए लेखकों के लिए उत्कृष्ट उदाहरण हैं। मेरी दृष्टि में भी मुकेश शर्मा की लघुकथाएँ विचारों की गहराई लिए हुए हैं व सोचने को बाध्य करती हैं।
बकौल रवि प्रभाकर ‘कमल चोपड़ा जी का लेखन विकासोन्मुखी रहा है जिसमें मानवीय मूल्यों की जिजीविषा को ध्वस्त करने वाली व्यवस्था के प्रतिरोध और नए मूल्यों की स्थापना में सहायक स्वर की अनुगूँज है।’ यही एक लेखक से अपेक्षित भी होता है। रचना प्रक्रिया के दौरान लेखक को समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्व व भूमिका का भान अवश्य होना चाहिए। यहाँ तीनों लघुकथाकारों ने अपने इस दायित्व को बख़ूबी निभाया है। रचनाओं का चयन प्रशंसनीय है।
आधारशिला के अंतर्गत पंजाबी लेखक स्व० जगदीश अरमानी को ‘लघुकथा कलश’ की ओर से श्रद्धांजलि स्वरूप उनकी दस लघुकथाओं का रवि प्रभाकर द्वारा किया अनुवाद प्रस्तुत किया गया है। लघुकथाएँ अपने कलेवर में अनूठी हैं। आकार में लघु व सारगर्भित हैं।
अपने पूर्ववर्ती लघुकथाकारों को याद करना व पढ़ना सदैव लेखन के नए द्वार खोलता है। लघुकथा कलश के इस अंक में दस दिवंगत लघुकथाकारों के योगदान को याद करते हुए उनकी एक-एक लघुकथा दी गई है। इन लघुकथाकारों में शामिल हैं- अमरनाथ चौधरी अब्ज़ की ‘स्वाभिमान’, कालीचरण प्रेमी की ”बदला’, कृष्ण कमलेश की ‘ठीक -ठाक’, मो० मोइनुद्दीन अतहर की ‘कुत्ते’, प्रेम सिंह बरनालवी की ‘नई राह’, रावी की ‘भिखारी और चोर’,विष्णु प्रभाकर की ‘ईश्वर का चेहरा’, श्याम सुंदर व्यास की ‘चाकर कुंडली’, सुगमचंद्र मुक्तेश की ‘वर्तमान’ व सुरेन्द्र मंथन की ‘कंधे पर बैठा आदमी’। सभी लघुकथाएँ अपने कलेवर व फ्लेवर में एक से बढ़कर एक हैं। चयनकर्ताओं को साधुवाद।
विशेषांक में 173 लघुकथाकारों की 301 लघुकथाएँ शामिल की गई हैं । वरिष्ठ व नवोदित लघुकथाकारों की मिलीजुली रचनाओं से समृद्ध विशेषांक संपादन- कौशल का उत्कृष्ट नमूना है। रचनाओं के चयन में बहुत सावधानी बरती गई है। सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक, स्त्री विमर्श, बाल मनोविज्ञान, वैचारिक , शैक्षिक, राष्ट्रीय मुद्दे, वाणिज्यिक मुद्दे, आतंकवाद, पर्यावरण व ग्लोबल समस्याओं जैसे विषय वैविध्य के दर्शन इस महाविशेषांक में होते हैं। कहते हैं न कि लघुकथा विसंगतियों की कोख से जन्म लेती है। हम इन लघुकथाओं में निहित व इंगित विसंगतियों के आलोक में चर्चा करेंगे।
हर हाथ में मोबाइल हमारे देश की तरक्क़ी को इंगित करता है ; किंतु साथ ही इसके कारण सभी अपने आप में व्यस्त हो गए हैं। एक घर में रहते हुए भी आपस में वार्तालाप से दूर होते जा रहे हैं। इसी बात का ख़ूबसूरती से ज़िक्र किया है अंजलि गुप्ता ‘सिफ़र’ ने अपनी लघुकथा ‘हैलो ज़िंदगी’ में। मोबाइल ने सैल्फी की भी लत डाली है, इसके कारण कई दुर्घटनाएँ तक हो जाती हैं, यही बताना चाहा है भुवनेश्वर चौरसिया ‘भुनेश’ ने अपनी लघुकथा ‘सुबह की तस्वीर’ में। यह भी एक विडंबना ही है कि कोई दुर्घटना घटने पर लोग उस व्यक्ति की मदद करने की अपेक्षा मोबाइल से वीडियो बनाने में जुट जाते हैं, इसी का ज़िक्र किया है रामकुमार आत्रेय जी ने अपनी लघुकथा ‘सलाम रिश्ता’ में।
