जून 2026

चर्चा मेंलघुकथा आयोजन 2020 : प्रतियोगिता के परिणाम     Posted: May 1, 2020

इसमें लघुकथा के तमाम रचनाकारों के साथ लघुकथा को समर्पित समूहों का भी योगदान रहा-
◆लघुकथा के परिंदे◆साहित्य संवेद◆नया लेखन और नया दस्तखत◆साहित्य प्रहरी◆साहित्य अर्पण◆लघुकथा:गागर में सागर◆सार्थक साहित्य मंच ◆शब्दशः◆”ज़िन्दगीनामा: लघुकथाओं का सफ़र ◆अनुपम साहित्य◆चिकीर्षा- ग़ज़ल एवं लघुकथा को समर्पित एक प्रयास◆क्षितिज◆फलक (फेसबुक लघुकथाएँ)◆आधुनिक लघुकथाएँ ◆लघुकथा सृजन- संगम संवेदनाओं का ◆literature life◆अंतरा शब्द शक्ति

आयोजन में सक्रिय: दिव्या राकेश शर्मा, चित्रा राणा राघव, मृणाल आशुतोष, वीरेंद्र वीर मेहता, नेहा शर्मा , कुमार गौरव।

निर्णायक : अशोक भाटिया और सुकेश साहनी

 निर्णायकों के अभिमत और आयोजन मंडल की सहमति से परिणाम –

1-सोंधी महक- शर्मिला चौहान, ठाणे
2-मेरा घर छिद्रों में- चन्द्रेश कुमार छतलानी, उदयपुर
3-दान पुण्य- मान कँवर, सीकर

4-स्लीपर सेल-डॉ कुमार सम्भव जोशी ,सीकर
5-हिसाब किताब- राजेश आहूजा,दिल्ली
6-अनुत्तरित-गिरिजा कुलश्रेष्ठ, ग्वालियर
7-बन्द : गिरिजा कुमार कुलश्रेष्ठ,ग्वालियर
8-पुरुष हूँ ना- नन्दिनी दीपक उपाध्याय,भोपाल
9-क्षरण- सतविंदर कुमार राणा, करनाल
10-रोबोट्स-ऋचा यादव, बिलासपुर
11-विरासत- जानकी बिष्ट वाही, नोएडा
12-प्रेम- स्वयम्प्रभा झा, पटना
13-लकीरें- संजय पुरोहित , बीकानेर
14- मिठास – सविता उपाध्याय सरिता, महेश्वर (खरगोन)
15-कुरु कुरु स्वाहा- अश्विनी कुमार आलोक, वैशाली, बिहार
16-कबीरा खड़ा प्रोटेस्ट में -संजय झा मस्तान, मुम्बई
17-गुलाबी फ्रॉक वाली लड़की : राजेश आहूजा, दिल्ली

प्रथम पुरस्कार ₹3100 और मधुदीप संपादित पड़ाव और पड़ताल श्रृंखला के पांच खंड की विजेता कथा है सोंधी महक जिसकी रचनाकार हैं शर्मिला चौहान , ठाणे महाराष्ट्र।

द्वितीय पुरस्कार ₹2100 और मधुदीप संपादित पड़ाव और पड़ताल श्रृंखला के पांच खंड की विजेता रचना है मेरा घर छिद्रों से भर गया, जिसके रचनाकार है चन्द्रेश कुमार छतलानी उदयपुर राजस्थान।

तृतीय पुरस्कार ₹1100 और मधुदीप संपादित पड़ाव और पड़ताल श्रृंखला के पांच खंड की विजेता रचना है दान पुण्य जिसकी रचनाकार हैं मान कँवर सीकर राजस्थान।

अन्य सभी को प्रोत्साहन पुरस्कार स्वरूप पुस्तकें भेजी जाएगी

पुरस्कृत प्रमुख रचनाओं पर  डॉ अशोक भाटिया  की टिप्पणी :-

सौंधी महक:-यह रचना एक नया यथार्थ गढ़ने का प्रयास है। गाँव में रहकर एक युवती पढ़ने के साथ दूकान सँभालने व कई समाजोपयोगी काम भी कर रही है। रचना कि खूबसूरती इसकी सहज सजगता में है। लेखक पार्श्व में ही रहता है, जैसे—लड़की, जिसे वेसोनीपुकार रहे थे।

एकबारगी लगता है कि सोनी को अतिरिक्त कुशल दिखाया जा रहा है, किन्तु रचनाकार इसे भी कुशलता से निभा गया है।

