जून 2026

संचयनलघुकथाएँ     Posted: June 1, 2026

1-अगोचर

अचानक उसने पहाड़ी से उतरते हुए भेड़-बकरियों का रेवड़ देखा, जो किसी डर से ओक-बुरांश के पेड़ों से बचता-बचाता दौड़े चला जा रहा था – बाऽऽ…. बाऽऽ… बाऽऽ…

एक पल उसने मनीषा की ओर देखा जो एक बकरी के बच्चे को अपनी छाती से चिपकाए जी-जान से रेवड़ को रोकने की कोशिश कर रही थी. वह अभी कुकीना स्वाल पर रेवड़ के साथ कुछ देर और रहना चाहती थी, किंतु एक गुलदार (तेंदुए) को जाने मनीषा के रेवड़ से क्या ले जाना था कि ओक की ओट में घात लगाने लगा. बहादुर मनीषा ने चिल्लाकर गुलदार को दुत्कारा, फिर भी वह न टला तो ओक यह देखकर अपनी जान से खेल गया और जड़ों से उखड़कर उसी पर गिर पड़ा.. उसके साथ उसकी टहनियां और पत्ते भी. गुलदार अपनी चोटों से कराहता मोनाल टॉप की ओर भागा… और रेवड़ कुकीना खाल की ओर… दोनों एक-दूसरे के विपरीत दिशा में।

मनीषा ने अपनी सांसें बटोरकर ओक से कहा, “ऐसा क्यों किया?” ओक ने पत्तियां झपकाईं और दो कदम नीचे खिसक गया… उसकी जड़ें जमीन के बाहर निकल आईं।

मनीषा को समझ नहीं आया।

मनीषा कुकीना वाल पर रेवड़ के साथ अकेली ही आती थी, किंतु इस कदर जंगल उसके साथ जुड़ा था… यह उसे आज अहसास हुआ…

अब वह जब थककर चूर हो जाती है, तो सुस्ताने के लिए उसी ओक के तने से सटकर बैठ जाती है.. और आंखें मूंद लेती है… फिर देखती है उस न दिखने वाले को….

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2- ग़मख़्वार 

  “गुल्ली डंडे के खेल में जमीन पर दूरी नापने में बेईमानी करना, नैना के अहाते में पदना और पदाने का अभ्यास करना, अमरूद के पेड़ पर चढ़कर टहनियाँ  काटना और शकूर चाचा को पता ना लगना।”, अपनी आधी पकी दाढ़ी को खुजलाते हुए उसे आज स्मरण हो आया।

  आज भी वह ओस भीगी सुबह में अँधेरा ओढ़कर सोई हुई पगडंडी पर चलने में वही उमंग महसूस कर रहा है। आज का दिन उसकी स्मृतियों के दृष्टिकोण से स्वर्णिम दिन है। वह खेत में खड़ा लंबी -लंबी साँसे खींचता रहा, जब उसने पूरी सुबह अपने भीतर भर ली तो चुपचाप उकडूं बैठ गया और खेत की आँखों में एकटक झाँकता रहा।

   सुबह के सात बजे हैं,खेत सुस्ता रहा है, किरणों ने ओस को झुलसाना शुरु कर दिया है। उसने खेत के खुरदरे हाथों का स्पर्श कर नाड़ी देखी और जरा चिंतित लहजे में कहा,”तुम ज्यादा उर्वरक ले रहे हो?”

  खेत ने कोई जवाब उसकी नजरों में नहीं टांका।

  वह कृषि वैज्ञानिक है, खेतों के पास जाकर उनका इलाज करता है। फफूँद, जीवाणु, विषाणु, कीट जैसे घातक रोगों के बहुत खेत होते हैं। सब के सब हारे-थके परम्परागत फसल पर भरोसा करने वाले। इन जानलेवा  रोगों का उसके पास इलाज है फसल -चक्र… लेकिन जिस बीमारी से खेत आजकल जूझ रहे हैं उसका उपचार उसके पास नहीं है। उस बीमारी ने कई खेतों को अकाल मौत के हवाले कर दिया, जिससे यह खेत भी पीड़ित है।

  वह बीमारी को पकड़ने की नाकाम कोशिश करता रहा, फिर जाने क्या हुआ… एक भयंकर शोर आया -जे सी बी और महंगी कारों का, तो उसे लगा खेत उसका हाथ पकड़ने की कोशिश कर रहा है… जैसे कह रहा है, “यही है बीमारी, मुझे इससे बचाओ… मैं सोसाइटी की चाहरदीवारी के भीतर कैद होना नहीं चाहता।”

