1-मूक अन्तरात्मा
यह ठीक है, मैं उस आदमी को जानता हूँ जिसने खुल्लमखुल्ला व्यस्त सड़क पर तेज धार वाली चमचमाती छुरी से एक आदमी का कत्ल कर दिया। मैं उस आदमी को भी पहचानता हूँ जो अब रक्तरंजित लाश के रूप में तब्दील हो गया है।
“चुप रहो!” मैंने अपनी अंतरात्मा से कहा।
“बिल्कुल चुप रहो, तुम कुछ भी मत बोलो… मत बोलो, मत टोको! मत झिंझोड़ो मुझे! कोई मरे… कोई जिए… मुझे क्या!”
मैं मन ही मन बुदबुदाया, “अधिकतर लोग जानते हैं, मुझसे बेहतर जानते हैं। फिर क्या मुझे पागल कुत्ते ने काटा है, जो इस भीषण रक्तपात का एकमात्र चश्मदीद बनूँ… न! बुद्धिमानी इसी में है कि मैं भी भाग चलूँ यहाँ से। दूसरों की तरह बिल्कुल गैर-जिम्मेदार अंदाज में कि कुछ देखा ही नहीं, कि कुछ हुआ ही नहीं। कौन करे पुलिस को इत्तला, कौन दे गवाही। कौन डाले अपनी जान सांसत में। भाड़ में जाए इंसानियत!”
उधर देख… सब दुकानों के शटर गिरने लगे हैं। कैसी भगदड़ मची है चारों तरफ! देखना थोड़ी ही देर में सायरन की आवाज सुनाई देगी और यहाँ खाकी वर्दियों का सैलाब आ जाएगा। तू कहती है कि मैं कातिल का नाम बता दूँ! क्या तू चाहती है कि मैं इन डरावने वर्दीधारियों के हत्थे चढ़ जाऊँ! उन काले कोटधारी कानून के पंडितों का जजमान हो जाऊँ? उनके बेसिर-पैर सवाल-जवाब से तंग आकर आत्महत्या कर लूँ? वैसे भी कातिल चश्मदीद गवाह को बचाएगा नहीं।
मैंने अपनी अंतरात्मा से कहा, “तुम्हारे झांसे में आने वाला नहीं। उसूल यही है कि चुपचाप खिसक लूँ और दुबक लूँ अपने दड़बे में, ताकि एक ठंडी साँस लेकर इत्मीनान से कह सकूँ कि ‘जान बची तो लाखों पाए, लौट के बुद्धू घर को आए’। तू बिल्कुल फिकर मत कर मेरी अंतरात्मा। आदमी ऐसा ही निर्लिप्त अच्छा लगता है। उसकी यही तटस्थ भावना उसको सदा मुक्ति प्रदान करती है। आदमी जितना अधिक स्वार्थी होगा, वह उतना ही सफल दुनियादार माना जाएगा।”
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2-सुलोनी
बत्तीस साल के बाद मैंने उसे देखा। उसकी देहयष्टि में वैसी ही मादकता थी। उसकी आँखें वैसी ही खूबसूरत, वैसा ही उसका साँवला मुख मण्डल, दिखने में सुघड़ सलौनी बेहद आकर्षक, लेकिन उसने मुझे नहीं पहचाना। या हो सकता है उसने न पहचानने का अभिनय किया हो। अद्भुत संयोग था उस दिन! मेरी दाईं आँख में सुलोनी निकल आई थी। धर्म पत्नी साथ में थी,उसने उलाहना के स्वर में कहा -“खुचरा पाप है, खूब सेंकी थी आँखों को, उसी का प्रताप है जो निकल आई है आँख में ‘सुलोनी’। मैंने भी तपाक से हँसते हुए कह दिया – “ना”
सलोनी जो बाहर थी, वही आँख में बस गई है।अब पत्नी को हूँकते बन रहा था न भूँकते।
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3-वरदान
आखिर मुख्यमंत्री दौरे से अपने निवास लौट रहे थे। वे प्रसन्न थे। गेट पर उन्होंने एक दुबले-पतले, फटे-पुराने कपड़ों में रिटायर्ड मास्टर को देखा। वह तंबू उखाड़कर, बैनर लपेटकर जाने को तैयार हो चुका था, तभी उसके कानों में कार की आवाज सुनाई दी और वह ठिठक गया।
मुख्यमंत्री ने गेट पर ही कार रुकवा दी। उन्होंने दयार्द्र होकर मास्टर साहब को उसी प्रकार देखा जैसे यमराज ने अपने दरबार पर भूखे-प्यासे नचिकेता को देखा था। कार से उतर, हाथ जोड़े मुख्यमंत्री ने मास्टर साहब के आगे खड़े होकर पूछा- “कैसे आना हुआ मास्टर साहब? कब से पधारे हैं?” मुख्यमंत्री के विधानसभा-क्षेत्र से ही वे मास्टर साहब आए थे, अतः उन्हें पहचानने में कठिनाई नहीं हुई।
परिचित मुख्यमंत्री को सामने पाकर मास्टर साहब ने उलाहना भरे स्वर में कहा, “क्या कहें साहब! हमें रिटायर हुए तो दो साल हो गए, लेकिन अभी तक न तो ग्रेच्युटी मिली और न ही पेंशन केस बना। इधर-उधर बहुत लिखा-पढ़ी की, कोई सुनता ही नहीं, तब आपके पास गोहराने आए हैं। तीन दिन से भूखे-प्यासे आपके दरवाजे पर पड़े हैं।”