मेरा घर छिद्रों से भर गया: इस रचना में देश के व्यापक परिदृश्य को विशेष सन्दर्भ और प्रतीकों की बुनावट के साथ साकार किया गया है। धार्मिक सम्प्रदायों के सच से बने देश के चिंताजनक स्वरूप पर यह रचना एक श्रेष्ठ रचनात्मक टिप्पणी है। यह बताती है कि रचनात्मक कल्पना द्वारा लघुकथा में भी बड़े से बड़े धरातल का यथार्थ समाहित हो सकता है। इसके प्रतीक कथा का ही हिस्सा हैं, जिससे रचना में अतिरिक्त सौन्दर्य आ गया है।

दान-पुण्य:-यह रचना बड़े कौशल से दर्शाती है कि मानवीयता हमारी आस्थाओं से कहीं ऊपर है। मकर-संक्रांति के दिन दान-पुण्य के लिए निकली कोमल अपने गाँव की सपना को सामने पाती है। सपना कि ज़रूरत उसे सर्वोपरि लगती है। वह उसकी मदद (फीस, किताबों के रूप में) करके ही लौट जाती है। भारतीय सन्दर्भ में इस सन्देश का दूरगामी महत्त्व है। सपना के संवादों से रचना कि भीतरी सहयोगी पर्त को सुदृढ़ बनाया गया है।

स्लीपर सेल:-इस रचना में पितृसत्तात्मक समाज की तीन कड़ियों—पिता, पति, पुत्र—को विशेष सन्दर्भ में कौशल से जोड़ा गया है। पुरुष के ये तीनों ब्रांड स्त्री को अपने नियम-कायदों की कैद में रखना चाहते हैं। अवसर पाते ही उनका व्यवहार पुरुषोचितहो उठता है। हालाँकि अंत तक आते-आते रचना कि विषय पर से पकड़ कुछ ढीली पड़ जाती है। रचना में किसी पात्र का कोई नाम नहीं, जिससे इसका प्रभाव-क्षेत्र बढ़ गया है।

हिसाब-किताब:-कथा-रस और चित्रात्मकता के पंखों से उड़ान भरती यह रचना संवेदना के धरातल पर बड़े पाठक-वर्ग को प्रभावित करने की क्षमता रखती है। एक तरफ कुली शम्भू द्वारा साहब को गाड़ी पकड़ाने की मेहनत और उसके सरोकार, दूसरी तरफ साहब की स्वार्थपरकता और संवेदनहीनता—दोनों को ख़ूबसूरती से साकार किया गया है।

अनुत्तरित:-रचना में कई बार कुछ न कहना भी कुछ कहने से ज़्यादा प्रभावकारी होता है। इस रचना कि नायिका अपने बूते बेटे को पालने वाली माँ है, जो बाद के वर्षों में विदेश बसे बेटे के साथ, चाहकर भी, नहीं रह पाती। फिर भी वह सहेली के सामने बेटे का पक्ष लेकर उसे मानो आँचल में छिपा लेती है। मां की संवेदना का कोई ओर-छोर नहीं, पर बेटे की भूमिका! पाठक खुद सोचे। इसमें नायिका का एक अधूरा वाक्य रचना के निहितार्थ को खूबसूरती से व्यंजित कर देता है।