पुलिस में व्याप्त भ्रष्टाचार की कलई खोलती अखिलेश शर्मा की कथा है पॉकेटमार। उनके अनुसार पुलिस हो या जेबकतरा हैं तो दोनों ही पॉकेटमार अपने अपने तरीके से। पति पत्नी के रिश्ते में प्यार- भरी नोंक झोंक , रूठना-मनाना होता रहता है और शायद यह आपसी प्यार को और भी बढ़ाने में सहायक होता है, इस रिश्ते की ख़ूबसूरती को अजय गोयल ने दिखाने की सफल कोशिश की है। कथा ‘अबोला’ में एवं जानकी वाही ने लघुकथा ‘सावन की महक’ में। । मिन्नी मिश्रा की ‘अहम’ भी एकदूसरे के पूरक होने की तसदीक़ करती है। समाज की क्रूर सच्चाई है अंधविश्वास, जिसकी गिरफ़्त में अनपढ़ व पढ़े-लिखे सभी आ जाते हैं यह जानते हुए भी कि बुरे कर्म का नतीजा सदैव बुरा ही होता है। बात बलि की हो या भूत-पिशाचों की, इसी बुराई को समय रहते सकारात्मक मोड़ देते हुए अजय गोयल की कथा है’ बलि’ व अशोक भाटिया जी की हाथी। सिगरेट, शराब ड्रग्स वगैरह कैसे इनसान को अपने चक्रव्यूह में फाँस लेते हैं व इससे बाहर आने का रास्ता केवल आत्मनियंत्रण ही है ,इसी बात को बख़ूबी दर्शाया है अनघा जोगलेकर ने अपनी रचना ‘चक्रव्यूह’ में।
स्त्री विमर्श एक ऐसा विषय है जिस पर बहुत कुछ लिखा जाता रहा है। इस अंक में भी अपराजिता अनामिका की लघुकथा ‘सर्कस की शेरनी’ व ‘बदतमीज़’, अर्चना मिश्र की ‘अनकहा समझौता’, किशनलाल जी की ‘क्षमा’ व ‘इज्ज़त’, कुमार नरेंद्र जी की ‘विवाह की उम्र’ पठनीय हैं। वहीं एक महिला का आत्मबल बढ़ाने में एक पति की कोशिश देवेन्द्र सोनी की लघुकथा ‘आत्मबल’ में की गई है। प्रेरणा गुप्ता की लघुकथा ‘उड़ान बाकी है’ व मनोरमा जैन ‘पाखी’ की लघुकथा ‘ज्वार’ अच्छी संदेशप्रद कथा है जो घरेलू हिंसा से त्रस्त महिलाओं को हौसला देती है। मीनाक्षी शर्मा ‘लहर’ की लघुकथा ‘आड़ा वक़्त’ एक बेटी को शिक्षा, नौकरी, आत्मविश्वास… दहेज़ में देना चाहती है ताकि वह स्वाभिमान से जी सके।
बेटियों को समाज में आज भी बोझ समझा जाता है । स्थिति में परिवर्तन हो रहे हैं, किंतु कछुआ गति से। ऐसे में बेटियों को ही हिम्मत दिखानी होगी, अपने लिए राह ख़ुद ही बनानी होगी। इस बात को कई लघुकथाओं मसलन- अल्पना हर्ष की ‘आत्मबल’, आशा शैली की ‘कुछ नहीं बदला’, कुसुम शर्मा नीमच की ‘एक पाती’ में व्यक्त किया गया है। कन्या भ्रूणहत्या भी बेटियों के खिलाफ मानसिकता के कारण ही है। तारिक़ असलम ‘तस्नीम’ ने कामवाली बाई व मालकिन के संवादों द्वारा यही जताने की कोशिश की है। दिव्या शर्मा ने भी भ्रूण हत्या के कारण भविष्य में लड़कियों की घटती संख्या पर चिंता व्यक्त की है अपनी लघुकथा ‘दुर्लभ प्रजाति’ में। बेटा पैदा करने में पत्नी की जान को ख़तरा सोचते परेशान पति को पत्नी का जवाब- ‘अगर मेरी कोख में लड़की होती तो भी हमेशा की तरह लड़की को ही बलि चढ़ना पड़ता’- एक करारा व्यंग्यात्मक किंतु मार्मिक उत्तर है ‘आख़िर औरत ही’ लघुकथा में जो लिखी है धर्मपाल साहिल ने। कन्याभ्रूण हत्याओं के कारण संख्या अनुपात में जो अंतर आया है इसका नतीजा लघुकथा ‘द्रौपदी’ की पात्र द्रौपदी जैसा हो सकता है जिसे पाँच पतियों की पत्नी बनना पड़ता है, यह बता रही हैं भारती कुमारी। इसी क्रम में बेटियों के लिए चलाई जा रही अनेक योजनाओं में बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ के नारे को बेटी बचाओ, बेटा पढ़ाओ की सलाह दे रहे हैं मनोज कर्ण अपनी लघुकथा ‘बढ़ती लकीरें’ में ,ताकि शिक्षित होकर बेटे दूसरे की बेटी का सम्मान करें। सतीश राज पुष्करणा की लघुकथा ‘सवेरा’ भी बेटे-बेटी के अंतर को दिखाती है किंतु बेटे द्वारा ही उसके पिता को सबक़ मिलता है व सकारात्मक मोड़ लेते हुए कथा का समापन होता है।
संवेदनहीनता समाज में किस कदर हावी हो रही है कि एक मजबूर लड़की के चीख़ने पर दरवाज़ा न खोलने वाले लोग कुत्ते के रोने की आवाज़ पर घरों से बाहर निकल आते हैं- इस बात को सिद्ध करती है सुकेश साहनी की लघुकथा ‘श्वान विलाप’। वहीं मरती संवेदनाओं के युग में भी कहीं-कहीं यह ज़िंदा होने का आभास करा ही देती है और मस्तक सम्मान से झुक जाता है। इस अंक में भी अशोक कुमार की कथा ‘श्रेष्ठ कृति’ ख़ूबसूरत है। ज्योति शर्मा की ‘सबके बप्पा’ भी ध्यान खींचती है वहीं
