सितम्बर 2026

संचयनलघुकथाएँ     Posted: September 1, 2026

1-जंग लगी साँकल 

    वर्षों से बंद उस घर की साँकल पर जंग इतनी जम चुकी थी कि अब उसे खोलने की कोशिश में हाथ नहीं, स्मृतियाँ छिलती थीं। गाँव के लोग कहा करते कि वह स्त्री किसी की प्रतीक्षा में पत्थर हो गई है, पर वह धीमे से कहती- “प्रतीक्षा देह को पत्थर नहीं, एक दरवाज़ा बना देती है, जिस पर समय निरंतर दस्तक देता रहता है।”

हर संध्या वह आँगन के सूखे कुएँ में एक लोटा जल उँडेल देती। कुएँ में वर्षों से पानी नहीं था, फिर भी वह देर तक झुककर भीतर देखती रहती, मानो अँधेरे की तहों में कोई आवाज़ अब भी ठहरी हो।

एक दिन उधर से गुजरते हुए किसी ने उससे पूछा, “जब कुएँ में पानी ही नहीं, तो यह अर्पण किसलिए?”

स्त्री ने डूबती साँझ को देखते हुए धीमे स्वर में कहा, “कुछ रिश्ते प्यास से नहीं जुड़े होते… वे उस खालीपन से जुड़े होते हैं, जहाँ कभी किसी की आवाज़ उतरती थी।”

वह चला गया।

उस वर्ष गाँव में वर्षा बहुत देर से आई। पहली बारिश की रात, लोग अपने-अपने आँगन समेट रहे थे कि किसी ने देखा कि वह स्त्री भीगती हुई उसी सूखे कुएँ के पास खड़ी है। उसके हाथ खाली थे। वर्षा में पहली बार उसने कुएँ में जल नहीं उँडेला था।

सुबह लोगों ने देखा कि कुएँ की सूखी भीत पर हथेली के आकार की एक भीगी छाप थी…

मानो रात भर किसी ने भीतर से पानी छूने की कोशिश की हो।

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2-नमक की झील

       उस नगर के बीचोंबीच एक झील थी। दूर से वह चाँदी-सी चमकती दिखाई देती, पर उसके भीतर पानी नहीं नमक भरा था। लोग कहते, उसमें उतरने वाली स्त्रियाँ धीरे-धीरे गलने लगती हैं।

पुरुष उस झील के किनारे पगडंडियाँ बनाकर चलते थे। उनके पाँव कभी नहीं धँसते थे। वे जानते थे कि कहाँ पैर टिकाना है, कहाँ मुस्कुरा देना है, कहाँ चुप रह जाना है।

स्त्रियाँ वैसी सावधान नहीं थीं। वे हवा पर भरोसा कर लेतीं। कोई गीत सुनकर ठिठक जातीं, कोई अपना कह दे तो आँखें भीग उठतीं। वे झील के ऊपर झुकी धूप को सच मान लेतीं और उसी चमक में उतर जातीं।

धीरे-धीरे नमक उनकी देह से पहले उनकी आवाज़ खा जाता। फिर इच्छाएँ सफेद पड़ने लगतीं। कई स्त्रियाँ घरों में चलती-फिरती दिखाई देतीं, पर भीतर से उनका कोई हिस्सा गल चुका होता।

एक स्त्री ने एक दिन काँपते हुए कहा- “मुझसे मेरे अपने ही छूट गए…”

घरवालों ने उसकी पीठ सहलाई- “इतना क्यों सोचती हो? सबके हिस्से थोड़ा-बहुत अकेलापन आता है।”

दूसरी ने कहा- “अब मुझमें पहले जैसा कुछ नहीं बचा…”

उत्तर मिला-“कम-से-कम घर तो है तुम्हारे पास।”

तीसरी कई दिनों तक चुप रही। जब उसकी आँखों की चमक बुझ गई, तब आँगन में बैठे लोगों ने धीमे से कहा- “देखो, कितनी शांत हो गई है अब।”