पुरस्कृत लघुकथाओं पर सुकेश साहनी  की टिप्पणी  :-

पुरस्कृत लघुकथा ‘सोंधी महक’ अपनी सीधी, सरल बुनावट के साथ प्रथम पुरस्कार पाने में सफल रही है। एकदम अछूते विषय पर क़लम चलाने के लिए रचनाकार को बधाई! लघुकथा को पढ़ते हुए महसूस होता है की यह जीवन के अनुभव से उपजी लघुकथा है। एक छोटी-सी दुकान पर सामान लेन-देन के बहाने शैक्षणिक यात्रा पर गाँव में आए विद्यार्थियों के समूह की तुलना प्रतिभाशाली ग्रामीण युवती से की गई है। दुकान पर बैठे बुजुर्ग और छोटे-छोटे बच्चों के संवाद के माध्यम से कथ्य-विकास हुआ है। रचना का अंत रेखांकित करने योग्य है -‘कहते हुए उसने नीचे फेंके हुए खाली पैकेट एवं बोतलें उठा लिये और कचरे के डिब्बे की ओर बढ़ गई।’ रचना के इस अंत से लेखक यह सम्प्रेषित करने में सफल रहा कि गाँव की उस प्रतिभाशाली युवती की तुलना में शहर के नामचीन विद्यालयों से आया विद्यर्थियों का वह समूह कितना ‘शिक्षित’ है।
मशीनी लेखन प्रायः प्रबुद्ध पाठक को प्रभावित नहीं कर पाता। ‘मेरा घर छिद्रों में समा गया’ को पढ़ते हुए लगा यह रचना तो फेब्रिकेट की गई है। बेटों के रूप में हिन्दू ,मुस्लिम, सिख, ईसाई का जिक्र मशीनी अंदाज़ में हुआ। पाठक के तौर पर कुछ निराशा हुई; लेकिन अंतिम अवतरण में लेखक की रचनात्मकता से साक्षात्कार हुआ, तो रचना अन्य रचनाओं से अलग प्रभाव छोड़ने में सफल रही। रचना का समापन देखें -… ‘और माँ भारती?… अब वह दरवाज़े पर टँगी नेमप्लेट में रहती है।’ सांकेतिक अंत ने रचना को मायने तो दिए ही , रचना की गठन को भी साध लिया…
तीसरे स्थान के लिए चुनी गई लघुकथा ‘दान-पुण्य’ मुकम्मल ओर सशक्त लघुकथा है। बहुत ही सार्थक सन्देश देने में सफल है। मकर संक्राति पर दान देने हेतु सामान खरीदने घर से निकली महिला उन्हीं रुपयों से रास्ते में मिली अभावग्रस्त महिला के बच्चे की फीस जमा कर देती है औऱ किताबें खरीदवा देती है। लेखक यह सम्प्रेषित करने में सफल है कि जरूरतमंदों की मदद से बड़ा ‘दान-पुण्य’ कोई नहीं है। रचना पढ़ते हुए रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ जी की ‘गंगा स्नान’ याद आ जाती है औऱ रचना का प्रभाव कम हो जाता है।
पुराने विषयों पर नए कोण से लिखा जाए, तो रचना पाठक को प्रभवित करती है। इस दृष्टि से इन लघुकथाओं में ‘स्लीपर सेल’ उल्लेखनीय है। ऐसे विषयों पर लिखते हुए जिस संतुलन की जरूरत होती है,वह रचना में दिखाई देता है। बचपन की यादों की प्रस्तुति से रचना अर्थगर्भी हो गई है। इस तरह की रचनाएँ भले ही प्रथम तीन में न पाई हों; पर उन्हें इस आयोजन की उपलब्धि के रूप में देखा जा सकता है।
रचनात्मकता की ऊष्मा के साथ कुछ अलग करने की ललक ‘पुरुष हूँ ना’ ‘क्षरण’ औऱ ‘विषय-रोबोट्स’ में देखी जा सकती है। ‘क्षरण’ थोड़ी अबूझ हो गई है। वहीं ‘पुरुष हूँ ना’ विषय में नवीनता के बावजूद औऱ श्रम की माँग करती है। ‘विषय-रोबोट्स’ अंत में जाकर कमजोर हो गई है।
‘हिसाब-किताब’ औऱ ‘बंद’ अपने आप में मुकम्मल लघुकथाएँ है, विषय पुराने होने के बावजूद, पाठकों को प्रभावित करने में सफल हैं। शेष सभी रचनाएँ किसी न किसी कारण से स्वागत योग्य हैं ।सभी रचनाकार साथियों और आयोजकों को हार्दिक बधाई !

पुरस्कृत लघुकथाएँ

प्रथम:सोंधी महक

शर्मिला चौहान

शहर से युवा छात्र-छात्राओं का समूह, शैक्षणिक यात्रा पर गांव आया है । धूप की तपन बढ़ गई थी और आंखों में धूप के चश्मे, स्कार्फ और टोपियों के साथ वे छायादार जगह की तलाश कर रहे थे ।

पास ही एक झोपड़ीनुमा चाय की दुकान देखकर, वे तेजी से आगे बढ़े, मानो अलादीन का चिराग मिल गया हो । कोई पानी की बोतल, कोई शीतल पेय, तो कोई आइसक्रीम की मांग करने लगे ।

दुकान पर बैठे बुजुर्ग ने कहा, ” अरे… बच्चों, आराम से । छोटी सी दुकान है और काम करने वाली एक ही लड़की है, मैं तो बस गल्ले पर बैठा हूँ ।” इस प्रकार उन्होंने युवाओं को शांत किया ।