सृजन और विनाश का दौर अपनी गति से आता-जाता रहता है। विनाश जहाँ दुख का कारण बनता है वहीं सृजन आंतरिक ख़ुशी का अहसास कराता है, अशोक भाटिया की लघुकथा इसी भाव को इंगित करती है। माँ एक ठंडी फुहार का नाम है जो अंत तक भी अपने बच्चों की चिंता में घुलती जाती है। बुरी बलाओं से बचाने की कोशिश में लगी रहती है। अशोक भाटिया अपनी लघुकथा ‘ज़िंदगी के साथ’ में इस तथ्य को बख़ूबी व्यक्त करते हैं। भगीरथ परिहार की लघुकथा ‘सपने में माँ’ मृत्यु के उपरांत भी अपने पुत्र का मार्गदर्शन करती है। भटके हुए नौजवानों को सही राह पर लाने की हिम्मत व जज़्बा हर किसी में नहीं होता। अशोक वर्मा की लघुकथा ‘फ़ैसला’ ऐसा ही कठोर फ़ैसला करवाती है एक बहन से अपने भाई को पुलिस से पकड़वाकर। कहते हैं क्रांति के लिए किसी एक को तो शुरुआत करनी ही होती है, फिर उसी से प्रेरणा प्राप्त कर अन्य भी साथ हो लेते हैं। यही बात साबित होती है आभा सिंह की लघुकथा ‘क्रांति’ में। एक ही वस्तु किसी के विचार में बुरी व दूसरे के लिए रोज़ी का साधन है बताती है आभा सिंह की लघुकथा ‘दृष्टिकोण’। अर्चना राय की ‘आईना’, अमरेंद्र सुमन की ‘पिकनिक’, विजयानंद विजय की ‘खुलती गाँठें’, उमेश महादोषी की ‘समय का तीसरा बिंदु’, नीरज सुधांशु की ‘इंटरव्यू’, सतीशराज पुष्करणा की ‘माँ’ कुणाल शर्मा की ‘कुर्बानी’ व ‘स्वेटर’, कुमार गौरव की ‘तेरा मेरा’, नवीन कुमार साह की ‘ईमानदारी’, नीता राठौड़ की ‘मासूम सवाल’, पंकज शर्मा की ‘बापू का जन्मदिन’, बालमनोविज्ञान को बख़ूबी प्रदर्शित करती हैं। आज की बेलगाम पीढ़ी के हालात आशा शैली ने व्यक्त किए हैं अपनी लघुकथा ‘बैल की जून’ में। ग़रीब का भी स्वाभिमान होता है यह साबित करती है आशा शर्मा की लघुकथा’ चमक’।
पर्यावरण को नुकसान पहुँचाकर आधुनिक होते शहर सोचने को मजबूर करते हैं ऊषा भदौरिया की लघुकथा ‘ढांचा’ में। गोविंद शर्मा जी की ‘वायरस’ भी चमगादड़ के माध्यम से यही बात कहती है। पंकज शर्मा की कथा ‘गूँगा’ पेड़ों के काटे जाने पर चिंता व्यक्त करती है। बलराम अग्रवाल की लघुकथा ‘अकेला कब गिरता है पेड़’ पेड़ों के गिराए जाने से होने वाले नुकसान से अवगत कराती है। परंपराओं को तोड़ना, वर्जनाओं को तोड़ना कोई आसान काम नहीं है, निर्णय लेने में बहुत कष्ट भी होता है, इसी ऊहापोह को ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश ने दिखाने का प्रयत्न किया है अपनी लघुकथा ‘परंपरा’ में। जयराम कुमार सत्यार्थी भी इसी भाव को व्यक्त करते हुए ससुर को बहू से मुखाग्नि दिलवाते हैं अपनी लघुकथा’ मुखाग्नि कौन देगा’ में।
राजनीति में समय के साथ बदलाव आए हैं । जनता को लुभाने के हथकंडे बदल रहे हैं, इस बात को साबित करती है कनक हरलालका की लघुकथा ‘सड़क और पुल’, राजनीतिज्ञों का भ्रष्टाचार मामूली अपराध है व ग़रीब का अपराध अक्षम्य, दर्शाती है घनश्याम अग्रवाल की लघुकथा ‘हम सब चोर हैं’ वहीं राजनीति में मौक़ापरस्ती प्रताप सिंह सोढ़ी की लघुकथा ‘परिवर्तन’ में बख़ूबी उभर कर आई है। वहीं वोटरों को लुभाने की राजनीति का कच्चा चिठ्ठा पेश करती है योगेन्द्रनाथ शुक्ल की लघुकथा ‘परोपकार का भूत’। अपनी दूसरी लघुकथा ‘आंकड़े’ में भी उन्होंने वास्तविकता से कोसों दूर आँकड़ों का खेल कैसे खेला जाता है बताने का प्रयत्न किया है।
बड़ों की कही बातें बचपन में समझ न आएँ पर बड़े होने पर उन्हीं बातों के अर्थ समझ में आने लगते हैं यह बताया है कमलेश भारतीय ने ‘चौराहे का दीया’ व ‘…और ‘मैं नाम लिख देता हूँ’ में।