उस नगर में सांत्वनाएँ मरहम की तरह नहीं, नमक की पतली परतों की तरह लगाई जाती थीं,धीरे-धीरे भीतर तक जलाती हुई।

रात को जब सब सो जाते, झील के ऊपर सफेद धुंध उतर आती। उन धुँधों में कभी-कभी स्त्रियों की अधूरी आवाज़ें तैरतीं जैसे कोई भीतर ही भीतर डूबते हुए भी गुनगुना रहा हो।

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3-चौखट के उस पार

    दोपहर शहर की गलियों में धूप की तरह फैली हुई थी। सैन्य वाहन मोड़ से गुज़रे तो उसने अनायास गर्दन उठा ली। वही गली… वही नीम… वही घर जिसकी दीवारों पर कभी उसने अपने बच्चों की ऊँचाई के निशान बनाए थे।

ड्यूटी के बीच मिले कुछ क्षण थे उधार के, अधूरे…।

साथ चल रहे जवान बाहर ही रुक गए। उसने हँसते हुए पानी माँगा। भीतर से उसकी पत्नी आई। पल्लू सँभालते हुए, जैसे वर्षों से किसी अदृश्य अनुशासन को सँभाल रही हो। उसने एक-एक कर सबको पानी दिया। जब गिलास उसके हाथ तक पहुँचा, उनकी उँगलियाँ क्षण-भर को छुईं और वही क्षण भीतर कहीं बहुत गहरे टूटकर गिरा।

वह चाहता था बस एक बार उसके पीछे रसोई तक चला जाए। देखे कि चूल्हे पर क्या चढ़ा है। पूछे बच्चों ने खाना खाया या नहीं। दीवार की ओट में खड़े होकर दो पल पति हो ले…

पर वर्दी के भी अपने संस्कार होते हैं। वे मन को चौखट से आगे नहीं बढ़ने देते।

वह मेहमानों की तरह दरवाज़े के पास बैठा रहा।

पत्नी भीतर-बाहर आती रही। उसकी चाल में हल्का डगमगापन था जैसे कोई बहुत दिनों से अपने आँसू उठाए चल रहा हो। उसने पहली बार गौर से देखा, उसके बालों में सफ़ेदी चुपचाप उतर आई थी।

“सब ठीक है न?”

उसने धीमे से पूछा।

पत्नी ने सिर हिला दिया।

पर उस “हाँ” में इतना कंपन था कि उसका सैनिक होना अचानक बहुत छोटा पड़ गया।

कुछ देर के लिए उसे लगा, सीमा पर खड़े रहना शायद आसान है, घर की देहरी पर खड़े रहना कठिन।

बच्चे भीतर कमरे में थे। शायद जानबूझकर बाहर नहीं आए। वे जानते थे पिता जब भी आते हैं, थोड़ी देर बाद फिर चले जाते हैं। बच्चों ने प्रतीक्षा से बचना सीख लिया था।

उसने गिलास नीचे रखा। आँखें एक बार पूरे आँगन पर फिराईं तुलसी, रस्सी पर सूखते बच्चों के कपड़े, दरवाज़े की उखड़ती पुताई… सब उसे ऐसे देख रहे थे जैसे घर नहीं, समय खड़ा हो।

कदम रुकना चाहते थे।

पर उसे अचानक भय हुआ यदि कुछ देर और ठहर गया, तो भीतर वर्षों से बाँधा हुआ बाँध टूट जाएगा।

वह उठा। पत्नी पास आई।

उसने चाहा, उसे सीने से लगा ले, उसके काँपते कंधों पर अपना माथा रख दे, और कहे कि वह भी थकता है… पर उसने केवल उसके कंधे पर हाथ रखा। हल्के से दबाया और बाहर निकल आया।