लड़की, जिसे वे ‘सोनी’ पुकार रहे थे, करीब बीस वर्ष की युवती थी । सादा सलवार कुर्ता, दो गूंथी चोटियां, माथे पर छोटी सी बिंदी लगाए, दिखने में बहुत ही साधारण सी नजर आ रही थी ।

” अब एक एक करके बताइए कि क्या चाहिए ?” मिसरी सी मीठी और शुद्ध भाषा में वो बोली ।

“इस लड़की की आवाज़, इसके रंग रूप से बिल्कुल मैच नहीं खाती ।” दबी फुसफसाती आवाजों को ताक पर रखकर वह फुर्ती से सामान देने लगी ।

सोनी, सधे हाथों से काम कर रही थी और हम-उम्रों की नारी शिक्षा, सशक्तीकरण एवं ग्राम सुधार पर वाद-विवाद सुन रही थी ।

जब बिल का समय आया तो उसने कुछ ही सैकंड में पैसे बता दिए ।

” वाह…! कितनी होशियार हो तुम । शहर में रहतीं तो कितनी उन्नति करतीं, इस उम्र में तुम्हें इस दुकान में काम करना पड़ता है ।” एक लड़की ने सहानुभूति दिखाई ।

“अरे..! बेटी, ये ही दुकान की मालकिन है और मैं तो खाली रहता हूँ तो गल्ले पर बैठ जाता हूँ । सोनी तो खरा सोना है, बारहवीं में आसपास के गांवों में सबसे ज्यादा अंक लाई थी । अभी कॉलेज में सरकार इसे बिना फीस पढ़ा रही है।” सारे बच्चे भौंचक्के रह गए ।

” सोनी दीदी, आज योग और गणित, दोनों कक्षाएं लोगी ?” एक छोटा बच्चा दौड़ता हुआ आया और इतने लोगों को देखकर झेंप गया ।

“हां-हां, एक एक घंटे दोनों सबको बोल देना । और सुन..नए लगाए पौधों पर पानी किसने दिया ?” सोनी ने पूछा ।

“दीदी, कल शाम को सोहम की टीम ने और आज सुबह मेरी टीम ने,सब पौधे मस्त खड़े हैं , एकदम भरे ।” चमकती आंखों से उसने उत्तर दिया ।

“कौन सी परीक्षा देने वाली हो तुम ?” एक युवती ने सोनी से पूछा ।

“बी.एस.सी. गणित अंतिम वर्ष की ।” कहते हुए उसने नीचे फेंके हुए खाली पैकेट एवं बोतलें उठा लिया और कचरे के डिब्बे की ओर बढ़ गई ।

-0-

C-1401, Niharika kankia Spaces.Opposite Lokpuram,Gladys alwares road,THANE ( west) Maharashtra-400610

द्वितीय : मेरा घर छिद्रों में समा गया

चन्द्रेश कुमार छतलानी

माँ भारती ने बड़ी मुश्किल से अंग्रेज किरायेदारों से अपना एक कमरे का मकान खाली करवाया था। अंग्रेजों ने घर के सारे माल-असबाब तोड़ डाले थे, गुंडागर्दी मचा कर खुद तो घर के सारे सामानों का उपभोग करते, लेकिन माँ भारती के बच्चों को सोने के लिए धरती पर चटाई भी नसीब नहीं होती। खैर, अब ऐसा प्रतीत हो रहा था कि सब ठीक हो जायेगा।

लेकिन…

पहले ही दिन उनका बड़ा बेटा भगवा वस्त्र पहन कर आया साथ में गीता, रामायण, वेद-पुराण शीर्षक की पुस्तकें तथा भगवान राम-कृष्ण की तस्वीरें लाया।

उसी दिन दूसरा बेटा पजामा-कुरता और टोपी पहन कर आया और पुस्तक कुरान, 786 का प्रतीक, मक्का-मदीना की तस्वीरें लाया।

तीसरा बेटा भी कुछ ही समय में पगड़ी बाँध कर आया और पुस्तकें गुरु ग्रन्थ साहिब, सुखमणि साहिब के साथ गुरु नानक, गुरु गोविन्द की तस्वीरें लाया।

और चौथा बेटा भी वक्त गंवाएं बिना लम्बे चोगे में आया साथ में पुस्तक बाइबल और प्रभु ईसा मसीह की तस्वीरें लाया।

चारों केवल खुदकी किताबों और तस्वीरों को घर के सबसे अच्छे स्थान पर रख कर अपने-अपने अनुसार घर बनाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने आपस में लड़ना भी शुरू कर दिया।