लज्जा का अनुभव करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा- “क्षमा कीजिए! आप तीन दिन से यहाँ भूखे-प्यासे पड़े हैं, तो तीन वरदान मांग लें।”
मास्टर साहब को विश्वास नहीं हुआ। वे अवाक् देखते रहे। मुख्यमंत्री ने वरदहस्त की मुद्रा में कहा, “आपके पेंशन पर शीघ्र विचार किया जाएगा।” इसे सुनकर मास्टर साहब खुश हुए।
मुख्यमंत्री ने आगे कहा- “जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही की जाएगी।” दूसरे वरदान से मास्टर साहब और अधिक खुश हो गए।
तीसरा वरदान मुख्यमंत्री दें, इसके पूर्व ही संतरी ने सलाम बजाकर कहा- “हुज़ूर! यह बूढ़ा यहाँ तीन दिन से अनशन कर रहा था।”
सुनकर अचानक मुख्यमंत्री की आँखें लाल हो गईं। उन्होंने यमराज जैसी घोर गर्जना की- “इस मनहूस को मेरे सामने से दूर करो और जेल में ठूँसवा दो!”
यह उनका तीसरा वरदान था।
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4-रील्स की दुनिया
स्मार्टफोन के स्क्रीन पर ‘लाइक्स’ और ‘व्यूज’ के आंकड़े रॉकेट की तरह ऊपर भाग रहे थे। वह अपनी नई रील की सफलता देख फूला नहीं समा रहा था।
वीडियो में अपनी पत्नी को खड़ा कर वह कह रहा था— “दोस्तों, घर की माली हालत खराब है और इसके खर्चे बहुत हैं, इसलिए अब मैं इसे किराए पर दे रहा हूँ। जिसे चाहिए, इनबॉक्स में आएं।”
सोशल मीडिया का संसार उबल पड़ा। भले गालियों और लानतों से उसका इनबॉक्स भर गया, लेकिन उसके ‘फॉलोअर्स’ की संख्या रातों-रात लाखों के पार कर गई। वह गद्गद था। वह यही तो चाहता था। उसे अपनी गरीबी मिटाने का ‘डिजिटल फॉर्मूला’ मिल गया था।
दूसरी ओर, उसकी पत्नी हतप्रभ थी। समाज की संवेदना और पति की मर्यादा, दोनों ही उस वायरल रील के कमेंट सेक्शन में दम तोड़ चुके थे। वह अपनी ‘जीत’ का जश्न मना रहा था, जबकि वह सोच रही थी— उस घर की छत तो शायद बच जाए, मगर जिस गरिमा को उसने नीलाम किया है, उसे वह किस ‘ऐप’ से वापस लाएगा?”
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5-कलरव का अलार्म
अब मुनिया की नींद सुबह चिड़ियों के कलरव से नहीं, बल्कि खिड़की से छनकर आती गाड़ियों के कर्कश भोंपू और कड़वे धुएँ की गंध से खुलती है।
मुनिया को याद है कि इसी बुद्ध-चित्र के पीछे कभी गौरैयों का सजीव संसार धड़कता था। बिल्ली की आहट पाते ही पूरा आँगन नन्ही चीखों और फुर्र-फुर्र की ध्वनियों से गूँज उठता था। तब मुनिया की बेचैनी भी गौरैयों जैसी ही होती थी। किंतु आज? आज बुद्ध शांत थे और कमरा निष्प्राण।
मुनिया छत पर आई। जहाँ कभी अमरूद और मुनगे की टहनियाँ हवा में झूलती थीं, वहाँ अब कंक्रीट का एक दोमंजिला मकान खड़ा था। “मुनिया बिटिया, नीचे वाले हिस्से का किराया बढ़ा दिया है; किराया लेते समय देख लेना,” पीछे से पिता की आवाज़ आई।
मुनिया चुप रही। उसकी नज़र सूनी मुँडेर पर टिक गई। न कोई तिनका, न कोई चिड़िया। सारा आकाश धुंध की धूसर चादर में लिपटा हुआ था।
“बाबूजी, नए किराएदार तो आ गए, पर वे पुराने बाशिंदे कहाँ बेदखल हो गए?” उसने सूनी मुँडेर की ओर इशारा किया।
पिता निरुत्तर रहे। शहर बड़ा हो गया था, पर परिंदों के लिए आसमान छोटा पड़ गया था। मुनिया की आँखों में नमी थी और भीतर एक हूक—कि काश! वह प्राकृतिक अलार्म फिर से गूँज उठता।
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बसन्त राघव,पंचवटी नगर,मकान नं. 30,कृषि फार्म रोड,बोईरदादर, रायगढ़,पिन 496001
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