   वह खेत के लिए चिंतित हो गया, फिर मुकदमा और स्टे इतने त्वरित अंदाज में हुआ कि खेत स्वस्थ्य होकर उसे दुलराने लगा।

  खेतों की पगडंडियों में अब उसकी चर्चा है।

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3-  विजेता 

   बोतल हाथ से गिरकर टूट गई, लड़खड़ाते हुए चंदी सिंह महाविद्यालय की ओर बढ़ा। एक कक्ष के सामने रुककर अपना परिचय दिया, तो चंदी सिंह को आश्चर्य हुआ की प्रोफ़ेसर के चेहरे पर न तो चकित का भाव आया और न आँखों में डर।

चंदी सिंह का आहत -अहं कुनमुनाया, उसे दबाते हुए उसने प्रोफेसर से कहा, “मैं तुम्हारी क्लास का मुआयना करूंगा।”

“क्या?” प्रोफेसर के लिए यह स्थिति घडों  पानी पड़ने जैसी थी कि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र का चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी प्रबंध समिति में चुनकर उसकी क्लास जाँचने आया है।

 अपने छात्रों क़ी प्रतिक्रिया देखे -जाने बगैर प्रोफेसर ने शिष्टाचार के लिहाज से उसे बड़े आदर से कहा, “आइये प्लीज…”

  चंदी सिंह ने अपनी जगह बनाते हुए प्रोफेसर को जरा -सा धकेला, तो प्रोफेसर क्लास से बाहर आ गया।

  चंदी सिंह ने छात्रों पर ऑंखें जमाए कहा, “परीक्षा में नकल क़ी सुविधा है?”

  छात्रों का समवेत स्वर गूँजा , “हाँ जी!”

   सुनकर चंदी सिंह अपने पूरे मामूलीपन में तब्दील होते हुए मुस्करा पड़ा। बाहर आकर प्रोफेसर को कंधे से आश्वस्त किया। प्रोफेसर ने एक पव्वे के पैसे दिए और बाकायदा गेट तक आकर विदा किया।

   चंदी सिंह क़ी विदाई एक विजेता क़ी विदाई जैसी थी।

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4-खानदानी 

   मेरी पत्नी चीखकर बात शुरू करती और शीघ्र ही आपा खो बैठती। कभी -कभार मुझे उसकी चीख जायज भी लगती।

   मैं महसूस करता हूँ, संयुक्त परिवार के प्रति मेरा मोह एक सीमा क़ी माँग करता है, परन्तु मेरी पत्नी इस मोह को एकल परिवार क़ी दृष्टि से देखने लगती है, तो मुझे उसके संस्कारों पर दया आती है, जिसमें वह जन्मी -पली है। कभी -कभी वह अंट -शंट बोलते हुए घर सिर पर उठा लेती है। शुरु -शुरु में मैं सोचता ‘खानदानी ‘ऐसी ही होती होंगी, क्योंकि जब मेरी शादी तय हुई तो यह गुण बताया था कि लड़की पढ़ी -लिखी तो नहीं है, परन्तु खानदानी है। एक दिन तो हद हो गई जब उसने मेरी ओर लाल -पीली आँखों से देखते हुए कहा, “घर की सफाई, कपड़े धोना, खाना बनाना कोई खानदानी करता है?”

   आज मेरा माथा ठनका, जब मैंने बेटे को खाना बनाते देखा… तो पता चला बहू भी खानदानी है।

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5-साँझ का भूला 

    टूटी दीवार पर फिर नज़र उठ गई। हल और जुआ दिख रहे थे, जैसे दोनों हाथ ऊपर उठाए उसे पुकार रहे हो, की वह फिर लौट आए और बैलों पर रखकर खेत जोते… और  इस जानलेवा घुटन से उभार दे, तभी बैलों का भी ख्याल आया उसे।

  उसने पलटकर देखा, आवारा छोड़ा बैल चौखट पर बैठा है, और जुगाली कर रहा है। वह खाट पर बैठा बीड़ियाँ फूँकता रहा। उसने फिर चौखट की ओर झाँका, बैल की छिली -फटी देह देखते ही, उसका दिल बैठने लगा। ट्रैक्टर से जुताई के लालच में उसने पत्थर का बनके बैलों को बोझ समझकर आवारा छोड़ दिया था। उसकी कुछ समझ में नहीं आ रहा था, वह बड़बड़ाया, “किसान का अस्तित्व तो मोम के ढेर जैसा होता है कितना भी सख्ती का आवरण ओढ़े… पिघलने की स्वाभाविक प्रक्रिया से बच नहीं पाता।”

  उसने देखा बैल गरदन उठाकर उसे ही देख रहा है, उसने पास जाकर पूछा, “दर्द हो रहा है?”