वृद्धावस्था की समस्याएँ , एकाकीपन बहुत गंभीर रूप धारण करता जा रहा है। कुँवर प्रेमिल की लघुकथा ऐसी परिस्थिति से मुक़ाबला करने का विश्वास जगाती प्रतीत होती है वहीं माँ-पिता के प्रति कर्तव्य निभाने में कथनी व करनी में अंतर को दर्शाती जयकिशन सब्बरवाल की कथा ‘भाषण’ व ‘पिता जी’ हैं। एकाकीपन को घर भी महसूस करता है पर एकाकीपन को मिलजुल कर मिटाया भी जा सकता है ये बता रही हैं तनु श्रीवास्तव अपनी लघुकथा ‘बल्ले-बल्ले ‘ में। तारिक़ असलम ‘तस्नीम की लघुकथा ‘माँ ‘ भी इसी विषय को लेकर है। दीपक गिरकर ने अपनी कथा ‘जीवनभर का सूतक’ के माध्यम से माँ पिता की वृद्धाश्रम में मृत्यु होने पर सदा के लिए सूतक लग जाना बताकर ऐसे बेटे को पुण्य कार्यों से भी विरत कर दिया है। अपने माँ बाप से दूरी बनाकर वृद्धाश्रम में जाने का दिखावा करते लोगों के मुँह पर करारा तमाचा है रजनीश दीक्षित की लघुकथा ‘आईना’। राजकमल सक्सेना की लघुकथा ‘फटा नोट’ में शंकरलाल स्वयं की तुलना उस फटे नोट से करता है जो हर जगह दुत्कारे जाने के बाद मंदिर में स्थान पाता है जैसे वह अपने बेटों से दुत्कारे जाने के बाद वृद्धाश्रम में। वृद्धावस्था में अपनी ही संतान द्वारा दुत्कारे जाने का दर्द बयान हुआ है विरेंद्र वीर मेहता की लघुकथा ‘आख़िरी घड़ियाँ’ में।
ज़िंदगी से जुड़ी अनेक लघुकथाओं में कृष्णलता यादव की ‘ज़िंदगी ज़िंदाबाद’ व ‘तर्क से परे’ अच्छी हैं। इसी क्रम में प्रतीकात्मक शैली में लिखी चंद्रेश कुमार छतलानी की दो लघुकथाएँ ‘एक बिखरता टुकड़ा’ व ‘प्रयास तो करो’ प्रभावित करती हैं। दिखावा या सच आपसी रिश्तों में समझना कभी-कभी बहुत मुश्किल होता है, ऐसा ही कुछ जगदीश राय कुलरियाँ ने व्यक्त किया है अपनी लघुकथा ‘रिश्तों का सच’ में, सास-बहू के रिश्तों जैसे पुराने विषय पर काफी लिखा जाता रहा है, उसी पर सकारात्मक पुट देते हुए क़लम चलाई है दिलबाग सिंह ‘विर्क’ ने लघुकथा ‘ताली’ में। किराए की कोख के व्यापार जैसे समसामयिक विषय को उठाया है धर्मपाल साहिल ने अपनी कथा ‘व्यापार’ में। रामकुमार घोटड़ ने कथा ‘बदलता चोला’ में किराए की कोख लेने वालों के कृत्य को पक्षीवत् बताया है। जैसे कोयल अपने अंडे कौए के घोंसले में रख देती है व बच्चे पैदा होने के बाद लेकर फुर्र हो जाती है। मधुदीप की लघुकथा ‘हथियार’ आज के सच को प्रदर्शित करती है। मज़दूर या ग़रीब के हक़ में आवाज़ उठाना जैसे अपराध हो गया है। माधव नागदा की लघुकथा ‘पुरानी फाइल’ सदियों से ऊँची जाति वालों के शोषण के प्रति निम्न जाति वालों के आक्रोश को प्रदर्शित करती है। मच्छरों की अपने अस्तित्व को बचाने व बाज़ार के हित साधने की कवायद में बाज़ार की तिकड़मबाज़ी भले ही इनसान का नुकसान हो को मुद्दा बनाकर लिखी गई संकेतात्मक लघुकथा है मार्टिन जॉन की ‘ऑपरेशन क्लीन’। मनुष्य केवल शरीर से ही नहीं विचारों से भी विकलांग(टुंटा) होता है संवादों के माध्यम से जताने का प्रयत्न किया है मृणाल आशुतोष ने अपनी कथा ‘टंगटुट्टा’ में।
योगराज प्रभाकर जी की लघुकथा ‘एक अफ़गानी की डायरी’, डायरी शैली में लिखी लघुकथा का उदाहरण है। अफ़गानिस्तान के पिछले चालीस वर्षों से बिगड़ते हालात के दौर दिसंबर-1979 से जनवरी-2019 (यानी आज तक) डायरी के माध्यम से लघुकथा में ढाला गया है। शांति की आशा अब भी धूमिल नहीं हुई है बल्कि किसी चमत्कार की आस में आज तक ज़िंदा है। वहीं उनकी दूसरी कथा ‘जम्बूद्वीपे भारतखंडे’ हुनर का अभाव व बेरोज़गारी के कारण अपराधी बनते युवाओं का दर्द बयान करती है।