यह देख माँ भारती ने ममता के वशीभूत हो उस एक कमरे के मकान की चारों दीवारों में कुछ ऊंचाई पर एक-एक छेद करवा दिया। जहाँ उसके बेटों ने एक-दूसरे से पीठ कर अपने-अपने प्रार्थना स्थल टाँगे और उनमें अपने द्वारा लाई हुई तस्वीरें और किताबें रख दीं।

वो बात और है कि अब वे छेद काफी मोटे हो चुके हैं और उस घर में बदलते मौसम के अनुसार बाहर से कभी ठण्ड, कभी धूल-धुआं, कभी बारिश तो कभी गर्म हवा आनी शुरू हो चुकी है… और माँ भारती?… अब वह दरवाज़े पर टंगी नेमप्लेट में रहती है।

-0-3 PA 46,प्रभात नगर, सेक्टर-5, हिरन मगरी , उदयपुर 313 002( राजस्थान)

तृतीय : दान-पुण्य

मान कँवर

कोमल !कोमल सुनो तो !यहाँ आओ।किरण जी ने अपनी बहू को आवाज़ लगई।

“मैं कह रही हूँ कि कल मकर संक्रांति हैं ।इस दिन दान -पुण्य का बहुत महत्व होता हैं।आस-पड़ोस की सारी औरतें कुछ न कुछ बाँटने के लिये लाई हैं।तुम भी काम खत्म करके शहर से कुछ ले आओ  तेरह सुहागिनों को देने के लिये।”

“हाँ मम्मीजी काम तो हो गया।मैं बाजार जाकर ले आती हूँ।”

कोमल जैसे ही घर से निकली सामने सपना आती दिखाई दी।

“नमस्ते भाभीजी।”

“नमस्ते सपना ।कैसी हो?पढ़ाई कैसी चल रही हैं?परीक्षा कब से हैं?”

“अरे भाभीजी!क्या बताऊँ?परीक्षा की फीस भरने के पैसे नहीं थे।मम्मी की बीमारी व ऑपरेशन के बाद मजदूरी भी छूट गई।पापा के जाने के बाद  मजदूरी करके वह मुझे पढ़ा रही थी।थोड़े बहुत पैसे जमा किये थे वह भी खर्च हो गये।मैं बच्चों को ट्यूशन पढ़ा कर माँ -बेटी के खाने का खर्चा व माँ की दवाई का खर्चा ही जुटा पाती हूँ।गाँव होने के कारण और बच्चे भी ज्यादा नहीं मिलते ट्यूशन पढ़ने वाले।”कहकर सपना रोने लगी।

“अरे रो मत सपना!अच्छा बता तेरी फ़ीस अब भी भरी जा सकती हैं क्या?”

“हाँ भाभीजी कॉलेज से ही आ रही हूँ आज मेडम का फोन आया था बुलाया था ।दुगुने परीक्षा शुल्क के साथ कल तक भरी जा सकती हैं!भाभीजी जब सामान्य शुल्क ही नहीं हैं भरने को तो दोगुनी राशि मैं कहाँ से जुटा पाऊँगी?”

“तू चल मेरे साथ!मैं शहर ही जा रही थी मकर संक्रांति पर दान के लिये सामान लेने।”

प्रिंसिपल कक्ष में जाकर कोमल ने मेडम से बात की और सपना की परीक्षा की फीस जमा करवाई।

प्रिंसिपल मेडम ने पूछा कि क्या लगती हैं सपना आपकी?

“मेडम यह मेरे गाँव की एक होनहार बच्ची हैं।पढ़ने की लगन हैं इस बच्ची में।”

कॉलेज से निकल कर कोमल ने सपना से पूछा-

“किताबें तो हैं तुम्हारे पास सारी?”

“भाभीजी पहले तो नोट्स बना लेती थी मगर मम्मी की बीमारी के बाद कॉलेज जाने का समय ही नहीं मिला!”

“अच्छा जिन किताबों की जरूरत हो ले लो ।”बुक स्टोर पर जाकर कोमल ने कहा।

“अब चलो सपना अपने गाँव वाली बस ना निकल जाये!”

“मगर भाभीजी आपका दान-पुण्य वाला सामान?”

“उसकी अब जरूरत नहीं सपना!”

-0-श्रीमती मान कँवर w/o श्री महेन्द्र सिंह  शेखावत,गाँव-भवानीपुरा,पोस्ट -चोमूं पुरोहितान,वाया-खाटूश्यामजी,जिला-सीकर,राजस्थान-332602

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    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
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    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´

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    -सम्पादक द्वय

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