फिर मुड़ गया।

गली से बाहर निकलते समय उसने पीछे नहीं देखा।

उसे डर था-

कहीं घर उसे रोक न ले।

वह जनता था कि कुछ रिश्ते मुड़कर देखने भर से बिखर जाते हैं और उस दिन पहली बार उसे लगा देश की रक्षा करते-करते कुछ सैनिक धीरे-धीरे अपने ही घरों से निर्वासित हो जाते हैं।

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4-तितली

       उसकी छुट्टी का आख़िरी दिन था। बैग पैक करते हुए वह बोला- “इतना प्रयास करने पर भी कुछ नहीं बदला। मेरा भविष्य कुहासे की ओट में सोया मिलता है। अतीत रंगमंच पर बार-बार दोहराया जाता है, वहीं वर्तमान कोकून है।”

एक नज़र लड़की पर डालते हुए फिर बोला- “तीस वर्ष बाद भी शायद मुझे शून्य से ही शुरू करना होगा… तुम समझ रही हो न?”

वह उसके और पास आकर एकटक उसे निहारने लगा।

लड़की ने धीमे स्वर में कहा- “शून्य नहीं डराता… डर तब लगता है, जब किसी को वहीं रोक दिया जाए।”

वह मुस्कुराई- “कुहासा… कोकून… और यह चमकता रेशम अक्सर किसी उड़ान की कीमत होते हैं।”

उस दिन वे दोनों बहुत हँसे।

उसके बाद लड़की ककून बन कोकून में सिमट गई।

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5-मुर्दाख़ोर

           मैं बहुत पहले मर चुका था। यह यूँ ही नहीं कह रहा हूँ मैंने अपनी मौत का तमाशा अपनी ही आँखों से देखा है; अपने लिए उठे विलाप को सुना है, अपने ही कमरे से अपनी चारपाई को बाहर जाते देखा है। गाँव की संकरी गलियों में मेरी मौत की खबर धुएँ की तरह फैलती चली गई धीमी, पर चुभन लिये।

मुझे लगा अब बंधन टूट गए। पर हैरानी तब हुई, जब पता चला कि मैं आज भी जिंदा हूँ राशन कार्ड में, मतदाता सूची में, और सरकारी दफ्तरों की ठंडी मेज़ों पर। मेरी राख उड़ चुकी थी, पर मेरे दर्जे अब भी काग़ज़ों पर पसरे पड़े थे सूचियों में, जिलों की धूल भरी पेटियों में।

उस सुबह मैंने अख़बार खोला। भीतर कुछ चटख-सा गया।

मुखपृष्ठ पर मोटे अक्षरों में लिखा था-“विधानसभा में उठाया गया मुद्दा, मुर्दों के साथ छेड़-छाड़।”

मैंने सिर झुका लिया। दिल किसी अँधियारे कुएँ में सरक गया।

पहले लगा, यह भी और खबरों की तरह धुआँ बनकर छँट जाएगा। पर मंत्री का बयान देह में सिहरन की तरह उतर गया-

“कब तक यूँ ही मुर्दों के साथ छेड़-छाड़ होती रहेगी!”

मेरी मृत्यु की तारीख भी दर्ज है, नाम भी; पर मेरा मरना ही सबसे अस्थायी घटना निकली। स्थायी तो मेरी उपस्थिति है जहाँ मैं नहीं हूँ, पर हर बार मुझे बुला लिया जाता है।

मेरे मरे अंगूठे का निशान हर साल नया होकर लौट आता जैसे चिता की आग अब भी मेरी उँगली में दबी हो। कौन रखवाला है जो मेरी उँगलियों को खूँटे से बाँधे बैठा है? कौन है जो मेरे मरने को मानने से इंकार करता है?

मरघट में चिताएँ उतरती-चढ़ती रहीं, नाम बदलते रहे पर मैं वही का वही रहा। हर चुनाव में, कोई अनजान हाथ मेरी उँगली पकड़कर मेरी ही पहचान पर निशान लगा आता है।

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