कुतर्कों द्वारा अपने किए ग़लत काम को सही ठहराने की कोशिश कैसे की जाती है यह बताया है राजेन्द्र वामन काटदरे ने लघुकथा ‘उपवास’ में। इन्सानियत के नाते किसी की जान बचाना सबसे बड़ी इबादत है यही सबक़ सिखाने की कोशिश की है रामयतन यादव ने अपनी लघुकथा ‘सच्ची इबादत’ में। जगह घर में हो न हो दिल में होनी चाहिए, इस पते की बात को लघुकथा ‘स्नेह -पाश’ से साबित किया है रूप देवगुण जी ने। आज के समय में अख़बार भे अपना स्वार्थ देखकर खबरें प्रकाशित करते हैं यही मुद्दा उठाया है रेणुका चितकारा ने लघुकथा ‘क़लम और बोटी’ में। किसी के साथ कितनी ही दुखद घटना हुई हो , रेप हुआ हो या कुछ और चैनल वालों को केवल खबरों को सनसनी की तरह पेश करने से मतलब होता है न कि पीड़ित की फिक्र, यही बात साबित की है संदीप तोमर ने लघुकथा ‘ख़बर की ख़बर’ में। सविता इंदर गुप्ता भी पीछे नहीं हैं, उन्होंने न्यूज़ चैनल वालों की संवेदनहीनता को मार्मिकता के साथ उकेरा है अपनी लघुकथा ‘ब्लैक होल’ में। माँ डाँट ले , फटकार ले फिर भी वह बच्चों के लिए सबसे अच्छी माँ होती है, सतीशराज पुष्करणा ने अपनी लघुकथा ‘माँ’ के माध्यम से यही समझाया है। दूसरे से ईमानदारी की अपेक्षा से पहले ख़ुद ईमानदार होना भी ज़रूरी है का संदेश दिया है सीमा जैन ने लघुकथा ‘दोतरफ़ा जाँच’ में। शोषित और शोषक की दास्तान बख़ूबी बयान की है सुकेश साहनी ने लघुकथा ‘कुआँ खोदने वाला’ में। जोड़-तोड़ कर घटिया सामग्री को भी साहित्य समाज में स्थान दिला देना जैसी प्रवृत्ति को बख़ूबी उजागर किया है सुभाष नीरव ने अपनी लघुकथा ‘काला समय’ में। जहाँ माँ का सम्मान होता है वहीं ईश्वर का वास होता है, समझा रहे हैं त्रिलोक सिंह ठकुरेला लघुकथा ‘अंतर्ध्यान’ में। माता-पिता के प्रति बच्चों की उदासीनता होते हुए भी फिर भी माता-पिता का प्यार कम नहीं होता, अपनी दूसरी लघुकथा ‘पिताजी’ में जताने का प्रयत्न किया है त्रिलोक सिंह ठकुरेला ने। इस प्रकार उपर्युक्त लघुकथाओं में अनेक विसंगतियों की ओर इशारा किया गया है। यह पड़ाव इस विशेषांक की धुरी है।
कई पृष्ठों के अंत में बोल्ड अक्षरों में विद्वानों की उक्तियाँ सहज ही ध्यान आकर्षित करती हैं व ज्ञानवर्धक व मार्गदर्शक हैं। अगले पड़ाव में आलेखों की श्रृंखला में विभिन्न विषयों को संजोते नौ आलेख हैं।
प्रथम आलेख – कल्पना भट्ट द्वारा प्रस्तुत आलेख ‘हिंदी लघुकथा में ‘पिता’ पात्र का चरित्र चित्रण’ पठनीय है। शास्त्रों में पिता की परिभाषा व चाणक्य द्वारा पिता के पाँच प्रकार यथा-जन्म देने वाला, शिक्षा देने वाला, यग्योपवीत आदि संस्कार , अन्न देने वाला और भय से बचाने वाला बताए गए हैं का बख़ूबी वर्णन किया है। आलेख में उनका परिश्रम झलकता है। वे रामेश्वर कांबोज हिमांशु की अति प्रसिद्ध लघुकथा ‘ऊँचाई’, बलराम अग्रवाल की ‘कुंडली’, कृष्णा भटनागर की ‘सौदा नन्ही श्वासों का’, सुभाष नीरव की ‘अपने अपने हेतु’, जगदीश कश्यप की ‘ताड़ का वृक्ष’, डॉ. सतीषराज पुषकरणा की ‘उजाले की ओर’ श्याम सुंदर अग्रवाल की ‘बँटवारे का अधिकार’, कमल चोपड़ा की ‘इच्छा’ व सुकेश साहनी की लघुकथा ‘बैल’ इत्यादि लघुकथाओं के माध्यम से समाज, घर-परिवार में पिता की भूमिका को उद्धृत करने में सफल हुई हैं। उन्होंने स्वीकार किया है कि चाहते हुए भी वे अन्य अनेक लघुकथाएँ स्थानाभाव के कारण शामिल नहीं कर पाई हैं किंतु मेरा ऐसा मत है कि जब भी किसी आलेख में लघुकथाओं को उदाहरणस्वरूप लिया जाए ,तो काफी समय पूर्व लिखी गई लघुकथाओं के साथ ही आज लिखी जा रही लघुकथाओं को भी शामिल किया जाना चाहिए। समय के साथ बहुत कुछ बदल जाता है। आज पिता का व्यवहार पिता से अधिक मित्र- सा दिखाई पड़ता है, आपसी व्यवहार में बहुत तबदीली आई है। समय के साथ परिवर्तित समाज को प्रतिबिंबित करता लेखन अधिक सार्थक कहलाता है जिसे आलेख में भी उद्धृत किया जाना चाहिए।