 “बड़ा आया हमदर्दी दिखाने… ऐसा ही था तो मुझे मरने कू नहीं छोड़ आता?”, जैसे बैल की आँखों ने कहा।

  उसने धीरे से बैल की गरदन सहलायी तो बैल खड़ा हो गया, उसने बुग्गी से बरसीम उतारी और गट्ठर का बंद खोलकर बरसीम बिखरा दी, फिर बैल की गरदन सहलाते -सहलाते उसमें ही मुँह छिपाकर सुबकने लगा और ईश्वर से प्रार्थना करने लगा की दूसरा भी लौट आए।

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6-पोर्टर

कसोल छूट गया है। बारिश हो रही है. पहाड़ से सौंधी गंध आ रही है। चीड़, हिमालयन ओक, रोडोडेंड्रोन सब धुल रहे हैं। आधे लकड़ी आधे पत्थर के कॉटेज भी घुल रहे हैं। हमें सार-पास जाना है। रेनशीट से मेरा रुकसैक छितरा गया है।

मैंने जोर से पुकारा, “भारत!”

वह मुस्कराकर बोला, “क्या वजन लग रहा है?”

“हाँ लग तो रहा है।” सहमते हुए मैंने कहा।

“पोर्टर कर लो।” और कुछ बुदबुदाता हुआ आगे बढ़ गया।

ट्रैकर की लंबी लाइन धीमी गति से चढ़ती जा रही है। मैं चाहकर भी सबसे आगे नहीं निकल सका और अपनी धीमी गति के कारण लाइन के पीछे-पीछे चढ़ता गया, मानो उनका अनुयायी बन गया होऊँ। बारिश रुकी तो गाइड ने भी रुकने का इशारा किया। पोर्टर ने भी मेरा रुकसैक पहाड़ की पीठ पर रखकर अपने हाथ खोले, ताकि उन्हें विश्राम मिले। तब मेरा ध्यान उसकी काया और अवस्था पर गया। वह कमजोर-सा वृद्ध था, परंतु उसके चेहरे पर संतोष का तेज विद्यमान था। उसकी मांसपेशियों से बहता पसीना मुझ में अपराध बोध-सा भर रहा था। पहाड़ कोहरे का लिहाफ ओढ़े कभी-कभी मुँह दिखा रहे थे। मैंने कुछ अटपटा सोचा।

मैं तेज कदम उठाकर पोर्टर तक पहुँचा और अपना रुकसैक उठा लिया। उसके चेहरे पर तनाव के भाव उभर आए; लेकिन मैं हल्का महसूस करने लगा। थोड़ी देर उसने मेरे साथ-साथ चलने का उपक्रम किया। मैंने उसके द्वारा तय पाँच सौ रुपये दिए, तो वह अगले ही मोड़ से मुड़ गया, और प्रत्युत्तर में मुस्कुराते हुए उसने हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में उठा दिए।

सनसनाते चीड़ों ने भी कोई राग अलाप दिया।

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7-छिनाल

   लज्जाराम चौधरी कुछ नहीं बोलते, बीड़ी मुँह में लिए फक -फक धुआँ उगलते रहते हैं। अठगैंया के हेकड़ जमींदार हैं। चोर नज़रों से बहूओं की टोह लेते हुए चेहरे पर कई रंग चढ़ाते -उतारते रहते हैं, अभी -अभी आँखों में सुर्ख डोरा उभर आया है,… और तनी हुई मुद्राओं का निहितार्थ करवट ले बैठा। पानी तो मुँह में बहुत दिनों से आ रहा था, लेकिन आज लार बह निकली तो कोशिश की… और बहू का हाथ पकड़ बैठे, ” कैसी हो बहू? “

 ” इसी वक़्त तुम्हारा मुँह तोड़ देना चाहिए ससुर जी हमें। “, बहू ने अपना तैश प्रदर्शित किया और आँसुओं में डूबती मायके चली गयी।

  कहते हैं, इस वाकये के बाद, कई दिनों तक लज्जाराम चौधरी अपने कमरे से बाहर नहीं निकले।

  कई दिनों बाद अठगैंया के लोग ही लज्जाराम चौधरी के कमरे तक आए और कहा, ‘‘चौधरी साहब! बहू छिनाल निकली।’’

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