1-रपट

दीवार हूँ मैं। आज फिर मैं बहुत फूट-फूट कर रोई हूँ। अपने कानों से सुना और बिन आँखों देखा भी। मानती हूँ पाषाणहृदया हूँ मैं, पर मेरा हृदय आर्द्र हो गया।
वह मृगनयनी वनबाला। साँवली स्वेद बिंदुओं से दमकती देह पर बेरहमी से रक्त स्रवित खरोंचे लिये, भयाक्रांत आँखों में अश्रुओं को साध कर, रपट लिखाने ही तो आई थी।
“क्या हुआ था तेरे साथ?” एक कड़क आवाज़ और सर से पाँव तलक घूरती कई जोड़ी भूखी आँखें।
“जी! जी!” गले के अंदर गहरे डूब गए शब्दों को किसी प्रकार बाहर निकालने में वह नाकाम रही। घबराकर धीरे से सिर झुका लिया। साँवले पद्म-पद से कठोर फ़र्श को खोदने की व्यर्थ ही कोशिश करने लगी।
आज वह असहृय पीड़ा से कराहती मेरे सामने ही फ़र्श पर निढाल पड़ी है। शरीर पर खरोंचों के निशान बढ़ गए हैं, नीले निशान लिए चेहरा और अधिक सूज गया है। रपट के रजिस्टर का कोरा पन्ना फड़फड़ा रहा है और मैं बेबस, मूक हूँ।
-0-
2-चश्मे
बेबी लगातार रोए जा रही थी। हुआँऽऽ-हुआँऽऽऽ का स्वर धीरे-धीरे ऊँचा होता हुआ घर के सभी बंद दरवाजों वाले कमरों में घुस गया। …और फिर धड़ाधड़ सभी दरवाजे खुले… दरवाजों से निकले कई जोड़ी चश्मे।
“क्या हो गया?”
“बेबी को क्या हो गया?”
परेशान हो सभी चश्मे मोबाइल में झाँकने लगे। गूगल सर्च इंजन ऑन हो गया।
“मस्ट बी हैविंग सम ब्रीदिंग इश्यू।”
“बेबी ने कितना एम. एल. मिल्क पिया था?”
“किस कंपनी का फार्मूला था?”
कुछ प्रश्न कुछ समाधान यहाँ-वहाँ भटकने लगे।
झुर्रियों वाली दो आँखों पर चढ़ा तजुर्बे का चश्मा मुस्कुराया बोला-“बेबी पेट की ओर पैर मोड़ रही है जरा-सी हींग घोलकर नाभि पर लगा दो। बस कुछ ही देर में आराम मिल जाएगा।”
और बस कुछ ही देर में बेबी आराम से सो गई।
गूगल इंजन सर्च करते सारे चश्मों में से झाँकती छोटी-छोटी आँखें बड़ी होकर तजुर्बे के चश्मे को देख रही थीं।
3-बूट
आसपास धुआँ ही धुआँ! चारों और मौत का मंजर! कभी सायरन की आवाज, तो कभी ह्रदय को कंपा देने वाले गोलों के धमाके। कलेजा मुँह को आ जाता।
एक आस लिए पापा की बाट जोहते माँ, दीदी और मैं। बीच-बीच में खंडहर हुए घर की दीवार की झीरी से झाँक लेती। दूर-दूर तक लपट ही लपट! सुलगता सब कुछ।
ठक! ठक! ठक! समीप आती भारी-भरकम बूटों की आवाज! मैं और माँ दौड़कर अलमारी के पीछे छिप गए और दीदी कंटेनर के पीछे।
बूटों की आवाज़ समीप आ गई… बिल्कुल करीब।
सहसा दीदी की चीख…माँ ने झट मेरे मुँह पर हाथ रख मुझे कसपर पकड़ लिया। चीख घुटकर अंदर ही समा गई।
धीरे धीरे दीदी की चीख सिसकियों में बदल गई… लौटते बूटों की ठक, ठक दूर जा रही थी।
सामने जलती, सुलगती, धधकती, सिसकती दीदी…
ज्वालाएँ! ज्वालाएँ!
-0-
4-सोच
बार-बार आँखें घड़ी की ओर चली जातीं। क्या हो गया है आज घड़ी के काँटे सरकने में कितना अलसा रहे हैं। अभी भी चार ही बजे हैं। छह बजे तक पहुँचेगा मेरा लाडला। महीनों हो गए बेटे को देखे। उँगलियों पर गिना, तो साल पूरा होने आया। हैं भी कितनी दूर! फौजियों का ठिकाना ही कभी हिमशिखरों पर होता है, तो कहीं बंजर रेगिस्तान में। उसकी सूरत देखने को आँखें तरस रही हैं, कलेजे का टुकड़ा मेरा…आँखें फिर भर आईं। ख़ुद को संभाल वह लॉन में चहलकदमी करने लगी।
“गुड ईवनिंग मिसेज सक्सेना।”
पलट कर देखा- “अरे मिसेज वर्मा आप! आइए। आइए। आज वीनू आ रहा है तो बस उसी कि वेट कर रही हूँ।”
“जी ईवनिंग वॉक के लिए निकली हूँ। बेटा कहाँ है आजकल।”
“जी वीनू लद्दाख में पोस्टेड है।”
“लद्दाख?”