द्वितीय आलेख- प्रो० रूप देवगुण के अनुसार ‘शीर्षक लघुकथा का तोरण अर्थात् मुख्य द्वार होता है। ‘ शीर्षक रचना भी एक कौशल है। इसी तथ्य को सिद्ध करता डॉ. ध्रुव कुमार का आलेख ‘लघुकथा को श्रेष्ठ बनाने में शीर्षक की भूमिका’ अतिमहत्वपूर्ण है। यूँ तो सभी विधाओं में शीर्षक का महत्त्व होता है ; किन्तु लघुकथा विधा में शीर्षक की भूमिका अनकहे को शब्द प्रदान करती है। उन्होंने कई उदाहरणों की मदद से शीर्षक की महत्ता को दर्शाने का सफल प्रयास किया है।
तृतीय आलेख- ‘लघुकथा रचना-विधान और आलोचना के प्रतिमान’ आलेख में निशान्तर ने लघुकथा के तत्वों का उल्लेख किया है साथ ही कुछ उदाहरणों के माध्यम से समीक्षात्मक बिंदुओं जैसे-कथ्य, कथानक, शीर्षक, आकारगत लघुता, संप्रेषण इत्यादि को मद्देनज़र रखते हुए प्रकाश डाला है।
चतुर्थ आलेख- समय के साथ लघुकथा के विषय, कथ्य, भाषा में भी परिवर्तन हुए हैं ,जो लाज़िमी हैं व परंपरा के विकास का सकारात्मक चिह्न है – इस तथ्य को सिद्ध करता डॉ. पुरुषोत्तम दुबे का आलेख ‘ लघुकथा कितनी पारम्परिक कितनी आधुनिक’ अत्यंत महत्वपूर्ण है।
पंचम आलेख- डॉ. रामकुमार घोटड़ ने अपने आलेख ‘ द्वितीय हिंदी लघुकथा-काल’ में १९२१ से १९५० के बीच लिखी गई प्रमुख कथाकारों की लघुकथाओं की पड़ताल की है।
षष्ठ आलेख- भाषा भावाभिव्यक्ति का साधन है, मानव व विचारशक्ति के विकास का आधार, सभ्यता व संस्कृति की पहचान है साथ ही ग्यान प्राप्ति का प्रमुख साधन है। इस दृष्टि से साहित्य का मूल आधार भी भाषा ही है। भाषा मानव के भाव, विचार, अनुभव को सुरक्षित रखती है। साहित्य में भाषा के महत्व को दर्शाता व विभिन्न भाषिक प्रयोगों की पड़ताल करता रामेश्वर कांबोज हिमांशु का आलेख समझ के नए द्वार खोलता है। ‘लघुकथा की भाषा सहज ग्राह्य, सरल व पात्रानुकूल होनी चाहिए। आंचलिक शब्दों या वाक्यों का प्रयोग रचना में चार चाँद लगा देता है। अपने आलेख में रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ कहते हैं कि पात्र, पात्र की मनःस्थिति, परिवेश, स्तर, परिस्थिति, बहुत सारे ऐसे कारक हैं जो भाषा का निर्धारण करते हैं। किसी भी कथा की मूल शक्ति है उसकी संप्रेषण- शक्ति है। उसे ये शक्ति भाषा की त्वरा से मिलती है। समय के साथ भाषा में आए बदलाव को अपनाना भी अत्यावश्यक है। यह सिद्ध करने के लिए उन्होंने अनेक लघुकथाओं को उदाहरण स्वरूप प्रस्तुत किया है। ईश्वर चंद्र के अनुसार भी-‘जिन रचनाओं के कथ्य मारक होते हैं, उनकी भाषा भी तेज़तर्रार और चुटीली होती है। लघुकथा में कथा और भाषा दोनों प्रवाहमय होने चाहिए। प्रवाहमयी भाषा पाठक को कथा की अन्विति तक पहुंचाती है। भाषा के संदर्भ में यह आलेख लघुकथाकारों के लिए मार्गदर्शक साबित होगा।
सप्तम आलेख- वीरेन्द्र भारद्वाज ने खलील जिब्रान की लघुकथाओं में मानवतावाद की पड़ताल की है। उन्होंने सुकेश साहनी द्वारा अनूदित खलील जिब्रान की लघुकथाओं – आमंत्रण, लुकाछिपी, पीड़ा के बाद, विज्ञापन, आज़ादी, लीडर, वज्रपात, भाई-भाई, गोल्डन बैल्ट व ग़ुलामी के माध्यम से यही निचोड़ निकाला है कि महान साहित्यकार खलील जिब्रान अपनी इन रचनाओं के माध्यम से हर प्रकार से आदमी को सिर्फ़ आदमी बनाना चाहते हैं। बेबाकी से उद्धृत करते वे इन रचनाओं को लघुकथा न मानते हुए सूक्तियों की संज्ञा से नवाज़ते हैं साथ ही अनुवादक सुकेश साहनी से क्षमासहित रचनाओं में वस्तुदोष व व्याकरणिक दोष की ओर भी इंगित करते हैं।
अष्टम आलेख- डॉ० सतीशराज पुष्करणा दशकों से लघुकथा के विकास के साक्षी रहे हैं । उन्होंने लघुकथा के इतिहास में झाँकने व अनेक जानकारियाँ जुटाने का श्रम किया है, अपने अनेक आलेखों में लघुकथा विषयक अनेक तथ्य उद्घाटित किए हैं। हिंदी लघुकथा- अतीत एवं विकास में भी उन्होंने अनेक संस्मरणों के साथ ही लघुकथा के प्रारंभ से आज तक की विकास यात्रा का उल्लेख किया है। उन्होंने कई शोध किए व यह जानकारी लोगों तक पहुँचाई। ऐसे समर्पित कथाकार डॉ० सतीशराज पुष्करणा साधुवाद के पात्र हैं।
नवम आलेख- साहित्य में राजेन्द्र यादव का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है ; किंतु लघुकथा विधा में वे उतना प्रभावशाली लेखन नहीं कर पाए। ख़ुद उन्हीं के शब्दों में-“मैंने पाँच- सात लघुकथाएँ लिखी हैं। मुझे लगा, यह विधा बहुत कठिन है, मैं नहीं लिख पाऊँगा । लेकिन चुटकुले लिख सकता हूँ, जिनको मैं लघुकथा नहीं मानता, क्योंकि लघुकथा में लेखक मूल स्वर पकड़ता है। बड़ी कहानी को संक्षिप्त करके लिखना लघुकथा नहीं है।” इस नवें आलेख में सुकेश साहनी ने राजेन्द्र यादव की कतिपय लघुकथाओं जैसे- ‘अपने पार’, ‘सिद्धांत’, ‘सज़ा या सम्मान’, ‘पहला झूठ’ व ‘हनीमून’ की गहन पड़ताल की है। इस दौरान उन्होंने अधिकतर लघुकथाओं को लघुकथा के पैमाने पर कमज़ोर ही पाया है। इससे सिद्ध होता है कि लघुकथा लिखना आसान नहीं है।
लघुकथा कलश का अंक भले ही हिंदी लघुकथाओं को समर्पित है किंतु अन्य भाषाओं में किस प्रकार की लघुकथाएँ लिखी जा रही हैं यह जानना भी अतिआवश्यक है। इसी क्रम में इस अंक में ‘जय गोर्खाली’ के अंतर्गत नेपाली व ‘सिंधुधारा’ के अंतर्गत सिंधी लघुकथाओं को स्थान दिया गया है। नेपाली लघुकथाओं का संकलन आलोक कुमार सातपुते व अनुवाद एकदेव अधिकारी ने किया है। इस खंड में सात लघुकथाओं का समावेश है। ‘सोचो वैसा नहीं होता जीवन’-ऋषि तिवारी, ‘संस्कृति’-एकदेव अधिकारी, ‘इनसान जैसा’- कुमार काफ्ले, ‘शिक्षा’- जीवन दाहाल, ‘दोगला’- रामहरि पौड्याल, ‘ऊँगली’- लक्ष्मण अर्याल, ‘स्वच्छता अभियान’- लीलाराज दाहाल। इन लघुकथाओं को पढ़ते हुए महसूस हुआ कि कथ्य के तल पर ये लघुकथाएँ प्रभावित करती हैं। अभी और गंभीरतापूर्वक काम होना अपेक्षित है। लेखकों का प्रयास सराहनीय है।
सिंधुधारा कॉलम के अंतर्गत डॉ. हूंदराज बलवाणी द्वारा संकलित दस लघुकथाएँ अपना प्रभाव छोड़ने में कामयाब हैं। इसमें शामिल हैं- ‘टेप-रिकॉर्डर’-अमर जलील, ‘तोड़-फोड़’- घन्श्याम सागर, ‘बेताल की कथा’- जयंत रेलवाणी, ‘महान नेता का शव’- जीवत गोगिया ‘ज्योत’, ‘हुक्का-पानी’- मोतीलाल जोतवाणी, ‘पहचान’- राम भागचंदानी, ‘इनपुट-आउटपुट’- रीटा शहाणी, ‘बदबू’- लखमी खिलाणी, ‘भटकाव’-वासुदेव सिंधु भारती, ‘ज़मीउ पर’- हूंदराज बलवाणी की लघुकथाएँ। सभी दस लघुकथाएँ कथ्य में परिपक्व व पैमानों पर खरी उतरती हैं। संकलनकर्ता का चयन प्रशंसनीय है। सिंधी भाषा में लघुकथा विधा को लेकर गंभीरता प्रतीत होती है। इन्हें शामिल करने से अन्य भाषाओं के लेखन से रूबरू होने का अवसर मिला जिसके लिए संपादकीय टीम व चयनकर्ता बधाई के पात्र हैं।
श्रद्धा सुमन कॉलम के अंतर्गत प्रभारी सुरिंदर कैले व अनुवादक योगराज प्रभाकर द्वारा पंजाबी की दस लघुकथाएँ प्रस्तुत की गई हैं। ‘दोराहे पर’- अजमेर सिंह औलख, ‘ये और वो’ –करतार सिंह दुग्गल, ‘एहसास’- गुरमेल महाहड़, ‘शून्य’ – जगदीश अरमानी, ‘फाँसी पर लटके गीत’ – दर्शन मितवा, ‘स्वाभिमान’- राजिन्दर कौर वन्ता, ‘पागल’- रामसरूप अणखी, ‘ज़िंदगी’ –रोशन फूलवी, ‘भेड़ें’- शरण मक्कड़, ‘संदेश’- सतवंत कैंथ। इन लघुकथाओं से गुज़रते हुए यह अहसास होता है कि पंजाबी में लघुकथा ने बहुत लम्बी दूरी तय कर ली है । ये अन्य भाषाओं के लिए भी प्रेरणा स्वरूप हैं। कथ्य, संप्रेषण, भाषा, शीर्षक इत्यादि के तल पर सभी लघुकथाएँ प्रभावशाली हैं। हमारा भी उन सभी को सादर नमन।