“हाँ जी वह आर्मी ऑफिसर हैं न मेरा वीनू। कैप्टन विनय कुमार सक्सेना।” कहते हुए मेरी गर्दन अपने आप कुछ तन गई।
“वाह जी वाह! बहुत बढ़िया लाइफ होती है आर्मी वालों की तो…आप तो बड़े लकी हो।”
मेरे अंदर एक तूफान-सा उठा पर शांत भाव से बोली, “आप भी अपने बिट्टू को आर्मी ज्वाइन करा दीजिए। एक्जाम वगैरह के लिए वीनू गाइड कर देगा उसे।”
“न बाबा न! इकलौता बेटा है मेरा।”
तो क्या? इकलौता तो मेरा वीनू भी है। फिर आप-आप ही कह रही हैं कि फौजियों लाइफ़। “
मेरी बात पूरी भी न हुई थी कि वे बीच में ही बोल पड़ी, “मिसेज सक्सेना मैं आप जैसी पत्थर दिल नहीं हूँ। चलती हूँ। बाय!”
मैंने अपने दिल पर हाथ रखा अंदर कुछ बहता-धड़कता महसूस हुआ। देश के लिए धड़कता दिल, बेटे की ममता में धड़कता दिल।
-0-
5-दुश्मन?
सुलगता शहर, आसमान छूता धुआँ, खंडहर में तब्दील हो चुकी गगनचुंबी अट्टालिकाएँ…आग उगल, थककर चूर शांत बैठी भयानक गन्स, चारों ओर बिखरे क्षत-विक्षत शव…बेपर्दा हो चुका इंसान।
वातावरण की नीरवता भंग करती गश्त लगाती वह। उसके भारी भरकम बूटों की ठक्-ठक् स्वयं उसके मन में हलचल पैदा कर रही थी।
सहसा वह ठिठककर थम गई…किसी की सिसकियों का स्वर… सिसकियों का पीछा करते वह उस ओर मुड़ गई।
माँ के शव से लिपटे मासूम की आँखें उसकी ओर उठीं। वह कातर और भय मिश्रित निगाहों से उसे देख ज़ोर से रोने लगा। शायद बच्चा भूखा भी था। उसे अपने नन्हे की याद हो आई। सहसा उसे अहसास हुआ कि उसकी आँखों की कोरों के साथ आँचल भी भीग गया है।
अपनी गन एक ओर जर्जर दीवार से टिका, उसने नन्हे को अपने आँचल में ले लिया।
दीवार से टिकी गन फ़र्श पर औंधी पड़ी हुई थी।
-0-
6-लव यू…
“पुत्तर जल्दी से तैयार होकर आजा नाश्ता ठंडा हो रहा है।”
“जी।” कह कलाई पर घड़ी बाँधते हुए कावेरी ने मीत की ओर देखा।
‘‘मैंने कहा था कि कोई परेशानी की बात नहीं सब अपने आप मैनेज हो जाएगा,’’ टाई की नॉट बाँधते हुए मीत बोला।
“याह आय एम सॉरी।” सिर झुका कावेरी धीरे से बोली।
इन फैक्ट जब मीत ने उसे बताया था कि उसके बीजी और बाऊजी तीन महीने के लिए उनके पास आ रहे हैं तो वह बहुत परेशान हो गई।
एक तो लव मेरिज, मेरिज के तुरंत बाद दोनों यहाँ लंदन आ गए। अभी वह नए परिवार में सबको ठीक से जान और समझ भी न पाई थी।
उस पर दोनों का जॉब…भागम भाग, यहाँ हर काम ख़ुद ही करना पड़ता है। नो मेड्स। ऐसे में बीजी और बाऊजी का आना।
“कैसे हो पाएगा सब मीत? अपना तो एनी हाऊ चल जाता है।” घबराकर उसने मीत से कहा, तो वह बड़ी लापरवाही से बोला-“सब हो जाएगा हनी। डोंट वरी।”
और फिर सच में बीजी-बाऊजी के आने से उनकी ज़िन्दगी सरपट दौड़ने लगी है।
बीजी ने किचन सम्हाल लिया है और बाऊजी पास के स्टोर से फल-दूध सब्जियाँ लाकर फ्रिज में रख देते हैं।
“पुत्तर आराम से नाश्ता करीं। तेरी पसंद का इडली-साँभर बनाया है।”
“जी बीजी।” केरल के मलप्पुरम में पली-बढ़ी कावेरी ने बीजी की ओर प्यार से देखा तो उसकी बड़ी-बड़ी आँखों से दो मोती झर गए।
“ओह पुत्तर जी ये क्यों?”
“मे आई हग यू अम्मा?” अपनी बाँहें फैला वह बीजी से बोली।
“ओय मेरा बच्चा! मेरी नूँ!” बीजी ने उसे अपने आँचल में समेट लिया।
“लव यू बीजी!” बुदबुदाते हुए वह बीजी से लिपट गई।
-0-