साक्षात्कार के खंड में डॉ०लता अग्रवाल की वरिष्ठ लघुकथाकार सतीश राठी से विस्तृत बातचीत प्रस्तुत की गई है। उनके अनुसार नई व पुरानी पीढ़ी अर्थात् वरिष्ठों का अनुभव व नवोदितों का उत्साह व ऊर्जा मिलकर ही इस रचना संस्कार को आगे लेकर जा सकते हैं। उन्होंने आज की लघुकथाओं में सांकेतिकता की कमी पर चिंता जताई है। अन्य विधाओं से कैसे अलग है का उत्तर देते हुए उन्होंने कहा है- “लघुकथा समय, समाज, देश, काल, स्थितियों, वृत्तियों,प्रवृत्तियों, प्रकृति, स्वभाव, सब पर सूक्ष्म दृष्टि, चिंतन कर पूर्ण कथातत्व के साथ, बारीक बुनाई का शिल्प लेकर पाठक के समक्ष प्रस्तुत होती है।” अनेक महत्वपूर्ण तथ्यों से परिपूर्ण यह साक्षात्कार संग्रहणीय है।
इसी क्रम में वरिष्ठ लघुकथाकार कमल चोपड़ा से सीमा जैन की बातचीत है। उन्होंने डॉ. कमल चोपड़ा के लेखकीय जीवन, रचनाधर्मिता, पसंदीदा रचनाओं पर विस्तार से बात की है। डॉ. कमल चोपड़ा ने आज के समय में अपनी ज़िम्मेदारियों को समझने की ताकीद भी की है।अगले पड़ाव पर सम्मिलित है जगदीश राय कुलरियाँ के साथ डॉ. श्याम सुंदर दीप्ति की बातचीत। लघुकथा की स्थिति, विकास, समस्याएँ , पंजाबी लघुकथा की स्थिति, विषयों के चयन को लेकर पूछे गए अनेक प्रश्नों के बहुत सधे व सटीक उत्तर दिए हैं। उनकी स्वयं की लघुकथा यात्रा, मिन्नी पत्रिका का अब तक का सफर, पुस्तकें व सम्मानों का ज़िक्र भी प्रेरणाप्रद है।
महाविशेषांक में लघुकथा विधा में प्रकाशित कई पुस्तकों पर समीक्षात्मक आलेख भी प्रस्तुत किए गए हैं। इनमें ‘लघुकथा का वर्तमान परिदृश्य’- लेखक रामेश्वर कांबोज ‘हिमांशु’ पर समीक्षात्मक आलेख लिखा है डॉ० कविता भट्ट ने। लघुकथा संग्रह ‘आँगन से राजपथ’ –पवित्रा अग्रवाल की समीक्षा की है माधव नागदा ने। रेखांकन के माध्यम से लघुकथाओं की अभिव्यक्ति करता अनूठा लघुकथा सप्तक है ‘कृति –आकृति- इस पर समीक्षा लिखी है दीपक गिरकर ने। वहीं दिव्यांगों के जीवट को दिखाती लघुकथाओं के राजकुमार निजात द्वारा संपादित संकलन की समीक्षा की है दिलबाग सिंह विर्क ने। स्नेह गोस्वामी के संग्रह ‘वह जो नहीं कहा’ से परिचय कराया है डॉ. रामेश्वर द्विवेदी ने। नवल सिंह द्वारा रचित लघुकथा संग्रह ‘ शूल से सवाल’ पर गहन निगाह डाली है ग्यान प्रकाश ‘पीयूष’ ने। इन पुस्तकों का विवरण यह दर्शाता है कि लघुकथा विधा में संपादित व एकल संग्रह निरंतर प्रकाशित हो रहे हैं जो विधा के त्वरित विकास की ओर इंगित करता है।
प्रतिवर्ष आयोजित होने वाले अखिल भारतीय लघुकथा सम्मेलन सिरसा पर डॉ० शील कौशिक की विस्तृत रिपोर्ट प्रशंसनीय है। लघुकथा में हो रहे कार्यों, लघुकथा पाठ , समीक्षा व पुरस्कार वितरण जैसे आयोजन लघुकथा के लिए आवश्यक तो हैं ही, गौरव के पल भी हैं। पूना में आयोजित एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी लघुकथा के विविध आयाम, पटना में लेख्य-मंजूषा और अमन स्टूडियो के संयुक्त तत्त्वावधान में आयोजित लघुकथा कार्यशाला की संक्षिप्त रपट विभिन्न क्षेत्रों में हो रहे विधा से संबंधित कार्यक्रमों से रूबरू कराते हैं।
अंतिम इनर पृष्ठ पर द्वितीय लघुकथा कलश के अंक को सौ में से सौ अंक देते हुए डॉ. पुरुषोत्तम दुबे ने अपनी पाठकीय व समीक्षकीय प्रतिक्रिया दी है। यह उत्साहजनक है। समग्रता में देखें तो यह महाविशेषांक अनूठा है। लघुकथा कलश उत्तरोत्तर प्रगति पथ पर अग्रसर रहे व यह यात्रा अनवरत जारी रहे यही शुभकामना है।
लघुकथा कलश (अर्ध वार्षिक )-जनवरी-जून-2019( तृतीय महाविशेषांक),सम्पादक: योगराज प्रभाकर ,पृष्ठ-264,मूल्य-300/, सम्पादकीय कार्यालय-‘ऊषा विला’53, रॉयल एन्ल्वेव, डीलवाला पटियाला-147002(पंजाब), हिन्दी, नेपाली,पंजाबीऔर सिन्धी के 213 लघुकथाकार, साक्षात्कार-3,समीक्षाएँ-6,आलेख -9
-0-डॉ. नीरज सुधांशु,आर्य नगर, नई बस्ती,बिजनौर-246701
मो 9412713640